मेरे पिता ने तो मेरा नाम गदाधर सिंह रखा था और बहुत दिनों तक में इसी नाम से प्रसिद्ध भी था परन्तु समय पड़ने पर मेंने अपना नाम भूतनाथ रख लिया था और इस समय यही नाम बहुत प्रसिद्ध हो रहा है । आज में श्रीमान् महाराज सुरेन्द्रसिंह जी की आज्ञानुसार अपनी जीवनी लिखने बैठा हूँ , परन्तु में इस जीवनी को वास्तव में जीवनी के ढंग और नियम पर न लिख कर उपन्यास के ढंग पर लिलूँगा , क्योंकि यद्यपि लोगों का कथन यही है , " तेरी जीवनी से लोगों को नसीहत होगी ' परन्तु ऐवों और भयानक घटनाओं से भरी हुई मेरी नीरस जीवनी कदाचित् लोगों को रुचिकर न हो , इस खयाल से जीवनी का रास्ता छोड़ इस लेख को उपन्यास के रूप में लाकर रस पैदा करना ही मुझे आवश्यक जान पड़ा , प्रेमी पाठक महाशय यही समझें कि किसी दूसरे ही आदमी ने भूतनाथ का हाल लिखा है , स्वयं भूतनाथ ने नहीं , अथवा इसका लेखक कोई और ही है । rnrnrnजेठ का महीना और शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी का दिन है । यद्यपि रात पहर - भर से कुछ ज्यादा हो चुकी है और आँखों में ठंडक पहुँचाने वाले चन्द्रदेव भी दर्शन दे रहे हैं परन्तु दिन भर की धूप और लू की बदौलत गरम भई हुई जमीन , मकानों की छते और दीवारें अभी तक अच्छी तरह ठंडी नहीं हुई , अब भी कभी - कभी सहारा दे देने वाले हवा के झपटे में गर्मी पड़ती हे और वदन से पसीना निकल रहा है , बाग में सैर करने वाले शोकीनों भी पंखे की जरूरत है , और जंगल में भटकने वाले मुसाफिरों को भी पेड़ों की आड़ बुरी मालूम पड़ती है । rnrnrnऐसे समय में मिर्जापुर से बाईस कोस दक्खिन की तरफ हट कर छोटी - सी पहाड़ी के ऊपर जिस पर बड़े - बड़े घने पेड़ों की कमी तो नहीं है । मगर इस समय पत्तों की कमी के सबब नसकी खूबसूरती नष्ट हो गई हे , एक पत्थर की चट्टान पर हम ढाल - तलवार तथा तीर - कमान लगाए हुए दो आदमी को बैठे देखते हैं जिनमें से एक औरत और दूसरा मर्द है । औरत की उम्र चौदह या पन्द्रह वर्ष की होगी की उम्र बीस वर्ष से rnrnrnकम मालूम नहीं होती । यद्यपि इन दोनों की पोशाक मामूली सादी और विलकुल ही साधार [ की है मगर सूरत - शक्ल से यही जान पड़ता है कि ये दोनों साधारण व्यक्ति नहीं हैं बल्कि किसी अमीर बहादुर rnrnrnक्षत्रीय खानदान के होनहार हैं । जिस तरह मर्द चपकन , पायजामा , कमरबंद और मुड़ासे से अपनी सूरत ढंग की बना रखी है । यकायक सरसरी निगाह देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि यह औरत हे , मगर हम खूब जानते हैं कि यह कमसिन औरत नौजवान लड़की है जिसकी खूबसूरती मर्दानी पोशाक पहिरने पर ही यकताई का दावा करती है , मगर जिसकी शर्मली आँखें कह देती हैं कि इसमें ढिठाई और दबंगता बिलकुल नहीं है , चेहरे पर गर्द पड़ी है सुस्त होकर पत्थर की चट्टान पर बैठ गए हैं , तथा रात्रि का समय भी है , इसलिए यहाँ पर इन दोनों की खूबसूरती तथा नखशिख का वर्णन करके हम श्रृंगार रस पैदा करना उचित नहीं समझकर केवल इतना ही कह देना काफी समझते हैं कि ये दोनों सौ दो सौ खूबसूरतों में खूबसूरत हैं । इन दोनों की अवस्था इनकी बातचीत से जानी जाएगी अस्तु आइए और छिपकर सुनिए कि इन दोनों में क्या बातें हो रही हैं । rnrnrnऔरत : वास्तव में हम लोग बहुत दूर निकल आए | rnrnमर्द: अब हमें किसी का डर भी नहीं है । rnrnऔरत : हे तो ऐसा ही परन्तु घोड़ों की तरफ से जरा - सा खुटका होता है , क्योंकि हम दोनों के मरे हुए घोड़े अंगर कोई जान - पहिचान का आदमी देख लेगा तो जरूर इसी प्रांत में हम लोगों को खोजेगा । rnrnमर्द फिर भी कोई चिंता नहीं , क्योंकि उन घोड़ों को भी हम लोग कम - से - कम दो कोस पीछे छोड़ आए हैं । rnrnऔरत : बेचारे घोड़े अगर मर न जाते तो हम लोग और भी कुछ दूर आगे निकल गए होते । rnrnमर्द : यह गर्मी का जमाना , इतने कड़ाके की धूप और इस तेजी के साथ इतना लंबा सफर करने पर भी घोड़े जिंदा रह जाएँ तो बड़े ताज्जुब की बात है !! rnrnऔरत : ठीक है , अच्छा यह बताइए कि अब हम लोगों को क्या करना होगा ? rnrnrnमर्द: इसके सिवाय और किसी बात की जरूरत नहीं है कि हम लोग किसी दूसरे राज्य की सरहद में जा पहुँचे | ऐसा हो जाने पर फिर हमें किसी का डर न रहेगा , क्योंकि हम लोग किसी का खून करके नहीं भागे हैं न किसी की चोरी की है, और न किसी के साथ अन्याय या अधर्म करके भागे हैं , बल्कि एक अन्यायी हकिम के हाथ से अपना धर्म बचाने के लिए भागे हैं । ऐसी अवस्था में किसी न्यायी राजा के राज्य में पहुँच जाते ही हमारा कल्याण होगा । rnrnrnऔरत : निःसन्देह ऐसा ही है , फिर आपने क्या विचार किया , किसके राज्य में जाने का इरादा है? rnrnrnमर्दः मुझे तो राजा सुरेन्द्रसिंह का राज्य बहुत ही पसन्द है , वह राजा धर्मात्मा और न्यायी है तथा उनका राज्य भी बहुत दूर नहीं है यहाँ से केवल तीन ही चार कोस और आगे निकल चलने पर उनकी सरहद में पहुँच जाएंगे । औरत : वाह वाह ! तो इससे बढ़कर और क्या बात हो सकती हे । आप यहाँ क्यों जहाँ इतनी तकलीफ उठाई वहाँ थोड़ी ही सही । मर्द : में भी इसी खयाल में हूँ मगर अपने नौकरों का इंतजार कर रहा हूँ उन्हें अपने से मिलने के लिए यही ठिकाना बताया हुआ है । औरत : जब राजा सुरेन्द्रसिंह की सरहद इतनी नजदीक है और rnrnrnके हुए हैं? आगे बढ़ कर चलिए, rnrnrnआपका देखा हुआ है तो ऐसी अवस्था में यहाँ ठहरकर नोकरों का इंतजार करना मेरी राय में तो ठीक नहीं है । मर्द : तुम्हारा कहना कठिन है और नौगढ़ का रास्ता भी मेरा देखा हुआ है परन्तु रात का समय है और इस तरफ का जंगल बहुत ही घना और भयानक है तथा रास्ता भी पथरीला और पेचीदा हे , संभव है कि रास्ता भूल जाऊँ और किसी दूसरी ही तरफ जा निकल | यदि में अकेला होता तो कोई गम न था मगर तुमको साथ लेकर रात्रि के समय भयानक जानवरों से भरे हुए ऐसे घने जंगल में घुसना उचित नहीं जान पड़ता । मगर देखो तो सही ( गर्दन उठाकर और गीर से नीचे की तरफ देखकर ) वे शायद हमारे ही आदमी तो आ रहे हैं | मगर गिनती में कम मालूम होते हैं । औरत : ( गीर से देख कर ) ये तो केवल तीन ही चार आदमी हैं , शायद कोई और हों | rnrnrnमर्द : देखो ये लोग भी इसी पहाड़ी के ऊपर चले आ रहे हैं , अगर ये कोई और हैं तो यहाँ आकर तुम्हें देख लेना अच्छा | न होगा ! इसलिए मैं जरा आगे बढ़कर देखता हूँ कि कौन हैं । rnrnrnइतना कहकर वह नौजवान उठ खड़ा हुआ और उसी तरफ बढ़ा जिधर से वे लोग आ रहे थे | कुछ ही दूर आगे बढ़ने और पहाड़ी से नीचे उतरने पर उन लोगों का सामना हो गया । यद्यपि रात का समय था और केवल चाँदनी ही का सहारा था, तथापि सामना होते ही एक ने दूसरे को पहचान लिया । हमारे नौजवान को मालूम हो गया कि ये हमारे दुश्मन के आदमी हैं और उन लोगों को निश्चय हो गया कि हमारे मालिक को इसी नौजवान के गिरफ्तारी की जरूरत है । rnrnrnये लोग जो दूर से गिनती में तीन - चार मालूम पड़ते थे वास्तव में छ: आदमी थे जो हर तरह से मजबूत और लड़ाई के दुरुस्त थे | ढाल - तलवार के अलावे सभों के कमर में खंजर और हाथ में नेजा था उन सभों में से एक ने आगे बढ़कर नौजवान से कहा , " बड़ी खुशी की बात है कि आप स्वयम् हम लोगों के सामने चले आए । कल से हम लोग आपकी खोज में परेशान हो रहे हैं बल्कि सच तो यह है कि ईश्वर ही ने हम लोगों को यहाँ तक पहुँचा दिया और यहाँ आपका rnrnrnसामना हो गया । क्षमा कीजिएगा , आप हमारे अफसर और हाकिम रह चुके हैं इसलिए हम लोग आपके साथ वेअदबी नहीं करना चाहते मगर क्या करें मालिक के हुक्म से लाचार हैं , जिसका नमक खाते हैं । इस बात को हम लोग खूब जानते हैं कि आप बिलकुल बेकसूर हें और आप पर व्यर्थ ही जुल्म किया जा रहा है , परन्तु .. rnrnrnनौजवान : ठीक है , ठीक है , मेरे प्यारे गुलाबसिंह ! में तुम्हें अभी तक वैसा ही समझता हूँ और प्यार करता हूँ क्योंकि तुम वास्तव में नेक हो और मुझसे मुहब्बत रखते हो । तुम वेशक मुझे गिरफ्तार करने के लिए आये हो और मालिक के नमक का हक अदा किया चाहते हो , अस्तु में खुशी से तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम मुझे गिरफ्तार करके अपने मालिक के पास ले चलो , परन्तु क्षत्रियों का धर्म निवाहने के लिए में गिरफ्तार न होकर तुमसे लड़ाई अवश्य करूँगा , इसी तरह तुम्हें भी मेरा मुलाहिजा न करना चाहिए । rnrnrnगुलाबसिंह : ठीक है , वेशक ऐसा ही चाहिए , परन्तु ( कुछ सोच कर ) मेरा हाथ आपके ऊपर कदापि न उठेगा ! मुझे अपने जालिम मालिक की तरफ से वदनामी उटाना मंजूर है परन्तु आप ऐसे वहादुर और धर्मात्मा के आगे लज्जित होना स्वीकार नहीं है । हाँ मैं अपने साथियों को ऐसा करने के लिए मजबूर न करूँगा , ये लोग जो चाहें करें । rnrnयह सुनते ही गुलाबसिंह के साथियों में से एक आदमी बोल उठा , " नहीं नहीं , कदापि नहीं , हम लोग आपके विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकते और आपकी ही आज्ञा पालन अपना धर्म समझते हैं । सज्जनों और धर्मात्माओं की आज्ञा पालने का नतीजा कभी बुरा नहीं होता ! " rnrnrnइसके साथ ही गुलाबसिंह के बाकी साधी भी बोल उठे , “ वेशक ऐसा ही है , बेशक ऐसा ही है ! " rnrnrnगुलाबसिंह : ( प्रसन्नता से ) ईश्वर की कृपा है कि मेरे साथी लोग से अव आप ही आज्ञा कीजिए कि हम लोग क्या करें ? क्यों rnrnrnइच्छानुसार चलने के लिए तैयार हैं । ( नौजवान भी में अपने को आपका दास ही समझता हूँ । rnrnrnनौजवान : मेरे प्यारे गुलाबसिंह , शाबाश ! इसमें सन्देह कि तुम्हारे ऐसे नेक और वहादुर आदमी का साथ बड़े भाग्य से होता है । में तुम्हें अपने आधीन पाकर बहुत प्रसन्न था और अब भी ही इच्छा रहती है कि ईश्वर तुम्हें मेरा साथी बनाये , मगर क्या करूँ , लाचार हूँ, क्योंकि आज मेरा वह समय नहीं हे । आज मुसीबत के फंदे में फॅस जाने से में इस योग्य नहीं रहा कि तुम्हारे ऐसे बहादुरों का साथ ... ( लंबी साँस लेकर ) अस्तु ईश्वर की मर्जी, जो कुछ वह करता है अच्छा ही करता है , कदाचित् इसमें भी मेरी कुछ भलाई ही होगी । ( कुछ सोच कर ) में तुम्हें क्या बताऊँ कि क्या करो ? तुम्हारे मालिक ने वेश धोखा खाया कि मेरी गिरफ्तारी के लिए तुम्हें भेजा , इतने दिनों तक साथ रहने पर भी उसने तुम्हें और मुझे नहीं पहिचाना । मुझे इस समय कुछ भी नहीं सूझता कि तुम्हें क्या नसीहत करूँ: किस तरह उस दुष्ट का नमक खाने से तुम्हें रोकूँ ! गुलावसिंह : ( कुछ सोच कर ) खैर कोई चिंता नहीं , जो होगा देखा जाएगा । इस समय में आपका साथ कदापि न छोडुंगा और इस मुसीबत में rnrnrnआपको अकेले भी न रहने दूंगा जो कुछ आप पर वीतेगी उसे मैं भी सहूंगा । ( अपने साथियों से ) भाइयो , अब तुम लोग जहाँ चाहे जाओ और जो मुनासिव समझो करो , मैं तो आज इनके दुःख - सुख का साथी बनता हूँ । यद्यपि ये ( नौजवान ) उम्र में मुझसे बहुत छोटा है परन्तु मैं इन्हें अपना पिता समझता हूँ और पिता ही की तरह इन्हें मानता हूँ, अस्तु जो कुछ पुत्र का धर्म है मैं उसे निवाहूँगा । मैं इनको गिरफ्तार करने की आशा पाकर बहुत प्रसन्न था और यही सोचे हुए था कि इस बहाने से इन्हें ढूँढ़ निकालूँगा और सामना होने पर इनकी सेवा स्वीकार करूँगा । rnrnrnगुलाबसिंह की बातें सुनकर उसके साथियों ने जवाब दिया , “ ठीक है , जो कुछ उचित था आपने किया परन्तु आप हम लोगों का तिरस्कार क्यों कर रहे हैं ? क्या हम लोग आपकी सेवा करने योग्य नहीं हैं ? या हम लोगों को आप बेईमान समझते हैं ? " rnrnrnगुलावसिंह : नहीं - नहीं , ऐसा कदापि नहीं है , मगर बात यह हे कि जो कोई मुसीबत में पड़ा हो उसका साथ देने वाले को भी मुसीबत झेलनी पड़ती है , अस्तु मुझ पर तो जो कुछ बीतेगी उसे झेल लूँगा , तुम लोगों को जान - बूझकर क्यों मुसीबत rnrnrnमें डालूँ! इसी खयाल से कहता हूँ कि जहाँ जी में आवे जाओ और जो कुछ मुनासिब समझो करो । rnrnrnगुलाबसिंह के साथी : नहीं - नहीं , ऐसा कदापि न होगा और हम लोग आपका साथ कभी न छोड़ेंगे । आप आज्ञा दें कि अंब हम लोग क्या करें । rnrnrnगुलाबसिंह : ( कुछ सोच कर ) अच्छा , अगर तुम लोग हमारा साथ देना ही चाहते हो तो जो कुछ हम चाहते हैं उसे करो । यहाँ से इसी समय चले जाओ । ( नौजवान तरफ बता कर ) इनके मकान में जिसे राजा साहब ने जब्त कर लिया है रात के समय जिस तरह संभव हो घुसकर जहाँ तक दोलत हाथ लगे और उठा सको निकाल कर ले आओ और पिपलिया घाटी में जहाँ का पता तुम लोगों को मालूम है हमसे मिलो , अगर वहाँ, हमसे मुलाकात न हो तो टिक कर हमारा इंतजार करो । rnrnrnगुलाबसिंह की बात सुनकर उसके साथियों ने “ जो आज्ञा " कह कर सलाम किया और वहाँ से चले गए । उनके जाने के वाद गुलाबसिंह ने नौजवान से कहा , " इस rnrnrnसमय इन लोगों को विदा कर देना ही मैंने उचित जाना । यद्यपि ये लोग मेरे साथ रहने में प्रसन्नता प्रकट करते हैं परन्तु कुछ टेढ़ा काम लेकर जाँच कर लेना जरूरी है । " नौजवान : ठीक है तुम्हारे ऐसे होशियार आदमी के लिए यह कोई नई बात नहीं है । इस विषय में आपको कुछ जाँच करने rnrnगुलाबसिंह : अच्छा अब यह बताइए कि आपको मुझ पर विश्वास है या नहीं ? की आवश्यकता है? rnrnनौजवान : नहीं - नहीं , मुझे कुछ जाँच करने की जरूरत नहीं है , मुझे । पर पूरा - पूरा विश्वास और भरोसा है , में तुमसे मिल कर बहुत ही प्रसन्न हुआ , ऐसी अवस्था में यकायक जाने पर मुझे किसी तरह का खुटका नहीं हुआ rnrnथा। rnrnयह बताइए कि आप मुझे अकेले क्यों दिखाई देते हैं और अब rnrnगुलावसिंह : ईश्वर आपका मंगल करे , अंब कृपा आपका इरादा क्या है ? rnrnनौजवान : में अकेला नहीं हूँ मेरी मेरे साथ हे ( हाथ का इशारा करके ) इस पहाड़ी के ऊपर उसे अकेला छोड़ आया हूँ । हम दोनों आदमी अपने नोकरों का इंतजार कर रहे थे कि यकायक तुम लोगों पर निगाह पड़ी , अस्तु उसे उसी जगह छोड़ कर तुम लोगों का पता लगाने के लिए में नीचे उतर आया था , अब तुम मेरे साथ वहाँ चलो और उससे मिलो , वह तुम्हें देखकर बहुत ही प्रसन्न होगी । इस आफत में भी वह तुम्हें बराबर याद करती रही । rnrnगुलाबसिंह : चलिए , शीघ्र चलिए । rnrnगुलावसिंह को साथ लेकर नोजवान उस तरफ रवाना हुआ जहाँ अपनी स्त्री को अकेला छोड़ आया था | rnrnगुलावसिंह क्षत्री खानदान का एक बहादुर और ताकतवर आदमी था , वह बहुत ही नेक , रहमदिल और धर्म का सच्चा पक्षपाती था , साध - ही - साथ वह बदमाशों की चालबाजियों को खूब समझता था और अच्छे लोगों में से बेइमानों और दगावाजों को छाँट निकालने में भी विचित्र कारीगर था । वह उस नौजवान और उसकी स्त्री से rnrnrnसच्ची मुहब्बत और हमदर्दी रखता था , जिसका बहुत बड़ा सबव यह था कि उस स्त्री के पिता ने बहुत संकट के समय में गुलाबसिंह की सच्ची सहायता की थी और गुलाबसिंह को लड़के की तरह मानता था ।
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