विजयनगर के दरबार में तेनालीराम ने एक अमीर सेठ की मूर्खता को कैसे उजागर किया — एक हास्यपूर्ण और शिक्षाप्रद कहानी।
विजयनगर — दक्षिण भारत का एक भव्य साम्राज्य। उसका सम्राट था राजा कृष्णदेवराय। शूरवीर, बुद्धिमान, कलाप्रेमी राजा।
उनके दरबार में आठ अद्भुत विद्वान थे — "अष्टदिग्गज" कहलाते थे। पर इनमें सबसे प्यारा और चालाक था तेनालीरामकृष्ण — जिसे लोग प्यार से तेनालीराम कहते।
तेनालीराम का काम था — दरबार में हँसी लाना, राजा का मनोरंजन करना। पर असल में वह एक बहुत बुद्धिमान आदमी था। उसकी हुषारी हास्य के पीछे छिपी रहती थी।
राजा को तेनालीराम पर पूरा भरोसा था। कोई कठिन समस्या आती, तो वे तेनालीराम को बुलाते।
एक दिन एक धनी सेठ का बेटा दरबार में आया। उसका नाम था — रामैया। रामैया बहुत अमीर परिवार से था। पर बहुत घमंडी और मतलबी।
उसके साथ एक गरीब नौकर भी था। उसका नाम था — गोपी। गोपी बहुत डरा हुआ था। हाथ जोड़े हुए, सिर झुकाए।
राजा ने पूछा — "क्या मामला है?"
रामैया ने आगे आकर कहा — "महाराज! न्याय चाहिए। यह आदमी — गोपी — मेरे यहाँ नौकरी करता है। पर इसने मेरे साथ बेईमानी की है।"
"क्या बेईमानी?"
"महाराज, मेरे घर में एक कुआँ है। पुश्तैनी कुआँ। मेरे दादा ने खुदवाया था। उसी कुएँ का पानी हम पीते आए हैं। पर आज पता चला कि यह गोपी रोज़ हमारे कुएँ का पानी पी रहा है। बिना मेरी अनुमति के!"
दरबार में हलचल हुई। यह क्या मूर्खता वाली शिकायत है?
राजा ने पूछा — "तो?"
"महाराज! कुआँ मेरा है। पानी मेरा है। यह मेरा पानी पी रहा है — बिना अनुमति। मैं चाहता हूँ कि यह उस पानी की कीमत चुकाए। दस साल से नौकरी कर रहा है। हर दिन पानी पीता है। उस सबकी कीमत — मेरे हिसाब से — दस हज़ार सोने के सिक्के!"
गोपी ने हाथ जोड़कर कहा — "महाराज! माफ़ करें। मैं तो बस प्यास बुझाने के लिए पानी पीता था। मेरे पास तो रोज़ खाने के पैसे नहीं हैं! दस हज़ार सिक्के मैं कहाँ से लाऊँगा? मेरी पूरी ज़िंदगी की कमाई इतनी नहीं!"
राजा ने सोचा। उन्हें भी यह मामला अजीब लगा। पर रामैया का तर्क था — "कुआँ मेरा। पानी मेरा। बिना अनुमति लिया, तो कीमत चुकानी पड़ेगी।"
क़ानून तो यही कहता था। संपत्ति बिना अनुमति लेना — चोरी।
राजा ने अनिच्छा से कहा — "रामैया, तुम्हारा तर्क सही है। संपत्ति बिना अनुमति लेना सही नहीं। गोपी, तुम्हें कीमत चुकानी पड़ेगी।"
गोपी रोने लगा। "महाराज! दया! मैं कैसे चुकाऊँगा? मेरे बच्चे भूखे मरेंगे!"
दरबार में सब चुप थे। नियम तो नियम था।
तभी — दरबार के एक कोने में बैठे — तेनालीराम उठा। उसके चेहरे पर एक चालाक मुस्कान थी।
"महाराज! मेरी एक विनती है।"
"बोलो तेनालीराम।"
"क्या मैं इस मामले में कुछ कह सकता हूँ?"
"बिल्कुल। बोलो।"
तेनालीराम बीच में आया। उसने रामैया की तरफ़ देखा।
"रामैया जी! आपका कहना है — कुआँ आपका है, पानी आपका है। ठीक?"
"बिल्कुल! पुश्तैनी कुआँ है मेरा।"
"और गोपी ने वह पानी बिना अनुमति पिया — इसलिए कीमत चुकाए?"
"हाँ!"
तेनालीराम ने राजा से कहा — "महाराज, फ़ैसला सही है। पर एक बात पूछना है रामैया जी से।"
"बोलो।"
तेनालीराम रामैया की तरफ़ मुड़ा।
"रामैया जी, यह बताइए — आपके कुएँ में पानी कहाँ से आता है?"
"कहाँ से? कुएँ में से। ज़मीन के नीचे से।"
"नहीं नहीं। मतलब — पानी कुएँ में कैसे भर जाता है? आप उसमें पानी डालते हो?"
"नहीं! पानी ख़ुद-ब-ख़ुद आता है। ज़मीन के नीचे से। कुआँ इसी लिए तो होता है।"
"तो पानी आपका नहीं है — पानी ज़मीन का है। ठीक?"
रामैया अटका। "हाँ... पर कुआँ तो मेरा है ना?"
"कुआँ आपका। पर कुआँ — यानी एक छेद। पानी कुएँ का नहीं। पानी ज़मीन के नीचे से आता है। और ज़मीन का पानी — यह राजा की संपत्ति है। राजा प्रजा को मुफ़्त देते हैं।"
रामैया घबरा गया। "क्या मतलब?"
तेनालीराम ने राजा की तरफ़ देखा।
"महाराज! रामैया ने अपने कुएँ का पानी बहुत सालों से पिया है। पर वह पानी असल में राजा का है। वह राजा की संपत्ति को बिना अनुमति इस्तेमाल कर रहा है।"
"मेरे हिसाब से — कम से कम सौ साल से इस कुएँ का पानी पीया जा रहा है। हर दिन कितने सौ लीटर पानी निकलता होगा। एक सौ साल का जोड़! कितने हज़ार सोने के सिक्के होंगे — गिनना भी मुश्किल!"
"मैं चाहता हूँ कि रामैया जी — पूरे ख़ानदान के नाम से — राजा को कीमत चुकाए। दस लाख सोने के सिक्के!"
दरबार में सन्नाटा। फिर — एक के बाद एक — सब हँसने लगे।
राजा कृष्णदेवराय हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।
"वाह तेनालीराम! वाह!"
रामैया का चेहरा सफ़ेद। उसके पास कोई जवाब नहीं। वह कहने लगा — "महाराज! महाराज! मेरा यह मतलब नहीं था!"
तेनालीराम ने उसे रोका — "रुकिए रामैया जी! आप क्या कह रहे थे? कि कुआँ आपका, पानी आपका, इसलिए कीमत चुकानी चाहिए। तो वही नियम आप पर भी लागू होता है। आपने राजा का पानी पिया — कीमत दीजिए।"
रामैया घुटनों पर बैठ गया। उसके चेहरे पर पसीना। उसकी आँखों में डर।
"महाराज! मेरी ग़लती हुई। मैं माफ़ी माँगता हूँ। दस हज़ार सिक्के तो मैं छोड़ता हूँ। मैं गोपी से कोई पैसा नहीं माँगूँगा।"
तेनालीराम ने सिर हिलाया। "अरे नहीं नहीं! इतनी आसानी से कैसे माफ़! आपने एक गरीब आदमी को परेशान किया है। कोर्ट में लाए हो। दस हज़ार सिक्के माँगे हैं। अब आपको भी कुछ चुकाना होगा।"
राजा ने हँसते हुए कहा — "तेनालीराम सही कह रहा है। रामैया, तुमने एक गरीब आदमी पर बेकार की मुक़दमेबाज़ी की। तुम्हें भी सज़ा मिलनी चाहिए।"
"अब तुम — गोपी को सौ सोने के सिक्के दो — हर्जाने के तौर पर। यह उसकी मानहानि के लिए। और राजा को पाँच सौ सिक्के दो — पानी की कीमत के तौर पर।"
रामैया रोने लगा। उसने पैसे निकाले। गोपी को सौ सिक्के दिए। राजा के खजाने में पाँच सौ डाले।
गोपी अपनी आँखों पर भरोसा नहीं कर पाया। एक मिनट पहले वह दस हज़ार सिक्कों के क़र्ज़ में था। अब उसके पास सौ सिक्के! इतनी बड़ी राशि उसने ज़िंदगी में पहली बार देखी।
उसने तेनालीराम के पैरों में अपना सिर रखा।
"आप ने मेरी जान बचाई! भगवान आपको लंबी ज़िंदगी दे!"
तेनालीराम ने हाथ रखकर कहा — "उठो भाई। यह तो सरल बात थी। न्याय हुआ — बस।"
दरबार में सब तालियाँ बजा रहे थे। राजा ने तेनालीराम को बुलाया।
"तेनालीराम! तुमने आज एक बड़ा सबक दिया। कानून तभी सही है जब वह सब पर समान लागू हो — चाहे अमीर हो या गरीब। और न्याय में 'मानवता' होनी चाहिए।"
"तुम्हारी हुषारी का इनाम — पाँच सौ सोने के सिक्के! और तुम्हारी हास्य की भी मस्त सजावट थी इस फ़ैसले में।"
तेनालीराम ने सिर झुकाकर इनाम स्वीकार किया।
"महाराज! आपकी कृपा। पर मैंने ये पाँच सौ सिक्के गोपी को देंगे। उसे ज़्यादा ज़रूरत है।"
दरबार में फिर तालियाँ बजीं। राजा की आँखों में गर्व था।
"तुम्हारी सच्चाई और दिल का बड़प्पन देखकर मुझे और भी गर्व है तुम पर!"
दरबार ख़त्म होने पर रामैया वापस जा रहा था। तेनालीराम ने उसे रोका।
"रामैया जी, एक बात कहूँ?"
"बोलिए।"
"आज आपको एक सबक मिला। पैसा होने से इन्सान बड़ा नहीं होता। दिल का बड़प्पन ही असली अमीरी है। आपके पास हज़ारों सिक्के हैं। पर अगर आपके दिल में दूसरों के लिए दया नहीं — तो आप कितने ग़रीब हैं!"
"अब से कोशिश करना — पैसे पर इतना ज़ोर मत देना। दूसरों की मदद करना। ख़ासकर अपने नौकरों की।"
रामैया ने सिर झुकाया। उसने उस दिन से कोशिश की। और कुछ साल बाद — वह एक उदार आदमी बन गया। पूरे विजयनगर में उसकी दान की कथाएँ सुनी जातीं।
प्यारे बच्चों, तेनालीराम की इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब कभी तुम देखो कि कोई कमज़ोर पर ज़्यादती कर रहा है — चाहे स्कूल में, रास्ते पर, या कहीं भी — तो आँख बंद मत करो। चुप मत रहो। हुषारी से, हिम्मत से — सच के साथ खड़े हो जाओ। यही असली इन्सानियत है!
॥ न्याय और मानवता — दो आँखें ज़िंदगी की ॥
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