१४ अप्रैल १८९१. मध्य प्रदेश के एक छोटे-से छावनी-शहर में सूरज की पहली किरणों ने जब छावनी की काली कौलराओं और सिपाहियों के तंबुओं को सोने जैसा रंग दिया, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक सूबेदार के तीन कमरों के घर में जो बालक जन्म ले रहे हैं, वे आगे चलकर पूरे भारत के भाग्य को बदल डालेंगे. नवजात ने अपनी पहली पुकार दी. माँ भीमाबाई के कानों में जैसे कोई मंत्र गूँजा. पिता रामजी सकपाल के होंठों पर एक थकी-सी मुस्कान आई. उनके चौदहवें — और अंतिम — संतान का जन्म हो चुका था.
"बच्चा महार है, परंतु ब्राह्मण के घर भी ऐसा बच्चा कम ही पैदा होता है."
— एक स्थानीय ज्योतिषी, १८९१ की उस सुबह के बारे में पारिवारिक स्मृति
महू — आज के मध्य प्रदेश में इंदौर के पास का यह छोटा-सा शहर — १८९१ में ब्रिटिश भारतीय सेना की एक छावनी था. वहाँ अनेक रेजिमेंट के सिपाही रहते थे. भारत के विभिन्न कोनों से आए सिपाही, उनकी पत्नियाँ, उनके बच्चे — सब मिलकर एक मिश्रित-सी संस्कृति बनाते थे. उसी छावनी की एक छोटी-सी बस्ती में रहते थे सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल — एक मराठी भाषी, जाति से महार, और ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार-मेजर के पद पर तैनात.
उस ज़माने में महार जाति को "अछूत" माना जाता था. हिंदू समाज की चार-वर्ण व्यवस्था में वह उसके भी नीचे थी — पंचम वर्ण. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — और इन चारों के नीचे एक छाया-सी जाति, जिसे चारों वर्ण किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करते थे. महार लोग गाँव की सीमा के बाहर बस्ती बनाकर रहते थे. वे मवेशियों के मरने पर उनकी खाल उतारते थे, गाँव की चौकीदारी करते थे, मरे हुए जानवरों को ठिकाने लगाते थे. यह उनका "नियत कर्म" था — सदियों से.
परंतु महू अलग था. यहाँ छावनी थी. ब्रिटिश सेना ने एक नियम बना रखा था — सिपाही के रूप में जो भी भर्ती हो, वह किसी भी जाति का हो सकता था. और वहाँ अनुशासन था, वेतन था, सम्मान था. कम-से-कम परिवार के अंदर तो था. यही कारण था कि बहुत-से दलित परिवार सेना में सेवा करके अपने बच्चों को एक नई पहचान देने का सपना देखते थे.
रामजी सकपाल भी ऐसे ही एक सपने के साथ सेना में आए थे. उनके पिता मालोजी सकपाल भी सेना में रहे थे. यानी यह तीसरी पीढ़ी थी जो वर्दी पहन रही थी. सेना ने इस परिवार को ज़मीन से उठाकर एक स्थिर सामाजिक धरातल दिया था — जो उस समय किसी दलित परिवार के लिए असाधारण उपलब्धि थी.
रामजी एक अनुशासित और पढ़ा-लिखा व्यक्ति था. वह स्वयं मराठी और थोड़ी अंग्रेज़ी पढ़ सकता था. कबीर के दोहे उसे ज़बानी याद थे. वह तुकाराम के अभंग गाता था. वह बच्चों को कहानियाँ सुनाता था — महाभारत और रामायण की. वह नित्य-स्नान करता था और शाकाहारी था. यानी एक "सात्विक" गृहस्थ का सारा बाह्य रूप उसमें था. परंतु जाति का दाग़ — वह कैसे मिटे?
भीमाबाई — रामजी की पत्नी — मुरबाडकर परिवार से आई थीं. उनके पिता लक्ष्मण मुरबाडकर एक सम्मानित व्यक्ति थे. भीमाबाई शिक्षित नहीं थीं — उस ज़माने में दलित स्त्री की शिक्षा की कल्पना भी असंभव थी — परंतु वे संस्कारी और साहसी महिला थीं. उन्होंने रामजी के साथ एक सेना के सूबेदार की ज़िंदगी जीते हुए चौदह बच्चों को जन्म दिया. उनमें से कई बचे नहीं — बीमारी के, अकाल के, अभाव के कारण.
जो बचे, वे थे — बलराम (सबसे बड़ा), आनंदराव, और सबसे छोटा — भीमराव. साथ में दो बहनें — मंजुला और तुलसा. यानी पाँच भाई-बहन ज़िंदा रहे; नौ नहीं रह सके.
भीम — जो आगे चलकर भीमराव और बाबासाहेब बने — चौदहवीं संतान थे. कुटुंब बूढ़े बरगद की तरह विस्तृत हो चुका था. रामजी की उम्र अब अधिक थी. भीमाबाई का स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं था. यह बच्चा शायद अप्रत्याशित था. यह बच्चा शायद अंतिम था. परंतु यह बच्चा — समय बीतने के साथ — उन सब में सबसे महत्वपूर्ण निकलने वाला था.
नामकरण के समय बच्चे को नाम दिया गया — भीमराव. "भीम" का अर्थ है — विशाल, बलवान. महाभारत के दूसरे पांडव का नाम भी भीम था. बंगाल और मराठवाड़ा में भीम-जयंती पर भीम-पूजा होती है — विशेषकर महार समाज में, जिनकी एक पुरानी मान्यता थी कि वे महाभारतीय भीम के वंशज थे. यह केवल लोक-कथा थी, परंतु उसमें एक गर्व छुपा था — एक भूली हुई महानता की स्मृति.
नवजात भीम को देखकर परिवार के बड़े बुज़ुर्गों ने आशीर्वाद दिए. कुछ ने सलाह दी कि छोटे बच्चे को नज़र न लगे — काली बिंदी लगाओ. कुछ ने कहा — इसका जन्म-नक्षत्र अच्छा है, यह भाग्यवान बनेगा. एक अनुभवी ज्योतिषी ने कथित रूप से कहा था — "बच्चा महार है, परंतु ब्राह्मण के घर भी ऐसा बच्चा कम ही पैदा होता है." पारिवारिक स्मृति में यह वाक्य रह गया है, चाहे ज्योतिषी ने वास्तव में यह कहा हो या न कहा हो.
परंतु अप्रैल १८९१ के उस घर में एक सच यह भी था — बाहर का संसार उन बच्चे को कभी "ब्राह्मण के घर का बच्चा" मानने वाला नहीं था. बाहर का संसार उन्हें "महार" मानने वाला था. वे शिक्षा-संस्थानों में प्रवेश-पत्र पाने के लिए संघर्ष करेंगे. वे स्कूल में अलग कोने में बिठाए जाएँगे. वे कुएँ का पानी नहीं पी सकेंगे. वे बाल-काटने वाले की दुकान में बैठ नहीं सकेंगे. वे बैलगाड़ी पर सवार होने पर अपमानित होंगे. वे बस होटल में चाय नहीं पी सकेंगे.
यह सब उनकी राह में लिखा था. परंतु यह भी लिखा था कि वे इस सब को चुनौती देंगे — और जीतेंगे. परंतु जीत आसान नहीं होगी. हर ईंट के बदले उन्हें एक पत्थर तोड़ना पड़ेगा.
१४ अप्रैल १८९१ की उस सुबह, माँ भीमाबाई की गोद में लेटे उस नवजात ने अपनी छोटी-छोटी आँखें खोलीं. परिवार ने आरती की, मिठाई बाँटी, पड़ोसियों को सूचना दी. किसी ने नहीं सोचा था कि यह तारीख़ एक दिन भारत के कैलेंडर पर लाल अक्षरों में लिखी जाएगी. कि यह तारीख़ "अंबेडकर जयंती" के रूप में हर साल मनाई जाएगी. कि इस तारीख़ को संयुक्त राष्ट्र भी स्मरण करेगा. कि इस तारीख़ को कोलंबिया विश्वविद्यालय जैसे विश्वविख्यात संस्थान विशेष व्याख्यान आयोजित करेंगे.
परंतु इन सब के लिए अभी एक लंबी राह बाकी थी. अभी तो बच्चा केवल कुछ घंटे का था. पिता रामजी ने उसे गोद में लिया, हल्के-से चूमा, और एक छोटी-सी प्रार्थना की — "हे ईश्वर, इस बच्चे को विद्या देना. विद्या ही हमारी मुक्ति का मार्ग है." पिता को नहीं पता था कि उसकी प्रार्थना अक्षरशः पूरी होने वाली थी — और उससे भी बहुत आगे.
अगले अध्याय में हम सूबेदार रामजी सकपाल के परिवार में और गहरे उतरेंगे — कैसे यह परिवार सेना के साथ-साथ चलता था, कैसे रामजी ने अपने बच्चों में पढ़ाई का बीज बोया, और कैसे महार-जाति का होना एक सतत-सा अदृश्य संकट हर पल उन पर मँडराता रहता था.
॥ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर — महू के उस घर का दीप ॥
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