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दो बजे का सौदा

G
Gaurab Nath
19 May 2026

काली सड़क का कुत्ता

सड़क पर सन्नाटा था, पर यह वह सन्नाटा नहीं था जो कब्रिस्तान में होता है। यह वह खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले बाजार में छा जाती है, जब हर दुकानदार अपनी दुकान बढ़ा रहा होता है और हर खरीदार तेजी से अपने घर की तरफ भाग रहा होता है।

किशन लाल अपनी कोठरी की खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके हाथ में ठंडी हो चुकी चाय का प्याला था। बाहर, काली सड़क के ठीक बीचों-बीच एक कुत्ता बैठा था। काला, दुबला, और इतना शांत जैसे कोई पत्थर का निशान हो।

किशन लाल को इस कुत्ते से डर लगता था। इसलिए नहीं कि वह काटता था—उसने तो आज तक किसी पर भोंका भी नहीं था। डर इस बात का था कि वह हर रात ठीक दो बजे वहीं आकर बैठ जाता था, और उसकी आंखें हमेशा किशन लाल की खिड़की पर टिकी रहती थीं।

"कमीना... पता नहीं क्या देखता है," किशन लाल ने बुदबुदाते हुए चाय का एक घूंट लिया, पर गला सूख चुका था।

तभी सड़क की टिमटिमाती हुई पीली लाइट के नीचे एक साया उभरा। एक अजीब सा लंबा आदमी, जिसने बदन पर एक फटा हुआ ओवरकोट पहना था। उसके चलने का ढंग अजीब था, जैसे उसके जिस्म में हड्डियां ही न हों। वह धीरे-धीरे कुत्ते के पास आया और उसके सामने बैठ गया।

किशन लाल ने अपनी टॉर्च निकाली और रोशनी सीधे उस आदमी के चेहरे पर डाली।

उसका दिल हलक में आ गया।

आदमी का कोई चेहरा नहीं था। वहां बस एक सपाट, नंगी खाल थी—न आंखें, ना नाक, ना मुंह। पर फिर भी, उस सपाट खाल के अंदर से एक आवाज निकल रही थी, जैसे कोई पुरानी लकड़ी का शहतीर टूट रहा हो।

वह आदमी उस कुत्ते से बात कर रहा थी। और उससे भी ज्यादा खौफनाक बात यह थी कि कुत्ता इंसानी जुबान में उसे जवाब दे रहा था।

"आज का सौदा तय है?" कुत्ते ने पूछा। उसके होंठ नहीं हिले, पर आवाज साफ थी।

"हां," उस बिना चेहरे वाले आदमी ने कहा, और अपना हाथ अपनी जेब में डाला। उसने जेब से एक पुरानी, खून से सनी हुई घड़ी निकाली। वह घड़ी... किशन लाल की थी, जो उसने पिछले हफ्ते अपनी अलमारी में रखी थी।

किशन लाल का जिस्म ठंड से कांपने लगा। उसने तुरंत खिड़की के पर्दे गिरा दिए और अपनी अलमारी की तरफ भागा। उसने अलमारी खोली... घड़ी वहां नहीं थी। वहां सिर्फ एक पुराना कागज का टुकड़ा रखा था, जिस पर लिखा था: ‘किशन लाल, तुम्हारी बारी अगली है।’

बाहर से अब रोने की आवाज आने लगी थी। पर यह रोना उस कुत्ते का नहीं था, ना ही उस आदमी का। यह आवाज खुद किशन लाल के गले से निकल रही थी, जबकि उसके होंठ बिल्कुल बंद थे। उसके जिस्म पर से उसका अपना इख्तियार खत्म हो रहा था, और उसके कदम खुद-ब-खुद खिड़की की तरफ बढ़ने लगे थे... पर्दा हटाने के लिए।

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