नैरेटर : रात के लगभग एक बजे का वक्त था। काला लिबास पहनी एक औरत जिसने अपना चेहरा काले कपड़े से ढका हुआ था, कब्रिस्तान में दाखिल हुई। उसने अपने हाथ में पकड़ी काले रंग की पोटली में से इत्र की एक शीशी निकाली और इत्र की कुछ बूंदें अपनी गर्दन और कलाई पर लगा ली। उसने इत्र की बूंदों को कब्रिस्तान के चारों तरफ छिड़क दिया और वहां एक अग्नि का घेरा बनाकर बैठ गई। उसने अपने झोले से एक किताब निकाली जिसमें कुछ अजीब से अक्षर उकेरे गए थे, और हर पन्ने पर किसी भयानक से जीव की तस्वीर बनाई गई थी। वो औरत बड़े ही धीमे स्वर में उन शब्दों का उच्चारण कर रही थी, उसने अपनी हथेली पर एक चीरा लगाया और अपने रक्त की बूंदे अग्नि के उस कुंड में टपकाने लगी। तभी दो घंटे की इस प्रक्रिया के बाद कब्रिस्तान में अचानक एक अजीब सी हलचल हुई। अग्नि की लपटों से एक बड़ी ही भयानक आकृति प्रकट हुई। उस आकृति के सामने उसने अपनी हथेली पर फिर से एक चीरा लगाया और अपनी रक्त की बूंदे उसे भेंट चढ़ा दी।
पल्लवी (चेहरा ढका भारी आवाज़) : आखिर मुझे जो चाहिए था वह मुझे मिल ही गया।
जिन्न (भयानक आवाज़) : मेरा आवाहन क्यों किया है तूने। कह कौन सी इच्छा पूरी करूं मैं तेरी।
नैरेटर : उस आकृति ने जैसे ही उससे ऐसा पूछा तो उसने बड़ी ही दबी सी आवाज में कुछ कहा। उसे देख कर वह आकृति भयानक तरह से मुस्कुराई।
जिन्न (भयानक आवाज़) : तुझे यह चाहिए तो मिल जाएगा लेकिन उससे पहले मुझे अपना भोग चाहिए।
नैरेटर : उस औरत ने हां में गर्दन हिलाई। और अपने झोले से एक काले रंग का मिट्टी का कलश निकाला और देखते ही देखते वह आकृति धुआं बनकर उस कलश के भीतर समा गई, उसने तुरंत ही वह कलश एक काले कपड़े से ढक दिया और कब्रिस्तान से बाहर की ओर निकल गई। वो अपने घर की चौखट पर पहुंची तो उसने चौखट पर लगे एक पौधे की मिट्टी को कुरेदा और उसके भीतर वह कलश गाड़ दिया, और दोबारा से उसे मिट्टी से ढककर घर के भीतर प्रवेश कर गई।
(नेस्ट सीन : हॉस्पिटल के कमरे में प्रेगनेंट लेडी दर्द में है)
नैना (दर्द में) : आ, प्लीज मेरे बच्चे को बचा लो। प्लीज डॉक्टर, मेरे बच्चे को तो कुछ नहीं होगा ना।
डॉक्टर : देखिए आप प्लीज रिलैक्स कीजिए, हम आपके बच्चे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
तीन घंटे तक अंदर से कोई खबर नहीं आई।मोहित की आँखें दरवाज़े पर अटक चुकी थीं… उम्मीद और डर दोनों के बीच उसका चेहरा जैसे पिघलता जा रहा था।
नैरेटर : नैना की प्रेगनेंसी का यह नौवां महीना था। कुछ दिनों बाद उसकी डिलीवरी होने वाली थी लेकिन अचानक उसकी तबीयत खराब हुई और ससुराल वालों को उसे अस्पताल लाना पड़ा। नैना का केस कैसे इतना बिगड़ गया था डॉक्टर्स भी समझ नहीं पा रहे थे, उन्होंने नैना के बच्चे को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं बच सका। डॉक्टर परेशान होकर ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए।
मोहित (परेशान) : डॉक्टर, मेरी पत्नी, और मेरा बच्चा ठीक तो हैं ना। आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं। वह दोनों ठीक तो हैं ना।
डॉक्टर : आई एम रियली सारी मिस्टर मोहित। हमने आपके बच्चे को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ ऐसी कॉम्प्लिकेशन हो गई कि हम उसे बचा ही नहीं पाए। ऐसा केस मैंने अपनी लाइफ में पहली बार देखा है, आप बस शुक्र मनाइए कि आपकी बीवी की जान बच गई, वरना हमारे लिए उन्हें बचाना भी मुश्किल हो जाता।
नैरेटर : वो पल... मोहित की जिंदगी का सबसे भारी पल था। बेंच पर बैठते ही उसका चेहरा उसके दोनों हाथों में छुप गया। लेकिन ये टूटने का वक्त नहीं था… उसे नैना को संभालना था।जिन हाथों में कभी अपने बच्चे को उठाने का सपना देखा था… आज उन्हीं हाथों में discharge paper थे।कुछ घंटों बाद वो नैना को घर ले आया। उसके जीवन के ऐसे मुश्किल समय में अब उसकी बेटी काव्या ही उसके जीने का जरिया थी।
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काव्या : मम्मा, उठो ना। देखो तो आपने सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। अगर आप खाना नहीं खाओगी तो मैं भी खाना नहीं खाऊंगी।
नैना (इमोशनल) : नहीं मेरी बच्ची, तुझे मेरी वजह से भूखा रहने की कोई जरूरत नहीं है। इधर आ, मैं तुझे अपने हाथों से खाना खिलाती हूं।
नैरेटर : धीरे-धीरे करके नैना अब सामान्य होने लगी थी। इस हादसे को लगभग एक महीना बीत चुका था, वो अपनी बेटी काव्या और मोहित के साथ कमरे में सो रही थी तभी उसे अचानक कमरे में कुछ अजीब सा महसूस हुआ। वह घबराई और उसकी आंख खुल गई तभी उसने देखा कि कमरे के भीतर से अभी-अभी एक काला साया गुजरा है, उसने नजरे घूमा कर देखा तो काव्या कमरे में नहीं थी, तभी बाहर से काव्या की जोरदार चीख सुनाई दी। उस आवाज से मोहित की भी नींद टूट गई, नैना और मोहित जल्दी से कमरे के बाहर की तरफ भागे, लेकिन उन्होंने जो अपनी आंखों के सामने देखा वह देखकर उनके होश उड़ गए, काव्या जमीन पर पड़ी हुई बुरी तरह से तड़प रही थी।
नैना (घबराई) : ये, ये मेरी काव्या को क्या हो रहा है। कुछ करो मोहित, प्लीज कुछ करो।
नैरेटर : इससे पहले कि वह कुछ कर पाते तड़पते तड़पते काव्या ने वहीं अपना दम तोड़ दिया। एक तो पहले ही नैना के दिल पर अपने एक बच्चे को खोने का दुख था और काव्या के चले जाने के बाद तो उसकी मनोस्थिति और भी खराब हो गई, मगर तभी घर में खुशियों ने दस्तक दी, नैना की जेठानी पल्लवी गर्भ से हुई।
पल्लवी (इमोशनल) : मैं जानती हूं नैना कि तुम्हारे ऊपर इस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। मैं अभी तुम्हारे इस दुख को कम तो नहीं कर सकती लेकिन मैं तुमसे वादा करती हूं कि जब मेरी संतान होगी, तो तुम ही उसे उसकी मां बनकर पालना।
नैना (रोती हुई) : लेकिन दीदी।
पल्लवी (इमोशनल) : नहीं नैना, तुम मेरे लिए मेरी छोटी बहन जैसी हो और मैं तुम्हें ऐसी हालत में नहीं देख सकती। भगवान ने फिर चाहा तो दोबारा मेरी गोद हरी हो जाएगी और तुम्हारी भी लेकिन मेरी इस संतान की मां तुम ही बनोगी। इसकी जिम्मेदारी मैं अभी से तुम्हें सौंप रही हूं।
नैरेटर : ये बात सुनकर नैना की आंखों में आंसू आ गए। पल्लवी ने उसे गले से लगा लिया। पूरे नो महीने बाद पल्लवी ने एक खूबसूरत से बेटे को जन्म दिया। और पल्लवी ने जैसा कहा था उसने अपने बच्चे को नैना के हवाले कर दिया।
नैना : अरे मेरा बेटा, कितना प्यारा है। मम्मा तुझे बहुत सारा प्यार करती है।
नैरेटर : नैना अब एक सगी मां की तरह ही उसका ध्यान रखती थी। बच्चा अब एक महीने का हो चुका था तभी एक रात नैना को अपने कमरे में एक अजीब सी गंध महसूस हुई, धीमी धीमी सी इत्र की खुशबू हर जगह फैल गई। नैना ने आंख खोल कर देखा तो वैसी ही काली परछाई कमरे में घूम रही थी। उसका आकार धीरे-धीरे बड़ा होने लगा मानो तो जैसे कोई राक्षस हो, वो तुरंत बच्चे की और बढ़ा, ये देख कर नैना जोर से चिल्लाई, मोहित ने जल्दी से उठकर लाइट चालू की लेकिन तब तक वह साया वहां से गायब हो चुका था।
मोहित (नींद में घबराया) : क्या हुआ नैना, तुम इतनी जोर से क्यों चिल्लाई। तुमने कोई बुरा सपना देखा क्या।
नैना (डरी हुई) : व व वो, वो काला साया फिर से आया था। जो मेरी काव्या को लेकर गया था, वो सौरभ की ओर बढ़ रहा था। मेरा सौरभ ठीक तो है ना।
मोहित (नींद में) : रिलैक्स नैना। सौरभ तो अपने पालने में सो रहा है, यहां पर कोई भी नहीं है। पक्का तुमने कोई बुरा सपना देखा है।
नैना (डरी हुई) : नहीं, वो, वो सपना नहीं था। मैंने अपनी आंखों से देखा है वह वही साया था जो हमारी काव्या को लेकर गया था। प्लीज आप सौरभ को पालने से लेकर आओ।
नैरेटर : नैना को इतना घबराया हुआ देखकर मोहित ने सौरभ को पालने से गोद में लिया लेकिन सौरभ के भीतर कोई हलचल नहीं हो रही थी।
मोहित (घबराया) : अरे, सौरभ की बॉडी तो बिल्कुल ठंडी पड़ चुकी है। सौरभ, सौरभ।
नैरेटर : वो तुरंत उसे अस्पताल लेकर गए लेकिन जैसे ही वह अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने बताया कि बच्चा तो काफी देर पहले ही मर चुका है। पल्लवी भी इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पाई, क्योंकि उसने अपना जो बच्चा नैना को पालने पोसने के लिए दिया था, उसकी जान चली गई थी।
पल्लवी (रोती हुई गुस्से में) : मनहूस कहीं की, मैंने अपने बच्चे को तुझे देकर बहुत बड़ी गलती की। मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था, जो अपने ही दो बच्चों को खा गई, वह मेरे बच्चे को कैसे फलने देगी। तेरी वजह से मेरा बच्चा मारा गया। मेरा बच्चा……
नवीन (दुखी) : ये तुम कैसी बातें कर रही हो पल्लवी। इसमें बेचारी नैना की क्या गलती है। उस बेचारी के साथ पहले ही इतना गलत हो रहा है और तुम हो कि उसे यह सब बातें कह रही हो। अपने बच्चे के जाने का दुख मुझे भी है लेकिन इस तरह किसी को ऐसी बातें बोलना बहुत गलत है।
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पल्लवी (रोती हुई गुस्से में) : आप मेरी हालत नहीं समझ पाओगे, एक मां का दर्द सिर्फ वही महसूस कर सकती है। अरे पूरे नो महीने अपनी कोख में रखा था मैंने अपने बच्चे को, और इसने एक महीने में ही उसे मार डाला।
नैरेटर : पल्लवी बार-बार नैना को कोस रही थी। नैना बस सब कुछ चुपचाप सुन रही थी, उसकी आंखों से लगातार आंसू गिरते जा रहे थे। उनके परिवार में तो जैसे यह एक सिलसिला बन गया था। जैसे तो कोई बच्चों की बलियों का इंतजार कर रहा हो। दो महीने बाद पल्लवी फिर प्रेगनेंट हुई लेकिन इस बार उसने वह घर छोड़ दिया।
पल्लवी : मैं अपनी इस प्रेगनेंसी में इस घर में नहीं रहूंगी। मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे पर इस मनहूस की नजर भी पड़े।
नवीन : अगर तुम चाहती हो तो हम यहां से चले जाएंगे पल्लवी लेकिन बार-बार तुम नैना को कोसना बंद करो। प्लीज़ अब घर से निकलते वक्त उसे कुछ मत कहना।
नैरेटर : पल्लवी अपने हस्बैंड नवीन के साथ एक अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गई। धीरे-धीरे उसकी डिलीवरी का दिन नजदीक आ रहा था और इस बार उसने एक बेटी को जन्म दिया, लेकिन जैसे ही उसकी बेटी का जन्म हुआ तो उसे घर में कुछ अजीब सा महसूस हुआ, उसे घर से हर समय अपने आसपास एक साया महसूस होता। बहुत बार वह नींद में घबरा कर उठ जाती। उसकी बेटी अब एक महीने की हो चुकी थी। तभी एक रात, पल्लवी को कुछ बहुत अजीब महसूस हुआ। कमरे में एक अजीब सी कंपकपी थी। नींद में भी उसका पूरा शरीर मानो डर के मारे पसीने से भीग चुका था। वो अचानक से उठी तो कमरे की दीवार पर उसे एक परछाई बढ़ती हुई दिखाई दी जो उसकी बच्ची की तरफ ही बढ़ रही थी। उसने जल्दी से अपनी बच्ची को अपनी गोद में ले लिया लेकिन देखते ही देखते उसकी बच्ची बुरी तरह तड़पने लगी।
पल्लवी (डरी हुई) : नवीन, नवीन जल्दी से उठो। देखो ना हमारी बच्ची को क्या हो रहा है। वो साया, वो हमारी बच्ची को लेने आया है नवीन।
नवीन (नींद में) : तुम क्या बोल रही हो पल्लवी। कौन सा साया और कैसा साया और क्या हुआ है हमारी बच्ची को।
पल्लवी (डरी हुई) : देखो ना, ये कैसे तड़प रही है। प्लीज जल्दी से हॉस्पिटल चलो। पता नहीं इसे क्या हो गया है।
नैरेटर : इससे पहले कि वह दोनों कुछ कर पाते, पल्लवी की गोद में ही उसकी बच्ची ने अपना दम तोड़ दिया। पिछले तीन सालों में उनके परिवार में होने वाली यह चौथी मौत थी। कोई भी समझ नहीं पा रहा था कि आखिर यह क्या हो रहा है, लेकिन पल्लवी इतना जरूर समझ गई थी कि जो कुछ भी हो रहा है उस काले साए की वजह से ही हो रहा है।
पल्लवी : ये जो कुछ भी हो रहा है उसी साए की वजह से हो रहा है। मैं नहीं चाहती कि इस बार मेरे बच्चे के साथ कुछ भी हो।
नवीन : तुम चिंता मत करो पल्लवी, मैं कुछ ना कुछ जरूर करूंगा। मुझे भी लग रहा है जो कुछ भी हमारे घर में हो रहा है, वह नॉर्मल नहीं है। मैं मंदिर जाकर पंडित जी से बात करूंगा।
नैरेटर : कुछ समय बाद पल्लवी फिर से प्रेग्नेंट हुई लेकिन इस बार उसकी रक्षा के लिए नवीन ने उसकी कलाई पर एक रक्षा सूत्र बांध दिया मगर जैसे ही उस रक्षा सूत्र से उसके शरीर का स्पर्श हुआ वैसे ही उसका हाथ वहां से जल गया। तभी पल्लवी ने उस रक्षा सूत्र को दूर फेंक दिया।
नवीन (गुस्से में) : ये क्या किया तुमने, मैं कितनी दूर से तुम्हारे लिए ये रक्षा सूत्र बनवा कर लाया था। ये तुम्हारी और बच्चे की रक्षा करता, तुमने इसे खंडित क्यों कर दिया।
पल्लवी (डरी हुई) : ये देखो, जहां जहां इस रक्षा सूत्र ने मुझे छुआ, मेरा हाथ जल गया। ना जाने मेरे साथ ये क्या हो रहा है। उस नैना की मनहुसियत अभी भी मुझ पर लगी हुई है।
नवीन (गुस्से में) : ओह गॉड, फिर से नैना। तुम थोड़ी देर शांत हो जाओ पल्लवी। हम कहीं और चलेंगे और इस बार मैं हमारे होने वाले बच्चे को कुछ नहीं होने दूंगा।
नैरेटर : नवीन ने बहुत से बाबाओं से पल्लवी के लिए ताबीज बनवाए, लेकिन जैसे ही वह ताबीज पहनती, उसका शरीर जलने लगता। जैसे-तैसे करके नौ महीने बीते और नौ महीने बाद उसने फिर से एक बच्चे को जन्म दिया। लेकिन बच्चे के जन्म के बाद, पल्लवी को हर पल यह डर सताने लगा कि कहीं वह साया फिर से नजर न आ जाए और उसके बच्चे पर कोई संकट न आ जाए।
पल्लवी (घबराई हुई) : मुझे फिर से वह काला साया नजर आ रहा है, वो हर रात को हमारे इर्द-गिर्द घूमता है। वो फिर से मेरे बच्चे को नुकसान पहुंचाएगा।
नवीन : तुम चिंता मत करो पल्लवी, मैं घर में पूजा कराऊंगा। पंडित जी कुछ दिन के लिए बाहर गए हैं, वह जैसे ही वापस आ जाएंगे वैसे ही घर में पाठ शुरू हो जाएगा। तुम परेशान मत हो और जाओ जाकर आराम कर लो।
नैरेटर : नवीन ने बहुत मुश्किल से पल्लवी को समझाया लेकिन इससे पहले कि पंडित जी उनके घर पूजा के लिए आ पाते। उससे पहले ही जैसा कि हर बार वह सिलसिला चलता आ रहा था, इस बार भी वैसा ही हुआ, पल्लवी के इस बच्चे की भी उसके जन्म के एक महीने बाद मौत हो गई।
पल्लवी (रोती हुई) : मैंने कहा था ना वह इस बार भी मेरे बच्चे को ले जाएगा, वह ले गया। मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए। वापस चाहिए।
नैरेटर : नवीन की आंखों में भी आंसू आ गए। उसने पल्लवी को अपने सीने से लगाया और शांत किया। पल्लवी अपने तीन बच्चों को खो चुकी थी और अब उसकी मानसिक हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी। इसलिए नवीन ने घर पर एक सिद्ध बाबा को बुलाया ताकि घर में शांति के लिए हवन करा सके। मगर बाबा ने जैसे ही घर में कदम रखा तो उन्हें उस शक्ति का आभास हो गया।
बाबा : माफ करना लेकिन मैं तुम्हारे घर में किसी शांति के लिए कोई हवन नहीं कर सकता। उसे जिसने जागृत किया, अब वह उसके परिणाम भुगतेगा। इस घर में भटक रही उस अतृप्त शक्ति को अब शांत नहीं किया जा सकता।
नवीन (कन्फ्यूज़) : क्या, लेकिन मैं तो आपके पास बहुत आस लगा कर आया था बाबा। आप तो बड़ी-बड़ी परेशानियों का हल चुटकियों में निकाल देते हो तो फिर आप हमारी समस्या को हल क्यों नहीं कर सकते।
बाबा : क्योंकि यह शक्ति खुद किसी के पीछे नहीं लगती। किसी ने इसे जगाया है और जागने के बाद वो अपनी बलियों को पूरा किए बिना नहीं जाता। वो अभी शांत नहीं होगा जब तक कि वो उन बलियों को पूरा ना कर ले।
नवीन (कन्फ्यूज़) : क्या, लेकिन किसने किस शक्ति को जागृत किया। आखिर कौन है जो हमारा इतना बुरा चाहता है।
नैरेटर : बाबा ने नवीन की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उनके घर से वापस चले गए लेकिन अगले दिन पल्लवी बाबा के आश्रम जा पहुंची और उनके पैरों में गिर पड़ी।
पल्लवी (रोती हुई) : मैं जानती हूं बाबा कि मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है लेकिन मेरी गलती की सजा मेरे बच्चे क्यों भुगत रहे हैं। मैंने जो कुछ भी किया सिर्फ मां बनने की खुशी के लिए किया।
बाबा (गुस्से में) : तू नहीं जानती तूने कितना बड़ा पाप किया है। एक बच्चे को दुनिया में लाने के लिए तूने दूसरे के बच्चे की बलि देने से पहले नहीं सोचा।
पल्लवी (रोती हुई) : मैं जानती हूं बाबा कि मैंने नैना के दोनों बच्चों की आत्मा का सौदा जिन्न से किया था लेकिन मैं अपना पहला बच्चा नैना को ही देने वाली थी, मगर पता नहीं कैसे मेरे हर बच्चे को वह जिन्न अपने साथ लेकर जा रहा है। मैं ये दुख और बर्दाश्त नहीं कर सकती। अपनी आंखों के सामने अपने बच्चों को मरते हुए नहीं देख सकती मैं।
बाबा (गुस्से में) : जैसे उसके बच्चों की बलि देते हुए तूने पहले नहीं सोचा, उनकी आत्मा का सौदा तूने जिन्न से कर दिया। वैसे ही अब वह भी कुछ नहीं सोचेगा, उसने तुझे संतान दी तो सही, मां बनने का सुख तो तुझे मिल गया ना। वह तो सिर्फ इतना ही करता है और फिर उन्हीं संतानों की बलि लेकर जाता है। अभी तेरा यह कर्म पूरा नहीं हुआ है। अभी तो सिर्फ पांच बलियां गई हैं। वो दो बलि और लेकर जाएगा और ऐसा होने से कोई नहीं रोक सकता। तुझे अपना कर्म तो भुगतना ही पड़ेगा।
नैरेटर : पल्लवी अपनी शादी के आठ साल बाद भी मां नहीं बन पाई थी इसलिए मां बनने के लिए उसने गलत तरीका अपनाया। उसने जिन्न की साधना की ओर अपनी संतान के बदले नैना के दो बच्चों की आत्माओं का सौदा कर दिया लेकिन जिन्न का सौदा कभी भी इतना सरल नहीं होता। जो दिखता है, वैसे होता नहीं है। वो जिसे जो भी देता है, एक समय आने के बाद उसे उससे वापस भी ले लेता है। इस घटना को अब दो साल और बीत चुके थे, इन दो सालों में पल्लवी अपने दो बच्चों को और खो चुकी थी, जिन्न की सात बलियां अब पूरी हो चुकी थी। भगवान के आशीर्वाद से नैना तो अब दोबारा मां बन गई थी लेकिन अपनी आंखों के सामने अपनी गलती की वजह से अपने पांच बच्चों को एक-एक कर तड़प कर मरते हुए देखकर पल्लवी अब अपना दिमागी संतुलन खो चुकी थी और अब उसका पता मेंटल हॉस्पिटल का बेड नंबर तेरह था।
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