1 बेताल पच्चीसी FREE 2 पद्मावती की कथा FREE 3 तीन तरुण ब्राह्मणों की कथा FREE 4 शुक-सारिका की कथा ₹0 5 वीरवर की कथा ₹0 6 सोमप्रभा की कथा ₹0 7 रजक-कन्या की कथा ₹0 8 सत्त्वशील की कथा ₹0 9 तीन चतुर पुरुषों की कथा ₹0 10 राजकुमारी अनंगरति की कथा ₹0 11 सदनसेना की कथा ₹0 12 राजा धर्मध्वज की कथा ₹0 13 यशकेतु की कथा ₹0 14 ब्राह्मण हरिस्वामी की ऋथा ₹0 15 वणिक-पुत्नी की कथा ₹0 16 शशिप्रभा की कथा ₹0 17 जीमूतवाहन की कथा ₹0 18 उन्मादिनी की कथा ₹0 19 ब्राह्मणगकुमार की कथा ₹0 20 चद्रस्वामी की कथा ₹0 21 राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा ₹0 22 अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा ₹0 23 चार ब्राह्मण भाइयों की कथा ₹0 24 अघोरी तपस्वी की कथा ₹0 25 शक अद्भुत कथा ₹0 26 भिक्षु शान्तशील की कथा ₹0
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तीन तरुण ब्राह्मणों की कथा

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Funtel
21 Mar 2026
महाराज विक्रमादित्य पुनः उसी शिशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचे। वहां चिता की मटमैली रोशनी में उनकी नजर भूमि पर पड़े उस शव पर पड़ी जो धीरे-धीरे कराह रहा था | rnrnउन्होंने शव को उठाकर कंधे पर डाला और चुपचाप उसे उठाए तेज गति से लौट पड़े। rnrnकुछ आगे चलने पर शव के अंदर से बेताल की आवाज आई---राजन ! तुम अत्यंत अनुचित क्लेश में पड़ गए, अतः तुम्हारे मनोरंजन के लिए मैं एक कहानी सुनाता हूं, सुनो | ”” rnrnयमुना किनारे ब्रह्मस्थल नाम का एक स्थान है, जो ब्राह्मणों को दान में मिला हुआ था। वहां वेदों का ज्ञाता अग्निस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके यहां मन्दरावती नाम की एक अत्यंत रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। जब वह कन्या युवती हुई, तब तीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुमार वहां आए जो समान भाव से समस्त गुणों से अलंकृत थे | rnrnउन तीनों ने ही उसके पिता से अपने लिए कन्या की याचना की। कितु कन्या के पिता ने उनमें से किसी के भी साथ कन्या का विवाह करना स्वीकार नहीं किया क्योकि उसे भय हुआ कि ऐसा करने पर वे तीनों आपस में ही लड़ मरेंगे। इस तरह वह कन्या कुआंरी ही रही | ह rnrnवे तीनों ब्राह्मण कुमार भी चकोर का व्रत लेकर उसके मुखमंडल पर टकटकी लगाए रात-दिन वहीं रहने लगे | rnrnएक बार मंदारवती को अचानक दाह-ज्वर हो गया और उसी अवस्था में उसकी मौत हो गई। उसके मर जाने पर तीनों ब्राह्मण कुमार शोक से बड़े विकल हुए और उसे सजा-संवारकर श्मशान ले गए, जहां उसका दाह-संस्कार किया | rnrnउनमें से एक ने वहीं अपनी एक छोटी-सी मढ़ैया बना ली और मंदारवती की चिता की भस्म अपने सिराहने रखकर एवं भीख में प्राप्त अन्न पर निर्वाह करता हुआ वहीं रहने लगा | rnrnदूसरा उसकी अस्थियों की भस्म लेकर गंगा-तट पर चला गया और तीसरा योगी बनकर देश-देशांतरों के भ्रमण के लिए निकल पड़ा | rnrnयोगी बना वह ब्राह्मण घूमता-फिरता एक दिन वत्रोलक नाम के गांव में जा पहुंचा। वहां अतिथि के रूप में उसने एक ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया। ब्राह्मण द्वारा सम्मानित होकर जब वह भोजन करने बैठा, तो उसी समय एक बालक ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। बहुत बहलाने-समझाने पर भी जब बालक चुप न हुआ तो घर की मालकिन ने क्रुद्ध होकर उसे हाथों में उठा लिया और जलती हुई अग्नि में फेंक दिया। आग में गिरते ही, कोमल शरीर वाला वह बालक जलकर राख हो गया। यह देखकर उस योगी को रोमांच हो आया। उसने परोसे हुए भोजन को आगे सरका दिया और उठकर खड़ा होते हुए क्रोधित भाव में बोला---धिक्कार है आप लोगों पर। आप ब्राह्मण नहीं, कोई ब्रह्म-राक्षस हैं। अब मैं तुम्हारे घर का भोजन तो क्या, एक अन्न का दाना भी ग्रहण नहीं करूंगा | ” rnrnयोगी के ऐसा कहने पर गृहस्वामी बोला---' है योगिराज, आप कुपित न हों। मैं बच्चे को फिर से जीवित कर लूंगा। मैं एक ऐसा मंत्र जानता हूं जिसके पढ़ने से मृत व्यक्ति जीवित हो जाता है| ” rnrnयह कहकर वह गृहस्थ, एक पुस्तक ले आया जिसमें मंत्र लिखा था। उसने मंत्र पढ़कर उससे अभिमंत्रित धूल आग में डाल दी। आग में धूल के पड़ते ही वह बालक जीवित होकर ज्यों-का-त्यों आग से निकल आया | rnrnजब उस ब्राह्मण योगी का चित्त शांत हो गया तो उसने भोजन ग्रहण किया | गृहस्थ ने उस पुस्तिका को बांधकर खूंटी पर टांग दिया और भोजन करके योगी के साथ वहीं सो गया! गृहपति के सो जाने के पश्चात्‌ वह योगी चुपचाप उठा और अपनी प्रिया को जीवित करने की इच्छा से उसने डरते-डरते वह पुस्तक खूंटी से उतार ली और चुपचाप बाहर निकल आया | rnrnरात-दिन चलता हुआ, वह योगी उस जगह पहुंचा, जहां उसकी प्रिया का दाह हुआ था। वहां पहुंचते ही उसने उस दूसरे ब्राह्मण को देखा जो मंदारवती की अस्थियां लेकर गंगा में डालने गया था | rnrnतब उस योगी ने उससे तथा उस पहले ब्राह्मण से, जिसने वहां कुटिया बना ली थी और चिता-भस्म से सेज रच रखी थी कहा कि--“तुम यह कुटिया यहां से हटा लो जिससे मैं एक मंत्र शक्ति के द्वारा इस भस्म हुई मदारवती को जीवित करके उठा 6 rnrnइस प्रकार उन्हें बहुत समझा-बुझाकर उसने वह कुटिया उजाड़ डाली। तब वह योगी पुस्तक खोलकर मंत्र पढ़ने लगा। उसने धूल को अभिमत्रित करके चिता-भस्म में डाल दिया और मंदारवती उसमें से जीती-जागती निकल आई। अन्न में प्रवेश करके निकलते हुए उसके शरीर की कांति पहले से भी अधिक तेज हो गई थी। उसका शरीर अब ऐसा लगने लगा था जैसे वह सोने का बना हुआ हो | इस प्रकार उसको जीवित देखकर वे तीनों ही काम-पीडित हो गए और उसको पाने के लिए आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। जिस योगी ने मत्र से उसे जीवित किया था वह बोला कि वह स्त्री उसकी है। उसने उसे मंत्र-तंत्र से प्राप्त फिया है। दूसरे ने कहा कि तीर्थो के प्रभाव से मिली वह उसकी भार्या है। तीसरा बोला कि उसकी भस्म को रखकर rnrnबेताल पच्चीसी (0 9 rnrnrnअपनी तपस्या से उसने उसे जीवित किया है, अतः उस पर उसका ही अधिकार है। rnrnइतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा--- राजन ! उनके इस विवाद का निर्णय करके तुम ठीक-ठीक बताओ कि वह स्त्री किसकी होनी चाहिए ? यदि तुम जानते हुए भी न बतला पाए तो तुम्हारा सिर फटकर अनेक टुकड़ों में बंट जाएगा । ”” rnrnबेताल द्वारा कहे हुए शब्दों को सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कहा---' है बेताल ! जिस योगी ने कथ् उठाकर भी, मंत्र-तंत्र से उसे जीवित किया, वह तो उसका पिता हुआ। ऐसा काम करने के कारण उसे पति नहीं होना चाहिए और जो ब्राह्मण उसकी अस्थियां गंगा में डाल आया था, उसे स्वयं को उस स्त्री का पुत्र समझना चाहिए। कितु, जो उसकी भस्म की शैय्या पर आलिंगन करते हुए तपस्या करता रहा और श्मशान में ही बना रहा, उसे ही उसका पति कहना चाहिए, क्योंकि गाढ़ी प्रीति वाले उस ब्राह्मण ने ही पति के समान आचरण किया था। ” rnrn“तूने ठीक उत्तर दिया राजा किंतु ऐसा करके तूने अपना मौन भंग कर दिया। इसलिए मै चला वापस अपने स्थान पर | ” यह कहकर बेताल उसके कंधे से उतरकर लोप हो गया | rnrnराजा ने भिक्षु के पास ले जाने के लिए, उसे फिर से पाने के लिए कमर कसी क्योंकि धीर वृत्ति वाले लोग प्राण देकर भी अपने दिए हुए वचन की रक्षा करते हैं। तब राजा फिर से उसी स्थान की ओर लौट पडा जहां से वह शव को उतारकर लाया था। 
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