Setting: १९१५-१९२४. भगत सिंह का गाँव, और लाहौर का नेशनल कॉलेज। पात्र (Characters):
किशन सिंह (Kishan Singh): भगत सिंह के पिता।
बाल/युवा भगत (Young Bhagat): (८-१७ वर्ष)
प्रोफेसर जयचंद (Professor Jaichand): नेशनल कॉलेज में भगत सिंह के शिक्षक।
सुखदेव (Sukhdev): कॉलेज का दोस्त।
(SOUND: कुछ साल बीत चुके हैं। गाँव में किशन सिंह की ज़ोरदार आवाज़। एक ग्रामीण बहस का माहौल।)
किशन सिंह: (गुस्से में) नहीं! भगत, तुम कॉलेज में हो! तुम्हारा काम है पढ़ना! खेतों में बंदूकें क्यों बो रहे हो?
युवा भगत (१५ वर्ष): (तर्क के साथ) पिताजी! बचपन में आपने ही तो बताया था— मेरे जन्म के दिन आप और चाचा अजीत सिंह जेल से रिहा हुए थे! चाचा आज कहाँ हैं? निर्वासित! क्योंकि उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई थी!
(SOUND: भगत सिंह के हाथों से मिट्टी के बीज और छोटी बंदूकें ज़मीन पर गिरती हैं।)
किशन सिंह: अजीत सिंह... वह एक तूफ़ान थे! उन्होंने किसानों को 'पगड़ी संभाल जट्टा' आंदोलन से जगाया था! पर उनके रास्ते में बहुत मुश्किलें आईं। मैं नहीं चाहता कि तुम भी उसी रास्ते पर चलो!
युवा भगत: मुश्किलों से डरकर क्रांति नहीं रूकती, पिताजी! मेरी मिट्टी की सौगंध... मैंने जलियाँवाला बाग में ली थी। मैं खेतों में सिर्फ बंदूकें नहीं, बल्कि आज़ादी के बीज बो रहा हूँ!
(SOUND: पिता की निराशा में भरी एक गहरी साँस। scene change music: समय बीतने का एक तीव्र, शैक्षिक संगीत।)
(SOUND: लाहौर नेशनल कॉलेज का गलियारा। किताबों की सरसराहट, बहस की हल्की आवाज़ें। १९२४)
प्रोफेसर जयचंद: (क्लास में, उत्तेजित आवाज़ में) छात्रों! यूरोप में साम्यवाद (Communism) और क्रांति की आग फैल रही है! लेनिन और कार्ल मार्क्स दुनिया को एक नई दिशा दे रहे हैं।
(SOUND: क्लास में फुसफुसाहट।)
प्रोफेसर जयचंद: पर भारत में? हम अभी भी सिर्फ याचिकाएँ लिख रहे हैं! क्या आप जानते हैं कि आयरलैंड में सिन फेन आंदोलन (Sinn Féin movement) ने कैसे अंग्रेज़ों को चुनौती दी?
सुखदेव: (कॉलेज के दोस्त, फुसफुसाते हुए) भगत, प्रोफेसर की बातों में आग है!
युवा भगत (१७ वर्ष): (शांत, लेकिन गहरी आवाज़ में) सुखदेव, यह आग नहीं, यह मशाल है। अब हमें किताबों से बाहर निकलकर असलियत में कदम रखना होगा। हमें सिर्फ आज़ादी नहीं चाहिए, हमें एक नया समाज चाहिए।
सुखदेव: 'नया समाज'? तुम क्या सोचते हो?
युवा भगत: जहाँ अमीर और गरीब का भेद न हो। जहाँ मज़दूरों और किसानों का राज हो! हमें गांधी जी के रास्ते पर चलते हुए यह देखना होगा कि वह हमें कहाँ ले जाते हैं। लेकिन अगर उन्होंने बीच में ही समझौता कर लिया, तो हमें अपना रास्ता बनाना होगा।
(SOUND: भगत सिंह अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ पर्चा निकालता है।)
युवा भगत: (सुखदेव से, आत्मविश्वास से) हम 'नौजवान भारत सभा' का गठन करेंगे। धर्म नहीं, बल्कि क्रांति ही हमारी पहचान होगी।
सुखदेव: (उत्साहित होकर) तो चलो! किताबों के पन्ने बंद करो! क्रांति का काम शुरू करते हैं!
(SOUND: दोनों दोस्तों के मज़बूत कदम दूर जाते हैं। पृष्ठभूमि में तेज़ी से टाइपिंग की और प्रिंटिंग प्रेस की आवाज़ आती है, जो पर्चे और पत्रिकाएँ छापने का प्रतीक है। संगीत उठता है—क्रांतिकारी उत्साह और दृढ़ता की धुन। FADE OUT.)
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