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पूस की रात

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Munshi Premchand
21 Mar 2026

पूस की अँधेरी रात। आसमान पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ओख के पत्तों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढे़ की चादर ओढ़े हुए काँप रहा था। खटोले के नीचे उसका साथी कुत्ता, जबरा पेट में मुँह डाले सर्दी से कूँ कूँ कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी।

हल्कू ने घुटनों को गर्दन में चिमटाते हुए कहा, “क्यों जबरा जाड़ा लगता है, कहा तो था घर में पियाल पर लेट रह। तू यहाँ क्या लेने आया था! अब खा सर्दी, मैं क्या करूँ। जानता था। मैं हलवा पूरी खाने आ रहा हूँ। दौड़ते हुए आगे चले आए। अब रोओ अपनी नानी के नाम को।” जबरा ने लेटे हुए दुम हिलाई और एक अंगड़ाई लेकर चुप हो गया। शायद वो ये समझ गया था कि उसकी कूँ-कूँ की आवाज़ से उसके मालिक को नींद नहीं आ रही है।

हल्कू ने हाथ निकाल कर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा, “कल से मेरे साथ न आना, नहीं तो ठंडे हो जाओगे। ये राँड पछुवा हवा न जाने कहाँ से बर्फ़ लिए आ रही है। उठूँ फिर एक चिलम भरूँ, किसी तरह रात तो कटे। आठ चिलम तो पी चुका। ये खेती का मज़ा है और एक भागवान ऐसे हैं, जिन के पास अगर जाड़ा जाए तो गर्मी से घबरा कर भागे। मोटे गद्दे, लिहाफ़, कम्बल मजाल है कि जाड़े का गुज़र हो जाए। तक़दीर की ख़ूबी है, मज़दूरी हम करें। मज़ा दूसरे लूटें।”
हल्कू उठा और गड्ढे में ज़रा सी आग निकाल कर चिलम भरी। जबरा भी उठ बैठा। हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा, “पिएगा चिलम? जाड़ा तो क्या जाता है, हाँ ज़रा मन बहल जाता है।”

जबरा ने उसकी जानिब मुहब्बत भरी निगाहों से देखा। हल्कू ने कहा, “आज और जाड़ा खाले। कल से मैं यहाँ पियाल बिछा दूँगा। उसमें घुस कर बैठना जाड़ा न लगेगा।”
जबरा ने अगले पंजे उसके घुटनों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म साँस लगी। चिलम पी कर हल्कू, फिर लेटा। और ये तय कर लिया कि चाहे जो कुछ हो अबकी सो जाऊँगा। लेकिन एक लम्हे में उसका कलेजा काँपने लगा। कभी इस करवट लेटा, कभी उस करवट। जाड़ा किसी भूत की मानिंद उसकी छाती को दबाए हुए था।

जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसके सर को थपथपा कर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते के जिस्म से मालूम नहीं कैसी बदबू आ रही थी पर उसे अपनी गोद से चिमटाते हुए ऐसा सुख मालूम होता था जो इधर महीनों से उसे न मिला था।

जबरा शायद ये ख़याल कर रहा था कि बहिश्त यही है और हल्कू की रूह इतनी पाक थी कि उसे कुत्ते से बिल्कुल नफ़रत न थी। वो अपनी ग़रीबी से परेशान था, जिसकी वज्ह से वो इस हालत को पहुँच गया था। ऐसी अनोखी दोस्ती ने उसकी रूह के सब दरवाज़े खोल दिए थे। उसका एक-एक ज़र्रा हक़ीक़ी रौशनी से मुनव्वर हो गया था।

इसी अस्ना में जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई, उसके मालिक की इस ख़ास रूहानियत ने उसके दिल में एक जदीद ताक़त पैदा कर दी थी जो हवा के ठंडे झोंकों को भी ना-चीज़ समझ रही थी। वो झपट कर उठा और छप्परी से बाहर आकर भौंकने लगा। हल्कू ने उसे कई मर्तबा पुचकार कर बुलाया पर वो उसके पास न आया, खेत में चारों तरफ़ दौड़-दौड़ कर भौंकता रहा। एक लम्हे के लिए आ भी जाता तो फ़ौरन ही फिर दौड़ता, फ़र्ज़ की अदायगी ने उसे बेचैन कर रखा था।

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