एक चालाक सियार और उसके नीले रंग की कहानी — जिसने सिखाया कि झूठ और पाखंड की कोई भी इमारत आख़िरकार ढह जाती है।
एक घने जंगल में एक सियार रहता था। उसका नाम था — चंडरव। चंडरव का रंग साधारण भूरा-पीला था, जैसे बाक़ी सियारों का। पर उसकी एक ख़ासियत थी — वह बहुत चालाक और महत्वाकांक्षी था।
दूसरे सियार खाना ढूँढ़कर खुश हो जाते। पर चंडरव हमेशा कुछ बड़ा करने के सपने देखता।
"मैं किसी दिन इस जंगल का राजा बनूँगा! देखना!"
दूसरे जानवर उसकी बातें सुनकर हँसते। "तू? सियार होकर राजा बनेगा? वो तो शेर का काम है।"
एक दिन चंडरव बहुत भूखा था। पूरे जंगल में कुछ नहीं मिला। उसने सोचा — "क्यों न शहर में जाकर देखूँ? वहाँ हमेशा कुछ खाने को मिल जाता है।"
वह जंगल से निकलकर पास के शहर में चला गया।
शहर में पहुँचते ही उसे एक मिठाई की दुकान दिखी। उसकी ख़ुशबू मन को मोह लेने वाली। चंडरव चुपके से दुकान के पास गया। एक मिठाई का टुकड़ा उठाकर भागने की कोशिश की।
पर — दुकान के मालिक ने देख लिया।
"चोर! चोर! सियार चोर!"
उसकी आवाज़ सुनकर मोहल्ले के सारे कुत्ते दौड़े आए। कोई पाँच, कोई सात, कोई दस। सब चंडरव के पीछे पड़ गए। ज़ोर-ज़ोर से भौंकते हुए।
"भौ! भौ! भौ!"
चंडरव दौड़ने लगा। जान बचाने के लिए। पर कुत्ते कई थे, और तेज़ थे। चंडरव छोटी-छोटी गलियों में भागता रहा। आगे, और आगे।
"हे भगवान! आज तो मैं ज़रूर मारा जाऊँगा!"
तभी — एक कोने में — उसे एक बड़ा-सा घड़ा दिखाई दिया। यह एक रंगरेज़ का घड़ा था। उसमें गहरा नीला रंग भरा हुआ था। रंगरेज़ कपड़े रंगने के लिए उसका इस्तेमाल करता था।
चंडरव ने एक झपट्टे में उसमें कूद लगाई।
"छपाक!"
चंडरव पूरी तरह से नीले रंग में डूब गया। कुत्ते उसके पीछे आए, पर उन्हें सियार कहीं नहीं मिला। वे थोड़ी देर भौंकते रहे, फिर चले गए।
चंडरव कुछ देर तक नीले रंग के घड़े में बैठा रहा — डर से कि कुत्ते वापस न आ जाएँ। फिर हिम्मत करके वह बाहर निकला।
शाम हो रही थी। उसने अपने आप को देखा — और हक्का-बक्का रह गया!
उसका पूरा शरीर — सिर से पूँछ तक — गहरे नीले रंग का हो चुका था! पंजे नीले, पीठ नीली, कान नीले, थूथन नीला! वह अब सियार नहीं — कोई अनोखा प्राणी लग रहा था।
उसकी आँखें चमक उठीं। एक चालाक मुस्कान उसके चेहरे पर आई।
"वाह! मेरे साथ कितना बड़ा चमत्कार हुआ! अब मैं किसी से नहीं डरूँगा। यह नीला रंग मेरी पहचान बन सकता है। मैं इसका इस्तेमाल करूँगा!"
चंडरव शहर से निकलकर वापस जंगल चला आया। बीच रात को। वह जंगल के बीच एक खुले मैदान में पहुँचा। फिर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा —
"सुनो! सुनो! सब प्राणी सुनो!"
उसकी आवाज़ रात के सन्नाटे में गूँजी। एक-एक करके जानवर बाहर आने लगे। पहले कुछ खरगोश और गिलहरियाँ। फिर हिरण। फिर भालू। फिर हाथी। फिर — शेर!
सब ने बीच मैदान में देखा — एक चमकदार, नीला, अनोखा प्राणी खड़ा है। उन्होंने ऐसा रंग पहले कभी नहीं देखा था। सब डरकर रुक गए।
चंडरव ने मौक़ा देखकर ज़ोर से कहा —
"डरो मत! मैं भगवान का दूत हूँ! मेरा नाम है — कंकेरव! मैं स्वयं ब्रह्मा द्वारा भेजा गया हूँ। आज से इस जंगल का राजा मैं हूँ!"
शेर ने सिर हिलाया। "पर इस जंगल का राजा तो मैं हूँ। तुम कौन हो?"
चंडरव ने हँसते हुए कहा — "शेर भाई! तुम तो साधारण जानवर हो। मेरे रंग को देखो। तुमने कभी ऐसा रंग देखा है? यह दिव्य रंग है। भगवान ने मुझे विशेष रूप से बनाया है — इस जंगल पर शासन करने के लिए।"
"तुम सब अब मेरी सेवा करोगे। मेरे लिए खाना लाओगे। मेरी रक्षा करोगे। और मैं तुम्हारी देखभाल करूँगा।"
शेर असमंजस में था। उसने कई जानवरों के चेहरे देखे। सब डरे हुए थे। उस नीले रंग ने उन्हें पूरी तरह से डरा दिया था।
शेर ने धीमे से कहा — "ठीक है। पर अगर तुम झूठ बोल रहे हो, तो याद रखना — सच एक न एक दिन सामने आता है।"
चंडरव ने हँसकर कहा — "तुम्हें फ़िक्र मत करो। मैं देवदूत हूँ।"
उस रात से चंडरव — अब "कंकेरव" के नाम से — जंगल का राजा बन गया। शेर, हाथी, भालू — सब उसकी सेवा करने लगे। हिरण और खरगोश उसके लिए फल लाते। बाक़ी सब उसकी सुरक्षा करते।
चंडरव ने कुछ नियम बनाए — जो उसके फायदे के लिए थे।
"अब से कोई भी सियार जंगल में नहीं रहेगा। सियारों को बाहर निकाल दो!"
क्यों? क्योंकि वह डरता था कि अगर सियार पास आए, तो उसकी असलियत पता चल जाएगी।
शेर ने पूछा — "पर सियारों ने क्या ग़लती की है?"
"मेरा आदेश है! बस! जो मेरा आदेश नहीं मानेगा, वह दंडित होगा।"
शेर ने मन ही मन में सोचा — "यह तो अनोखी बात है। पर देखें — क्या होता है।"
शेर ने सब सियारों को इकट्ठा करके जंगल से दूर भेज दिया। चंडरव अब निश्चिंत हो गया।
उसने अब और भी विलासी जीवन शुरू किया। सबसे बढ़िया फल, सबसे ताज़ा शिकार — सब उसको मिलने लगे। वह आरामदायक गुफा में रहता। शेर और भालू उसकी सुरक्षा करते।
"वाह! अब तो जीवन का असली मज़ा है!"
कुछ महीने बीत गए। चंडरव अब पूरी तरह से एक राजा की तरह जीने लगा था। पर उसके मन में कहीं एक डर था — क्या यह सब हमेशा चलेगा?
एक रात — पूर्णिमा की चाँदनी रात — चंडरव अपनी गुफा के बाहर बैठा था। चाँद आसमान में चमक रहा था। ठंडी हवा बह रही थी।
तभी — दूर से — एक आवाज़ आई।
"हुउउउ! हुउउउ!"
यह सियारों की हुलाहुल थी। दूर के जंगल में जिन सियारों को निकाल दिया गया था, वे चाँदनी रात में मिलकर हुलाहुल कर रहे थे। यह सियारों की पुरानी आदत है — चाँदनी रात में हुलाहुल करना।
चंडरव ने उन्हें सुना। उसके अंदर — गहरे — कुछ हिल गया। उसकी रगों में सियार का खून बहा। उसकी आदत — जन्मजात आदत — जाग गई।
उसने सोचा भी नहीं। बस — अपनी गर्दन उठाई। आसमान की तरफ़ देखा। और —
"हुउउउ! हुउउउ!"
वह भी हुलाहुल कर उठा।
उस आवाज़ को सब जानवरों ने सुना। शेर, हाथी, भालू, हिरण — सब चौंके।
"यह तो सियार की आवाज़ है!"
शेर ने अपने कान खड़े किए। उसकी आँखों में चमक आई। उसे सब समझ में आ गया।
"यह तो सियार है! झूठ! इतने महीने से हमें मूर्ख बना रहा था!"
शेर ने ज़ोर से दहाड़ लगाई। एक-एक करके सब जानवर इकट्ठा हो गए। शेर ने कहा —
"मित्रों! आज सच का पता चला। यह नीला प्राणी कोई दिव्य दूत नहीं — एक साधारण सियार है! इसका रंग नीला किसी रंग के घड़े में कूदने से हुआ होगा। और हमने इसकी पूजा की!"
हाथी ने ग़ुस्से से सूँड हिलाई। "धोखेबाज़!"
भालू ने पंजे ठोंके। "हम पर इतना बड़ा झूठ बोला!"
हिरण और खरगोश तो विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे। "हमारा राजा एक झूठा सियार था!"
शेर ने ग़ुस्से में चंडरव की तरफ़ छलाँग लगाई। चंडरव ने भागने की कोशिश की। पर अब बहुत देर हो चुकी थी।
शेर ने उस पर झपट्टा मारा।
"धोखेबाज़! तुमने पूरे जंगल को धोखा दिया! इतने महीने तक हमारा अपमान किया! तुम्हें कड़ी सज़ा मिलेगी!"
शेर ने एक झटके में चंडरव का अंत कर दिया। नीला रंग ख़ून से लाल हो गया।
उसकी मौत के बाद शेर ने सब जानवरों से कहा —
"मित्रों! आज एक बड़ा सबक मिला। हम सब को सावधान रहना चाहिए। दिखावे पर मत जाओ। पहले जाँच-पड़ताल करो। एक झूठा रंग और कुछ बड़ी बातें सुनकर हमने एक धोखेबाज़ को राजा बना दिया।"
उन्होंने सब निकाले गए सियारों को वापस बुलाया। उनसे माफ़ी माँगी। शेर वापस से जंगल का राजा बना — और अब और भी सावधानी से शासन करने लगा।
प्यारे बच्चों, नीले सियार की इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब कोई बहुत बड़ी-बड़ी बातें करे, अपने आप को कुछ ख़ास कहे — तो थोड़ा समय निकालकर सोचो। दिखावा एक दिन का होता है — सच्चाई हमेशा की होती है। अपनी असली पहचान पर गर्व करो — झूठे रंगों में मत छुपो!
॥ झूठ की दीवार आख़िरकार गिर ही जाती है ॥
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