एक छावनी का घर — तीन कमरे, एक छोटा आँगन, बाहर एक नीम का पेड़. वहाँ एक परिवार रहता था जो बाहर की दुनिया की नज़र में "अछूत" था, परंतु अपने भीतर अनुशासन, स्वच्छता और शास्त्र-अध्ययन का एक छोटा-सा संसार रचता था. यह सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल का परिवार था — जहाँ छोटे भीमराव की पहली कक्षा भी लगी और पहली पाठशाला भी.
"विद्या से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं है — न संपत्ति, न ज़मीन, न कुल."
— सूबेदार रामजी का अपने बच्चों को बार-बार दोहराया गया उपदेश
सकपाल परिवार मूलतः रत्नागिरी जिले के अम्बावडे गाँव से था. यह कोंकण की पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था. महार जाति के अनेक परिवार वहाँ रहते थे. वहीं से रामजी के दादा-परदादा सेना में जाने लगे थे. ब्रिटिश सेना ने उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में महार-रेजिमेंट बनाई थी — जिसमें बहुसंख्यक सिपाही महार जाति के थे. इस रेजिमेंट ने अनेक युद्धों में हिस्सा लिया — विशेषकर भीमा-कोरेगाँव की वह प्रसिद्ध लड़ाई जहाँ १८१८ में मुट्ठी-भर महार सिपाहियों ने पेशवा की विशाल सेना को रोक रखा था.
रामजी का जन्म लगभग १८३८ के आसपास हुआ था. वे सेना में भर्ती हुए, अनुशासन सीखा, अंग्रेज़ी का अक्षर-ज्ञान पाया, और धीरे-धीरे सूबेदार-मेजर के पद तक पहुँचे. यह पद उस ज़माने में किसी भी भारतीय सिपाही के लिए ऊँचा माना जाता था. उससे ऊपर के पद आमतौर पर अंग्रेज़ अधिकारियों के लिए सुरक्षित थे.
रामजी की एक विशेषता थी — वे केवल सिपाही नहीं थे, वे एक छोटे विद्वान भी थे. उन्हें मराठी पढ़ना-लिखना अच्छी तरह आता था. उन्होंने मराठी संत-साहित्य का अध्ययन किया था. कबीर, तुकाराम, ज्ञानेश्वर — इनके पद उन्हें कंठस्थ थे. वे रात को बच्चों को बैठाकर रामायण की कथाएँ सुनाते थे — मराठी अनुवाद से. महाभारत के प्रसंग बताते थे. तुकाराम के अभंग गाते थे.
परंतु इन सब के बीच एक स्वर लगातार गूँजता रहता था — विद्या का स्वर. रामजी एक ही बात बार-बार कहते थे अपने बच्चों से — "हम महार हैं. यह सच है. यह बदल नहीं सकता. परंतु एक चीज़ हम कर सकते हैं — विद्या ले सकते हैं. विद्या से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है. ब्राह्मण के पास विद्या है — इसी से वह ऊँचा है. तुम विद्या लोगे — तो तुम भी ऊँचे होगे."
यह विचार तब क्रांतिकारी था. एक महार सूबेदार अपने बच्चों से कह रहा था कि वे भी ब्राह्मण की तरह पढ़ सकते हैं. यह विचार तब विद्रोह था. क्योंकि सदियों से जो व्यवस्था थी, वह कहती थी — महार के बेटे का काम है मवेशियों के पीछे चलना, गाँव की चौकीदारी करना, मरे जानवरों की खाल उतारना. विद्या? वह तो ब्राह्मण की संपदा है.
परंतु रामजी इस व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं थे. और उनकी पत्नी भीमाबाई भी पीछे नहीं थीं. भले ही वे अनपढ़ थीं, परंतु पढ़ाई के मूल्य को वे समझती थीं. उन्होंने अपने हिस्से की रोटी कम खाकर बच्चों के लिए बचाई. उन्होंने पुराने वस्त्र पहन कर बच्चों के लिए नए दिलाए. उन्होंने अपनी कमर तोड़ती मेहनत से वह घर सजाया जहाँ बच्चे सहूलियत से पढ़ सकें.
परिवार में अनुशासन कड़ा था. सुबह उठते ही स्नान. फिर एक छोटी-सी पूजा — विट्ठल और रुक्मिणी की प्रतिमा के सामने, जिनकी पंढरपुर यात्रा वारकरी संप्रदाय का केंद्र-बिंदु है, जहाँ की भक्ति-परंपरा कबीर और तुकाराम जैसे संतों से जुड़ी थी जिनके पद रामजी के होंठों पर रहते थे. नाश्ता साधारण होता था — चावल, दाल, कभी-कभी रोटी. मांसाहार नहीं था. शराब का तो सवाल ही नहीं उठता था. रामजी ने एक दृढ़ निश्चय किया था — "हम सेना में होते हुए भी अपने आचरण में किसी ब्राह्मण से कम नहीं रहेंगे. क्योंकि बाहर का संसार हमें जाति से देखेगा, परंतु ईश्वर हमारे आचरण से देखेगा."
यह वातावरण छोटे भीमराव के बालमन पर गहरी छाप छोड़ रहा था. वे देखते थे कि उनके पिता हर सुबह नियम से उठते हैं, हर रात पुस्तक पढ़ते हैं. वे देखते थे कि उनकी माँ कितनी मेहनत करती है — तीन कमरों के घर को साफ़-सुथरा रखना, चौदह-चौदह बच्चों को जन्म देकर पालना, खाना बनाना, कपड़े सिलना, बच्चों को पढ़ाई के लिए तैयार करना.
परंतु इस घर के बाहर एक दूसरी दुनिया थी. वह दुनिया जो बच्चे की समझ अभी पकड़ नहीं पाई थी. वह दुनिया जहाँ माँ कुएँ पर पानी भरने जाए तो लोग चिल्लाते — "अरे महारिन! दूर हट! तू पानी छुएगी तो हमें कुआँ धोना पड़ेगा." वह दुनिया जहाँ पिता को सेना के बाहर दुकान में जाने पर भी अधिकतर सामान-सेवा बाहर खड़े-खड़े लेनी पड़ती थी. वह दुनिया जहाँ छोटे भीम को सहेली मिलनी कठिन थी — क्योंकि किसी भी सवर्ण माँ-बाप अपने बच्चों को महार बच्चों के साथ नहीं खेलने देते थे.
एक छोटी-सी घटना याद रहती है. भीमराव लगभग चार वर्ष के थे. वे घर के बाहर के नीम के पेड़ के नीचे खेल रहे थे. एक सवर्ण ब्राह्मण-बालक उधर से गुज़रा. भीम ने मुस्कुराकर कहा — "खेलोगे?" बालक रुका. कुछ क्षण भीम को देखा. फिर अपनी माँ की ओर देखकर पूछा — "माँ, क्या मैं इसके साथ खेलूँ?" माँ ने झट से उसका हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए कहा — "नहीं! वह छोटा है पर महार है. तू उसके साथ नहीं खेल सकता. चल यहाँ से."
छोटे भीम स्तब्ध-से रह गए. उन्हें समझ नहीं आया — वह "महार" क्या होता है, और क्यों इस कारण उनके साथ कोई नहीं खेल सकता. यह उनका पहला परिचय था जातिगत भेदभाव से. यह घटना पारिवारिक स्मृति में रह गई — चाहे विवरण कुछ भिन्न हों — और यह उन घटनाओं की एक लंबी श्रृंखला का प्रथम बिंदु थी जो आगे चलकर उनके भीतर एक ज्वालामुखी की तरह उबलती रहीं.
परंतु घर के अंदर भीम सुरक्षित थे. वहाँ उन्हें प्यार था, अनुशासन था, कहानियाँ थीं. रामजी छोटे बच्चों को इकट्ठा करके मराठी अक्षरमाला सिखाते. भीमाबाई गोद में लेकर लोरियाँ गातीं. बड़े भाई बलराम और आनंदराव छोटे भाई की देखभाल करते. बहनें मंजुला और तुलसा कभी-कभी झगड़ती भी थीं — पर अधिकतर प्यार बँटाती थीं.
१८९४ के आसपास परिवार पर एक बड़ी आपदा आई. माँ भीमाबाई का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ने लगा. चौदह बच्चों को जन्म देने के बाद उनका शरीर कमज़ोर हो गया था. लंबी बीमारी के बाद वे चल बसीं. भीम तब लगभग तीन-चार वर्ष के थे. उन्हें माँ का चेहरा शायद पूरी तरह याद भी नहीं रहा. परंतु एक बच्चे के लिए माँ का जाना — यह एक ऐसा घाव होता है जो जीवन भर भरता नहीं.
माँ के जाने के बाद घर बदल गया. बच्चों की देखभाल एक मौसी ने की — मीराबाई, भीमाबाई की बहन. वे भीम को बहुत प्यार करती थीं. उन्होंने पाँच मातृहीन बच्चों को अपने सीने से लगाया. परंतु एक माँ की जगह कोई नहीं ले सकता.
इस समय रामजी सेना से सेवानिवृत्त होने के क़रीब थे. उनकी पेंशन पर अब परिवार का खर्च चलता था. महू छोड़कर परिवार दापोली के पास चला गया — कुछ समय वहाँ रहा. फिर सतारा पहुँचा. यह जगह बच्चे के बचपन के सबसे महत्वपूर्ण अध्याय की पार्श्वभूमि बनने वाली थी. क्योंकि सतारा के स्कूल में भीम का पहला साक्षात्कार उस संसार से होने वाला था जो उन्हें महार बच्चा कहकर अलग टाट पर बिठाएगा.
अगले अध्याय में हम सतारा पहुँचेंगे — और देखेंगे एक बालक के जीवन का पहला बड़ा घाव.
॥ श्री रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई सकपाल — एक दलित परिवार की प्रथम विद्या-दीप ॥
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