भारत के सबसे महान क्रांतिकारी, भगत सिंह के जीवन और विचारों पर आधारित यह महागाथा, उनके जन्म (1907) से लेकर शहादत (1931) तक की असाधारण यात्रा को दर्शाती है। यह ड्रामा केवल एक वीर सेनानी की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा विचारक की कहानी है जिसने बंदूक से ज़्यादा अपनी कलम और तर्कों से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
जलियाँवाला बाग के सदमे से उपजी प्रतिज्ञा से लेकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' के गठन, साँडर्स हत्याकांड, ऐतिहासिक सेंट्रल असेंबली बम कांड, और जेल की भूख हड़ताल तक, यह कहानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान और उनकी समाजवादी 'इंकलाब ज़िंदाबाद' की भावना को गहराई से दर्शाती है।
जानिए कैसे एक नौजवान ने अदालत को क्रांति के मंच में बदल दिया और अपनी शहादत से भारत की स्वतंत्रता की चिंगारी को ज्वाला बना दिया।
(SOUND: सुबह का शांत, ग्रामीण माहौल। दूर से खेतों में काम करने वालों की आवाज़ें। पास में एक बच्चे के रोने की धीमी आवाज़।)
विद्यावती: (शांत, ममत्वपूर्ण आवाज़ में) हाय, मेरा लाल! क्यों रो रहा है? लगता है आज दिन बहुत बड़ा होने वाला है।
(SOUND: दरवाज़ा खुलता है। किशन सिंह की थकी हुई, लेकिन ख़ुश आवाज़।)
किशन सिंह: (हल्के से) विद्या! बधाई हो! आज लक्ष्मी आई है! (रोते हुए बच्चे की ओर देखते हुए) अरे, यह तो लड़का है!
विद्यावती: (हँसते हुए) लड़का! तो अब घर में तीन बच्चे हो गए। पर आज आप इतने खुश क्यों हैं?
किशन सिंह: (गर्व और रहस्यमय आवाज़ में) खुश इसलिए हूँ कि आज मेरा छोटा भाई अजीत सिंह और मैं ख़ुद, जेल से रिहा हो रहे हैं। (एक गहरी साँस लेता है) जिस दिन भगत (भाग्य) आया, उसी दिन हम आज़ाद हुए! इस बच्चे का नाम आज से भगत सिंह!
(SOUND: माँ की हँसी। बच्चे की रोने की आवाज़ धीमी पड़ जाती है। संगीत ऊपर उठता है—एक गंभीर, राष्ट्रवादी धुन जो परिवार की विरासत को दर्शाती है। FADE OUT.)
(SOUND: लगभग १२ साल बाद। १९१९ की दोपहर। बच्चों के खेलने की आवाज़। अचानक शोर और अफ़रा-तफ़री।)
बाल भगत (९ वर्ष): (दोस्तों से) रुको! यह शोर कैसा है? लोग कहाँ भाग रहे हैं?
दोस्त: कुछ अंग्रेज़ों ने अमृतसर में... जलियाँवाला बाग में... बहुत बुरा किया है! पिताजी कह रहे थे, चारों तरफ़ ख़ून ही ख़ून है!
बाल भगत: (अविश्वास से) ख़ून? किसका? क्यों?
(SOUND: भागते हुए लोगों की चीख़ें, रोने की आवाज़ें, और दूर से आती हुई पुलिस की सीटी की हल्की आवाज़।)
विद्यावती (O.S., घबराकर): भगत! कहाँ हो तुम? घर के अंदर आओ!
(SOUND: भगत सिंह तेज़ी से भागता है, उसके कदम पत्थरों पर पड़ते हैं। वह शोर की दिशा में जाता है।)
बाल भगत: (अपने आप से बुदबुदाता है) मुझे देखना है! मुझे सच देखना है!
(SOUND: भगत सिंह की साँसें फूल रही हैं। वह भीड़ को चीरकर आगे बढ़ता है। अंत में, वह रुक जाता है। एक डरावना सन्नाटा छा जाता है, जिसे सिर्फ चीख़ों और सिसकियों की दबी हुई आवाज़ें तोड़ती हैं।)
बाल भगत: (हकलाते हुए) यह... यह क्या है?
(SOUND: ज़मीन पर पड़े जूते और कुछ धातु की वस्तुएँ। रोने की और ज़ख़्मों की आवाज़ें।)
बाल भगत: (अपने दोस्त से, जो उसके पास है) दोस्त, यह गोलियाँ... इतनी क्यों हैं? ये सब लोग... ज़मीन पर क्यों लेटे हैं?
दोस्त: (डर के मारे फुसफुसाते हुए) जनरल डायर ने... बिना चेतावनी दिए... निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चला दीं। हज़ारों...
(SOUND: भगत सिंह की आँखों में अविश्वास और क्रोध। वह ज़मीन पर घुटने टेकता है।)
बाल भगत: (धीरे से, फिर ज़ोर से) यह अन्याय है! यह कैसा राज है? कैसा धर्म है?
(SOUND: भगत सिंह अपनी जेब से एक छोटा, पुराना रूमाल निकालता है।)
बाल भगत: मैं इस मिट्टी को जाने नहीं दूँगा। इस मिट्टी में हमारे लोगों का ख़ून है। (वह काँपते हाथों से रूमाल में मिट्टी भरता है।)
(SOUND: मिट्टी को रूमाल में बाँधने की हल्की आवाज़।)
बाल भगत: (आवाज़ में एक प्रतिज्ञा) इस ख़ून का बदला लिया जाएगा। जिस दिन हम आज़ाद होंगे, उस दिन यह मिट्टी शांति से सोएगी। यह मेरी शपथ है! यह मिट्टी... क्रांति का बीज है!
(SOUND: दृढ निश्चय वाला संगीत ऊपर उठता है, जो उनके बचपन के विश्वास को दर्शाता है। मराठी और पंजाबी लोक संगीत का मिश्रण धीरे-धीरे एक गंभीर, क्रांतिकारी धुन में बदल जाता है। FADE OUT.)
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