एक देश का संविधान — उसकी आत्मा होता है. वह केवल काग़ज़ों का गठ्ठर नहीं, वह उस राष्ट्र की चेतना का दस्तावेज़ है. भारत का संविधान — दुनिया का सबसे विशाल लिखित संविधान — किसी एक व्यक्ति की कलम से नहीं उतरा. पर एक व्यक्ति थे जिनके बिना यह दस्तावेज़ अधूरा रह जाता. एक व्यक्ति जिन्होंने हर अनुच्छेद पर रातें जागकर बहस की, हर शब्द को तौला, हर अधिकार के पीछे की पीड़ा को समझा. वे व्यक्ति थे — डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर.
"मैं उस धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समता और बंधुता सिखाता है."
— बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर
भारत के इतिहास में बहुत से नायक हुए हैं. कोई तलवार के बल पर पूजा गया, कोई धन के बल पर, कोई वंश के बल पर. परंतु बाबासाहेब अंबेडकर एक अलग ही श्रेणी के नायक हैं. उनके पास न पुश्तैनी राज था, न संपत्ति, न ऊँचा कुल. उनके पास था केवल एक हथियार — विद्या. और उसी एक हथियार से उन्होंने हज़ारों वर्षों की उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी जिसने भारत के एक बड़े हिस्से को मनुष्य से कमतर माना था.
आज हम जिस भारत में जी रहे हैं — जहाँ हर नागरिक को मतदान का समान अधिकार है, जहाँ कोई जाति किसी को मंदिर, कुएँ या पाठशाला से रोक नहीं सकती, जहाँ संविधान की प्रस्तावना में "हम भारत के लोग" लिखा है — वह भारत बाबासाहेब के बिना संभव नहीं था. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है. यह तथ्य है.
परंतु बाबासाहेब का जीवन केवल संविधान से शुरू नहीं होता. वह उसकी अंतिम मंज़िल थी, प्रस्थान-बिंदु नहीं. उनकी असली कहानी शुरू होती है महू नामक एक छोटे-से छावनी-शहर से, जहाँ १४ अप्रैल १८९१ को एक सूबेदार के घर एक बालक का जन्म हुआ. परिवार दलित था — महार जाति का. उस ज़माने में महार होने का अर्थ था — मंदिरों के बाहर खड़े रहना, गाँव के कुएँ का पानी न छू सकना, स्कूल में अलग टाट पर बैठना, सवर्ण बच्चों के पीछे चलना.
उस बालक का नाम पड़ा — भीम. भीम जो आगे चलकर भीमराव बने. और भीमराव जो आगे चलकर भारत के लिए "बाबासाहेब" बने.
इस बालक की कहानी एक चमत्कार जैसी है. एक दलित परिवार से उठकर अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय तक — और वहाँ से लंदन के LSE तक — और वहाँ से वापस भारत आकर अपने ही समाज की आज़ादी के लिए जीवन समर्पित कर देने तक. यह यात्रा सीधी नहीं थी. हर कदम पर अपमान था, हर मोड़ पर अवरोध थे. एक बार रेल-स्टेशन पर उन्हें होटल नहीं मिला क्योंकि वे "अछूत" थे. एक बार बैलगाड़ी का चालक उन्हें बिठाने को तैयार नहीं था. एक बार अदालत में बहस करते हुए विरोधी वकील ने उन्हें "महार" कहकर अपमानित किया.
परंतु हर अपमान को बाबासाहेब ने एक ज्वाला में बदल दिया. वह ज्वाला जिसने आगे चलकर भारत की पूरी सामाजिक व्यवस्था को हिला दिया.
उन्होंने अपने जीवन में एक के बाद एक बड़े मोर्चे लड़े. महाड में चवदार ताल का सत्याग्रह — पानी पीने के मूल अधिकार के लिए. मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन — एक उस ग्रंथ का जिसने सदियों से एक पूरी जाति को मनुष्य से कमतर ठहराया था. नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह — मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए. तीन-तीन गोलमेज़ सम्मेलनों में लंदन की यात्रा. गांधीजी से तीखी बहस और अंत में पूना पैक्ट. स्वतंत्र मज़दूर पार्टी की स्थापना. अनुसूचित जाति संघ का संगठन. और अंत में — भारत के संविधान का प्रारूप-निर्माण.
परंतु जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने एक और बड़ा निर्णय लिया. १४ अक्टूबर १९५६ को नागपुर की दीक्षाभूमि पर लगभग चार लाख अनुयायियों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. उन्होंने कहा था — "मैं हिंदू पैदा हुआ हूँ, यह मेरे हाथ में नहीं था. परंतु मैं हिंदू मरूँगा नहीं, यह मेरे हाथ में है." और उन्होंने अपनी बात रखी.
दीक्षा के ठीक ५३ दिन बाद — ६ दिसंबर १९५६ की एक ठंडी सुबह — दिल्ली के अलीपुर रोड स्थित अपने आवास पर बाबासाहेब का महापरिनिर्वाण हुआ. वे ६५ वर्ष के थे. उनके निधन की ख़बर सुनते ही पूरे भारत में जैसे कोई स्तब्ध-सा हो गया. लाखों लोगों ने उन्हें अपना मार्गदर्शक खो दिया था.
परंतु क्या वे सच में चले गए? नहीं. क्योंकि बाबासाहेब केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक विचार थे. और विचार कभी मरता नहीं. आज लगभग सात दशक बाद भी उनकी प्रतिमाएँ देश के कोने-कोने में खड़ी हैं. हर साल १४ अप्रैल को उनकी जयंती पर देश-विदेश में करोड़ों लोग उन्हें याद करते हैं. ६ दिसंबर — महापरिनिर्वाण दिवस पर मुंबई की चैत्यभूमि पर लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं.
१९९० में, उनकी जन्म-शताब्दी के वर्ष में, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान — भारत रत्न — प्रदान किया. यह सम्मान देर से आया, परंतु आया. क्योंकि सच्चाई कितनी भी देर से आए — आती ज़रूर है.
इस तीस-अध्यायीय यात्रा में हम बाबासाहेब के जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव को देखेंगे. उनके बचपन की पीड़ाओं को. उनकी विद्या-तपस्या को. उनके आंदोलनों को. उनके राजनीतिक संघर्ष को. और अंत में संविधान-रचना और बौद्ध दीक्षा की उस पवित्र-परिणति को.
क्योंकि बाबासाहेब को जानना केवल एक महापुरुष को जानना नहीं है — यह आधुनिक भारत की आत्मा को जानना है. यह उस संघर्ष को समझना है जिसने एक टूटे हुए समाज को संविधान के एक धागे में पिरोया. यह उस सपने को महसूस करना है जिसमें हर भारतीय — चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग, या वर्ग का हो — समान रूप से सम्मान का अधिकारी है.
तो आइए, यात्रा शुरू करें. महू की उस सुबह से — जहाँ एक नवजात की पहली पुकार ने भारत के भविष्य की पटकथा का पहला अक्षर लिखा.
॥ भारत-रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर अमर रहें ॥
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