इस जगह पर हम इस नौजवान और इसकी सुशीला स्त्री का नाम खोल देना उचित समझते हैं | मगर इस बात को अभी न खोलेंगे कि दोनों कौन हैं और इनके इस तरह बेसरोसामान भागने का सबब क्या है । rnrnrnनोजवान का नाम प्रभाकर सिंह और स्त्री का नाम इंदुमति । प्रभाकर सिंह की शादी इंदुमति के साथ भये हुए आज एक rnrnrnवर्ष और सात महीने हो चुके हैं । rnrnrnप्रभाकर सिंह और गुलाबसिंह बातचीत करते हुए इंदुमति की तरफ रवाना हुए और बहुत जल्द वहाँ जा पहुँचे इंदुमति चिंता - निमग्न बेठी हुई अपने पति का इंतजार कर रही थी । पति को देखकर वह प्रसन्नता के साथ उठ बैठी और जब उसने गुलाबसिंह को पहिचाना तो बहुत खुश होकर बोली इंदुमति : में पहिले ही कहती थी कि गुलाबसिंह को हम लोगों के विषय में बड़ी चिंता होगी और वे जरूर हमारी सुध लेंगे । rnrnrnगुलाबसिंह : वेशक ऐसा ही है इसीलिए जिस समय राजा साहब ने आप लोगों की गिरफ्तारी का काम मेरे सुपुर्द किया तो मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ और .. rnrnrnगुलाबसिंह अपनी बात पूरी न करने पाये थे कि लगभग चालीस - पचास गज की दूरी पर से सीटी बजने की आवाज आई जिसे सुनते ही तीनों चौंक पड़े और उसी तरफ देखने लगे । वेचारी इंदु को दुश्मन का खयाल आया गया और वह डरी हुई आवाज में बोली , “ यहाँ तक भाग आने पर भी हम लोगों का खुटका न गया , इसी से में कहती थी कि जहाँ तक जल्द हो सके नोगढ़ की सरहद में हमें पहुँच जाना चाहिए! " गुलाबसिंह : ( इंदु से डरो मत , हम दोनों क्षत्रियो के रहते किसकी मजाल है कि किसी तरह की तकलीफ पहुँचा सके । इसके अतिरिक्त इस बात को भी समझारखी कि आज दिन सिवाय बेईमान राजा के और कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं हे और उसकी तरफ से इस काम के लिए में ही भेजा गया हूँ , अवस्था में किसी वास्तविक दुश्मन का ध्यान लगाना वृधा है , हाँ चोर - डाकू में से यदि कोई हो तो में कह सकत rnrnrnइंदुमति : खैर पेड़ों की आड़ में तो हो जाइए । rnrnगुलाबसिंह : हाँ इसके लिए कोई हर्ज नहीं । rnrnइतने ही में पुनः सीटी की आवाज आई , मगर अबकी दफे की आवाज कुछ अजीब ढंग की थी । मालूम न होता था कि कोई बँधे हुए इशारे के साथ झिरनी आवाज देकर सीटी बुला रहा है । इस आवाज को सुनकर गुलाबसिंह हँस पड़ा और इंदु तथा प्रभाकर सिंह की तरफ देख के बोला , " बस मालूम हो गया , डरने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि यह मेरे एक दोस्त की बजाई हुई सीटी है , में अभी जरूरी बातों से छुट्टी पाकर थोड़ी ही देर में आप लोगों से कहने वाला था कि यहाँ मेरे एक दोस्त का मकान है जिससे मिलकर आप बहुत प्रसन्न होंगे, और उनसे आपको सहायता भी पूरी - पूरी मिल सकती है । में अब इस सीटी का जवाब देता हूँ । बहुत अच्छा जो अकस्मात् वे खुद यहाँ आ पहुँचे । मालूम होता है कि मेरा यहाँ आना उन्हें मालूम हो गया ! " rnrnrnइतना कहकर गुलाबसिंह ने भी कुछ अजीब ढंग की सीटी बजाइ अर्थात् उस सीटी का जवाब दिया । rnrnrnप्रभाकर सिंह : भला अपने इस अनूठे दोस्त का नाम तो बता दो ? rnrnगुलावसिंह : आजकल इन्होंने अपना नाम भूतनाथ रख छोड़ा है । rnrnप्रभाकर सिंह : ( कुछ सोच कर ) यह नाम तो कई दफे मेरे कानों में पड़ चुका हे और एक दफे ऐसा भी सुन चुका हूँ कि इस नाम का एक आदमी बड़ा ही भयानक है जिसके रहन - सहन का किसी को कुछ पता नहीं चलता । rnrnगुलाबसिंह : ठीक हे , आपने ऐसा ही सुना होगा , परन्तु यह केवल दुष्टों और पापियों के लिए भयानक है । rnrnगुलाबसिंह इससे ज्यादा कुछ कहने न पाया था कि सीटी बजाने वाला अर्थात् भूतनाथ वहाँ आ पहुँचा । प्रभाकर सिंह को rnrnसलाम करने के बाद भूतनाथ गुलाबसिंह के गले मिला और इसके बाद चारों आदमी पत्थर को ।।। १ rnrnrnतरह बातचीत करने लगे: rnrnrnगुलाबसिंह : ( भूतनाथ से यहाँ यकायक आपका इस तरह आ पहुँचना बड़े आश्चर्य की बात है ।। rnrnrnभूतनाथ : आश्चर्य काहे का है ! यहाँ तो मेरा ठिकाना ही ठहरा , या यों कहिए कि यह दिन रात का रायता ।।।। rnrnrnगुलाबसिंह : ठीक है , मगर फिर भी आपका घर यहाँ से आधे घंटे की दूरी पर होगा ऐसी अणा rnrnrnआप दिन - रात इसी पहाड़ी पर दिखाई दें ? rnrnभूतनाथ : ( हँसकर ) हाँ सो तो सच है , मगर आप जो यहाँ आ पहुँचे तो फिर क्या किया जाय , आखिर गलाकात करना rnrnभी तो जरूरी ठहरा ! rnrnगुलाबसिंह : ( हँसी के साथ ) बस तो सीधे यही क्यों नहीं कहते कि मेरा यहाँ आना आपको मालूम हो गया । rnrnभूतनाथ : वेशक आपका आना मुझे मालूम हो गया बल्कि और भी कई बातें मालूम हुई हैं जिनसे आप लोगों को rnrnहाशियार कर देना जरूरी है । ( प्रभाकर सिंह की तरफ देख कर ) अभी तक दुश्मनों से आपका पीछा नया साल ) rnrnगुलाबसिंह ही आपकी गिरफ्तारी के लिए नहीं भेजे गये बल्कि इनको भेजने के आपके राजा साहब ने और भी बहुत rnrnसे आदमी आप लोगों को पकड़ने के लिये भेजे जो इस समय इस पहाड़ी पर - उधर आ गये हैं और आप rnrnआदमियों को भी उन लोगों ने गिरफ्तार कर लिया है जिनका शायद इंतजार करते होंगे । rnrnप्रभाकर सिंह : ( ताज्जुब में आकर ) आपकी जुबानी बहुत - सी rnrnआप तो इस तरह बयान कर रहे हैं जैसे कोई जादूगर rnrnrnबयान करता हो ! मालूम हुई ! मुझे इन सबकी कर भी खबर न थी । अन्दर जमाने भर की हालत देख - देख कर सभा में rnrnrnगुलाबसिंह : यही तो इनमें एक अनूठी बात है जिससे बड़े - बड़े नामी ऐयार दंग रहा करते हैं । इनसे किसी भेद का लिया rnrnrnरहना बहुत ही कठिन है । ( भूतनाथ । तो मेरे प्यारे दोस्त , में प्रभाकर सिंह और इंदुमति को आपको सुपुर्द करता rnrnrnहूँ । जिससे इनका कल्याण हो सो कीजिए । यह बात आपसे छिपी हुई नहीं है कि में इन्हें कैसा मानता हूँ । rnrnrnभूतनाथ : में सब जानता हूँ और इसीलिए यहाँ आया भी हूँ , परन्तु अब विशेष बातचीत करने का मौका नही , आप rnrnrnठहरिए और मेरे पीछे आइए । rnrnrnप्रभाकर सिंह : ( उठते हुए ) मुझे अपने लिए कुछ भी फिक्र नहीं है , केवल बेचारी इंदु के लिए मुझे नामों की तमा नागने rnrnrn| - की और अदने - अदने आदमियों से छिपकर चलने ... rnrnrnभूतनाथ : ( बात काटकर ) मैं खूब जानता हूँ , मगर क्या कीजिएगा , समय पर सब कुछ करना पड़ता है , आँख सात rnrnrnटटोलना पड़ता है ! rnrnसब कोई उठकर भूतनाथ के पीछे - पीछे रवाना हुए । rnrnजो कुछ हाल हम ऊपर बयान कर चुके हैं इसमें कई घंटे गुजर गये । rnrnपिछले पहर की रात बीत रही है , चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है , इन चारों के पैरों के तले दबने वाले राखो पत्तों की rnrnrnचरमराहट के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती भूतनाथ इन तीनों को साथ लिए | । । rnrnrnऔर अनजान रास्ते से वात - की - बात में पहाड़ी के नीचे उतर आया और इसके बाद दक्षिण की तरफ जाने लगा । rnrnrnजंगल - ही - जंगल लगभग आधा कोस के जाने के बाद ये लोग पुनः एक पहाड़ के नीचे पहुँचे । इस जगह का जंगल भी rnrnrnघना तथा रास्ता घूमघुमौवा और पथरीला था । भूतनाथ इस तरह घूमता और चक्कर देता हुआ पेचीली पगडंडियों पर जाने लगा कि कोई अनजान आदमी उसकी नकल नहीं कर सकता था , अथवा ये समझना चाहिए कि एक - दो दफे का जानकार आदमी भी धोखे में आकर भटक सकता था , किसी अनजान का जाना तो बहुत ही कठिन बात है । कुछ ऊपर चढ़ने के बाद घूमता - फिरता भूतनाथ एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ पत्थरों के बड़े - बड़े ढोकों के अन्दर छिपी हुई एक गुफा थी । इन तीनों के लिए हुए भूतनाथ उस गुफा के अन्दर घुसा । आगे - आगे भूतनाथ , उसके पीछे गुलाबसिंह , उसके बाद इंदुमति और सबसे पीछे प्रभाकर सिंह जाने लगे । कुछ दूर गुफा के अन्दर जाने के बाद भूतनाथ ने अपने ऐयारी के बटुए में से समान निकाल कर मोमबत्ती जलाई और उसकी रोशनी के सहारे अपने साथियों को ले जाने लगा । लगभग पचीस गज के जाने के बाद एक चीमुहानी मिली अर्थात् जहाँ से एक रास्ता सीधी तरफ चला गया था , दूसरा बाई तरफ , और तीसरी सुरंग दाहिनी तरफ चली गई थी , तथा चौथा रास्ता वह था जिधर से ये लोग आये थे । यहाँ तक तो रास्ता खुलासा था मगर आने का रास्ता बहुत ही बारीक और तंग था जिसमें दो आदमी बराबर से मिलकर नहीं चल सकते थे |
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें