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पूस की रात

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Munshi Premchand
21 Mar 2026

एक घंटा गुज़र गया। सर्दी बढ़ने लगी। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिला कर सर को छुपा लिया फिर भी सर्दी कम न हुई। ऐसा मालूम होता था कि सारा ख़ून मुंजमिद हो गया है। उसने उठकर आसमान की जानिब देखा अभी कितनी रात बाक़ी है। वो सात सितारे जो क़ुतुब के गिर्द घूमते हैं। अभी अपना निस्फ़ दौरा भी ख़त्म नहीं कर चुके। जब वो ऊपर आ जाएँगे तो कहीं सवेरा होगा। अभी एक घड़ी से ज़्यादा रात बाक़ी है।

हल्कू के खेत से थोड़ी देर के फ़ासले पर एक बाग़ था। पतझड़ शुरू हो गई थी। बाग़ में पत्तों का ढेर लगा हुआ था, हल्कू ने सोचा, चल कर पत्तियाँ बटोरूँ और उनको जला कर ख़ूब तापूँ। रात को कोई मुझे पत्तियाँ बटोरते देखे तो समझे कि कोई भूत है कौन जाने कोई जानवर ही छुपा बैठा हो। मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता।

उसने पास के अरहर के खेत में जाकर कई पौदे उखाड़े और उसका एक झाड़ू बना कर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिए बाग़ की तरफ़ चला। जबरा ने उसे जाते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा।

हल्कू ने कहा अब तो नहीं रहा जाता जबरू, चलो बाग़ में पत्तियाँ बटोर कर तापें, टाठे हो जाएँगे तो फिर आकर सोएँगे। अभी तो रात बहुत है।

जबरा ने कूँ-कूँ करते हुए अपने मालिक की राय से मुवाफ़िक़त ज़ाहिर की और आगे-आगे बाग़ की जानिब चला। बाग़ में घटाटोप अंधेरा छाया हुआ था। दरख़्तों से शबनम की बूँदें टप-टप टपक रही थीं। यका-यक एक झोंका मेहंदी के फूलों की ख़ुश्बू लिए हुए आया।

हल्कू ने कहा कैसी अच्छी महक आई जबरा। तुम्हारी नाक में भी कुछ ख़ुश्बू आ रही है?

जबरा को कहीं ज़मीन पर एक हड्डी पड़ी मिल गई थी। वो उसे चूस रहा था।

हल्कू ने आग ज़मीन पर रख दी और पत्तियाँ बटोरने लगा। थोड़ी देर में पत्तों का एक ढेर लग गया। हाथ ठिठुरते जाते थे। नंगे-पाँव गले जाते थे और वो पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। उसी अलाव में वो सर्दी को जला कर ख़ाक कर देगा।

थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले दरख़्त की पत्तियों को छू छू कर भागने लगी। इस मुतज़लज़ल रौशनी में बाग़ के आलीशान दरख़्त ऐसे मालूम होते थे कि वो इस ला-इंतिहा अंधेरे को अपनी गर्दन पर सँभाले हों। तारीकी के उस अथाह समंदर में ये रौशनी एक नाव के मानिंद मालूम होती थी।

हल्कू अलाव के सामने बैठा हुआ आग ताप रहा था। एक मिनट में उसने अपनी चादर बग़ल में दबा ली और दोनों पाँव फैला दिए। गोया वो सर्दी को ललकार कर कह रहा था “तेरे जी में आए वो कर।” सर्दी की इस बे-पायाँ ताक़त पर फ़त्ह पा कर वो ख़ुशी को छुपा न सकता था।

उसने जबरा से कहा, “क्यों जबरा। अब तो ठंड नहीं लग रही है?”
जबरा ने कूँ-कूँ कर के गोया कहा, “अब क्या ठंड लगती ही रहेगी।”

“पहले ये तदबीर नहीं सूझी... नहीं तो इतनी ठंड क्यों खाते?”
जबरा ने दुम हिलाई।

“अच्छा आओ, इस अलाव को कूद कर पार करें। देखें कौन निकल जाए है। अगर जल गए बच्चा तो मैं, दवा न करूँगा।”
जबरा ने ख़ौफ़-ज़दा निगाहों से अलाव की जानिब देखा।

“मुन्नी से कल ये न जड़ देना कि रात ठंड लगी और ताप-ताप कर रात काटी। वर्ना लड़ाई करेगी।”
ये कहता हुआ वो उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ़ निकल गया पैरों में ज़रा सी लिपट लग गई, पर वो कोई बात न थी। जबरा अलाव के गिर्द घूम कर उसके पास खड़ा हुआ।

हल्कू ने कहा चलो-चलो, इसकी सही नहीं। ऊपर से कूद कर आओ वो फिर कूदा और अलाव के उस पार आ गया।

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