Setting: १९२६, लाहौर। गुप्त बैठकें और सार्वजनिक सभाएँ। पात्र (Characters):
भगत सिंह (Bhagat Singh): (१९ वर्ष) वैचारिक रूप से मज़बूत।
सुखदेव (Sukhdev): संगठन के संस्थापक सदस्य।
भगवती चरण वोहरा (Bhagwati Charan Vohra): संगठन के विचारक और प्रचारक।
भीड़/जनता (Crowd): (भीड़ की फुसफुसाहटें)
(SOUND: लाहौर के एक अँधेरे कमरे में मोमबत्ती की टिमटिमाहट और हल्की फुसफुसाहट। दरवाज़ा धीरे से बंद होता है।)
भगत सिंह: (शांत, दृढ़ आवाज़ में) दोस्तों! मैंने 'नौजवान भारत सभा' का संविधान तैयार किया है। हमारा पहला और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है: धर्म और राजनीति का पूर्ण अलगाव।
भगवती चरण वोहरा: (आवाज़ में तर्क) बिल्कुल सही! क्रांति का मतलब सिर्फ अंग्रेज़ों को भगाना नहीं है, बल्कि धर्म के नाम पर बंटे हुए समाज को भी एकजुट करना है। हमें दिखाना होगा कि एक हिंदू और एक मुस्लिम का दुश्मन एक ही है—ब्रिटिश साम्राज्यवाद।
सुखदेव: पर भगत, यह आसान नहीं होगा। गांधी जी और कांग्रेस के नेता... वे मंच पर हमेशा धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। लोग इसे ही देशभक्ति मानते हैं।
भगत सिंह: (मेज़ पर ज़ोर से हाथ पटकता है) इसीलिए हमने 'सभा' बनाई है! हम युवाओं को समझाएँगे कि धार्मिक अंधविश्वास और जातीय भेद-भाव से आज़ादी नहीं मिलेगी। हम चाहते हैं कि हर युवा वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्षता को अपनाए।
(SOUND: मोमबत्ती की फड़फड़ाहट। सुखदेव की घबराहट में भरी साँस।)
सुखदेव: अगर हमने ऐसा किया, तो कांग्रेस और रूढ़िवादी नेता हमारे ख़िलाफ़ हो जाएँगे।
भगत सिंह: (हँसते हुए) अच्छी बात है! अगर हमारा उद्देश्य सही है, तो हम किसी के ख़िलाफ़ होने से नहीं डरते! हमारा अंतिम लक्ष्य है समाजवाद (Socialism) स्थापित करना।
(SOUND: एक खुले मैदान में सार्वजनिक सभा की आवाज़। भीड़ का शोरगुल। दूर से आती हुई 'भारत माता की जय' की दबी हुई आवाज़।)
भगवती चरण वोहरा: (माइक पर, ऊँची आवाज़ में) नौजवानों! सरकार का ध्यान किसानों और मज़दूरों पर नहीं है! अंग्रेज़ों का नियम गरीबों को और गरीब बना रहा है!
(SOUND: भीड़ में हल्की-सी फुसफुसाहट और कुछ लोगों की सहमति की आवाज़।)
भीड़ का सदस्य १: यह नौजवान ठीक कह रहा है। महंगाई ने कमर तोड़ दी है।
भीड़ का सदस्य २: पर ये तो किसी भी धर्म की बात नहीं कर रहे हैं? अजीब सभा है।
भगत सिंह: (माइक पर आता है, भीड़ शांत हो जाती है। उसकी आवाज़ स्पष्ट और तीखी है।) दोस्तों! इस देश को सिर्फ दो वर्ग बाँटते हैं: शोषक (Exploiters) और शोषित (Exploited)! क्या कोई धर्म बताता है कि एक मज़दूर को भूखा सोना चाहिए? नहीं!
भगत सिंह: (पूरे जोश से) धर्म को अपनी निजी आस्था रहने दो, मगर क्रांति का मैदान, राजनीति का मैदान सिर्फ मानवता का होना चाहिए! हम चाहते हैं, ऐसा 'स्वराज' जहाँ गोरा साहब चला जाए और उसकी जगह काला साहब आकर न बैठ जाए! हम चाहते हैं, मज़दूरों और किसानों का राज!
(SOUND: भीड़ में पहले सन्नाटा, फिर ज़बरदस्त तालियों और 'इंकलाब ज़िंदाबाद' के नारों की शुरुआत! यह नारा बाक़ी सभी नारों पर हावी हो जाता है।)
भीड़ (जोर से): इंकलाब ज़िंदाबाद! इंकलाब ज़िंदाबाद!
(SOUND: संगीत ऊपर उठता है—उत्साह, एकता, और क्रांति की शक्तिशाली धुन। FADE OUT.)
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