यहाँ पर आकर भूतनाथ अटक गया और मोमबत्ती की रोशनी में आगे की दोनों सुरंगों को बताकर अपने साथियों से बोला , “ हमारे मकान में जाने वाले को इस दाहिनी तरफ वाली सुरंग में घुसना चाहिए । सामने अथवा बाइ तरफ वाली सुरंग में जाने वाला किसी तरह जीता नहीं बच सकता है । " rnrnrnइतना कहकर भूतनाथ दाहिनी तरफ वाली सुरंग में घुसा और कुछ दूर जाने के र rnrnrnउसने मोमबत्ती बुझा दी । rnrnrnलगभग दो सौ कदम चले जाने के बाद यह सुरंग खतम हुई और उसका दूसरा मुहाना नजर आया । सबके पहले भूतनाथ सुरंग से बाहर हुआ , उसके बाद गुलाबसिंह और उसके पीछे रवाना हुई , मगर प्रभाकर सिंह न निकले तीन आदमी घूम कर उनका इंतजार करने लगे कि शायद पीछे गए हों मगर कुछ देर इंतजार करने पर भी वे नजर न आये । इंदुमति का कलेजा उछलने लगा , उसकी दाहिनी फड़क उठी और आँखों में आँसू डबडबा आये । भूतनाथ ने इंदुमति और गुलाबसिंह को कहा , “ तुम जरा इसी दम लो , मैं सुरंग में घुस कर प्रभाकर सिंह का पता लगाता हूँ । " इतना कहकर भूतनाथ पुनः उसी सुरंग में घुस गया rnrnप्रभाकर सिंह पीछे - पीछे चले आते थे , यकायक केसे और कहाँ गायब हो गये ? क्या उस सुरंग में कोइ दुश्मन छिपा हुआ था जिसने उन्हें पकड़ लिया ? या उन्होंने खुद हमें धोखा देकर हमारा साथ छोड़ दिया ? इत्यादि तरह - तरह की बातें सोचती हुई इंदु बहुत ही परेशान हुई , मगर इस आशा ने कि अभी - अभी भूतनाथ उनका पता लगा के सुरंग से लोटाता ही होगा , उसे बहुत कुछ सम्हाला और वह एकदम सुरंग की तरफ टकटकी लगाये खड़ी देखती रही , परन्तु थोड़ी ही देर में उसकी यह आशा भी जाती रही जब उसने भूतनाथ को अकेले ही लौटते देखा और दुःख के साथ भूतनाथ ने बयान किया कि “ उनसे मुलाकात नहीं हुई ! मेरी समझ में नहीं आता कि क्या भेद है और उन्होंने हमारा साथ क्यों छोड़ा? क्योंकि अगर किसी छिपे हुए दुश्मन ने हमला किया होता तो कुछ मुँह से आवाज तो आई होती या चिल्लाते तो सही ' ! rnrnगुलाबसिंह : नहीं भूतनाथ , ऐसा तो नहीं हो सकता । प्रभाकर सिंह पर हम भागने का इलजाम तो नहीं लगा सकते । rnrnभूतनाथ : जी तो मेरा भी नहीं चाहता कि उनके विषय में मैं ऐसा कहूँ परन्तु घटना ऐसी विचित्र हो गई कि में किसी तरफ अपनी राय पक्की कर नहीं सकता । हाँ इंटुमति कदाचित् इस विषय में कुछ कह सकती हों ! rnrnइतना कह कर भूतनाथ ने इंदु की तरफ देखा मगर इंदु ने कुछ जवाब न दिया , सिर जमीन को देखती रही , मानो उसने कुछ सुना ही नहीं ! अबकी दफे गुलाबसिंह ने उसे संबोधन किया जिससे और एकदम फूट - फूट कर रोने और कहने लगी , “ वस मेरे rnrnrnलिए दुनिया इतनी ही धी । मालूम हो गया कि बदकिस्मती मेरा साथ न छोड़ेगी । में व्यर्थ ही आशा में पड़ कर दुखी हुई और उन्हें भी दुःख दिया । मेरे ही लिए इतना कष्ट भोगना पड़ा और मुझ अभागिन के ही कारण उन्हें जंगल की खाक छाननी पड़ी । हाय , क्या अब दुनिया में रहकर उनके दर्शन कर सकती हूँ? क्यों न इसी समय अपने दुखांत नाटक का अंतिम पर्दा गिरा निश्चिन्त हो जाऊँ ? " rnrnrnइस इत्यादि इसी ढंग की बातें करती हुइ इंदु प्रलापवास्था लांघकर बेहोश हो गई और जमीन पर गिर पड़ी । rnrnrnगुलाबसिंह और भूतनाथ को उसके विषय में बड़ी चिंता हुई और वे लोग उसे होश में लाकर समझाने - बुझाने तथा शान्त करने की चिंता करने लगे । rnrnrnभूतनाथ का यह स्थान कुछ का था । इसमें भूतनाथ की कोई कारीगरी न थी , इसे प्रकृति ही ने कुछ अनूठा और सुन्दर बनाया हुआ था । इसके विषय में अंगर भूतनाथ की कुछ कारीगरी थी तो केवल इतनी ही कि उसने इसे खोज निकाला था , जिसका रास्ता बहुत ही कठिन और भयानक था | जिस जगह इंदुमति , भूतनाथ और गुलाबसिंह खड़े हैं वहाँ से दिन के समय यदि आप आँख उठाकर चारों तरफ देखिए तो आपको मालूम होगा कि लगभग चौदह या पन्द्रह rnrnबिगहे के चौरस जमीन , चारों तरफ के ऊँचे - ऊँचे और सरसन्न पहाड़ों से सुन्दर और सुहावने सरोवर के जल की तरह * घिरी हुई है । जिस तरह चारों तरफ के पहाड़ों पर खुशरंग फूल - पत्ती की बहुतायत दिखाई दे रही है उसी तरह यह जमीन rnrnrnभी नरम घास की बदौलत सब्ज मखमली फर्श का नमूना बन रही है और जगह - जगह पर पहाड़ से गिरे हुए छोटे - छोटे चश्मे भी बह रहे हैं । यद्यपि आजकल पहाड़ों के लिये सरसब्जी का मोसम नहीं है मगर यहाँ पर कुछ ऐसी कुदरती तरावट है कि जिसके सबब से ' पतझड़ के मौसम का कुछ पता नहीं लगता , यों समझ सकते हैं कि बरसात के मौसम में आजकल से कहीं बढ़ - चढ़कर खुबी , खूबसूरती और सरसब्जी नजर आती होगी । rnrnrnइस स्थान में किसी तरह की इमारत बनी हुई न थी मगर चारों तरफ के पहाड़ों में सुन्दर और सुहावनी गुफाओं और कंदराओं की इतनी बहुतायत थी कि हजारों आदमी बड़ी खुशी और आराम के साथ यहाँ गुजारा कर सकते थे । इन् । गुफाओं में भूतनाथ तथा उसके तीस - चालीस संगी - साथियों का डेरा था और इन्हीं गुफाओं में उसके जरूरत की सब चीजें और हर्वे इत्यादि रहा करते थे , तथा उसके पास जो कुछ दौलत थी वह भी कहीं इन्हीं जगहों में होगी , जिसका ठीक ठीक पता उसके साथियों को भी न था । भूतनाथ का कथन ऐसे - ऐसे कई स्थान उसके कब्जे में हैं और इस बात का कोई निश्चय नहीं है कि कव या कितने दिनों तक यह किस स्थान में अपना डेरा रखता या रखेगा । rnrnrnसुबह की सफेदी अच्छी तरह फेल चुकी थी अब भूतनाथ और गुलाबसिंह के उद्योग से इंटुमति होश में आइ । यद्यपि वह खुद इस खोह के बाहर होकर प्रभाकर सिंह की खोज में जान तक देने के लिए तैयार थी और ऐसा करने के लिए वह जिद्द भी कर रही थी मगर भूतनाथ और गुलाबसिंह ने उसे बहुत समझा - बुझाकर ऐसा करने से बाज रखा और वादा किया कि बहुत जल्दी उनका पता लगाकर उनके दुश्मनों को नीचा दिखाएँगे । rnrnrnये सब बातें हो ही रही थीं कि भूतनाथ के आदमी गुफाओं और कंदराओं में से निकलकर वहाँ आ पहुँचे जिन्हें भूतनाथ ने अपनी ऐयारी भाषा में कुछ समझा - बुझाकर विदा किया । इसके बाद एक स्वच्छ और प्रशस्त गुफा में जो उसके डेरे के बगल में थी इंदुमति का डेरा दिलाकर और गुलावसिंह को उसके पास छोड़कर वह भी उन दोनों से विदा हुआ और अपने एक शागिर्द को साथ लेकर उसी सुरंग की राह अपनी इस दिलचस्प पहाड़ी के बाहर हो गया । rnrn। जब भूतनाथ सुरंग के बाहर हुआ तो सूर्य भगवान उदय हो चुके थे । उसे जरूरी कामों अथवा नहाने - धोने , खाने - पीने की कुछ भी फिक्र न थी , वह केवल प्रभाकर सिंह का पता लगाने की धुन में था । rnrnयह वह जमाना था जब चुनार की गद्दी पर महाराज शिवदत्त को बैठे दो वर्ष का समय बीत चुका था । उसकी ऐयाशी की चर्चा घर - घर में फेल रही थी और बहुत से नालायक तथा लुच्चे शोहदे उसकी जात से फायदा उठा रहे थे । उधर जमानिया में rnrnrnदारोगा साहब की बदौलत तरह - तरह के साजिशें हो रही थीं और उनकी का दोरदौरा खूब अच्छी तरह तरक्की कर रहा था ' अस्तु इस समय खड़े होकर सोचते हुए भूतनाथ का एक दफे जमानिया की तरफ और फिर दूसरी दफे चुनारगढ़ की तरफ गया । rnrnrnअपने शागिर्द से , जिसका नाम भोलासिंह था , सुरंग से बाहर निकल एक घने पेड़ के नीचे भूतनाथ बैठ गया और कहा rnrnrnभूतनाथ : भोलासिंह , मुझे इस बात का शक होता हे पाकर उसने प्रभाकर सिंह को पकड़ लिया | rnrnrnदुश्मन ने इस खोह का रास्ता देख लिया और मोका rnrnrnभोलासिंह : मगर गुरुजी , मेरे चित्त में तो बात नहीं बेठती । क्या प्रभाकर सिंह इतने कमजोर थे कि आपके पीछे आते समय एक आदमी ने उन्हें पकड़ और उनके मुँह से आवाज तक न निकली ? इसके अतिरिक्त यह तो संभव ही न था कि बहुत से आदमी आपके पीछे - पीछे आते और आपको आहट भी न मिलती । rnrnrnभूतनाथ : तुम्हारा कहना ठीक है और इन्हीं बातों को सोचकर में कह रहा हूँ कि दुश्मन के आने का शक होता है , यह नहीं कहता कि निश्चय होता है अस्तु जो कुछ हो, में प्रभाकर सिंह का पता लगाने के लिए जाता हूँ और तुमको इसी जगह छोड़कर ताकीद कर जाता हूँ कि जब तक में लौट कर न आऊँ तब तक सूरत बदले हुए यहाँ पर रहो और चारों तरफ घूम - फिर कर टोह लो कि किसी दुश्मन ने इस सुरंग का पता तो नहीं लगा लिया है । अंगर ऐसा हुआ होगा तो कोई - न - कोई यहाँ आता - जाता तुम्हें जरूर दिखाई देगा । यदि कोई जरूरत पड़े तो तुम निःसन्देह अपने डेरे पर (सुरंग के अंदर ) चले जाना , में इसके लिए तुम्हें मना नहीं करता मगर जो कुछ मेरा मतलब हे उसे तुम जरूर अल्छी तरह समझ गए होंगे । rnrnभोलासिंह : हाँ में अच्छी तरह समझ गया , जहाँ तक हो सकेगा में इस काम को होशियारी के साथ करूँगा , आप जहाँ इच्छा हो जाइए और इस तरफ से बेफिक्र रहिए । rnrnभूतनाथ : अच्छा तो अब में जाता हूँ । rnrnrnइतना कहकर भूतनाथ भोलासिंह से विदा हुआ और उसी घूमघुमौवे रास्ते से होता हुआ पहाड़ी के नीचे उतर आया , और इधर भोलासिंह देहाती ब्राह्मण की सूरत बना जंगल में इधर - उधर घूमने लगा ।
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