एक चालाक लोमड़ी और ऊँचे लटके अंगूरों की कहानी — जिसने हम सबको सिखाया कि कमज़ोरी छिपाने के लिए बहाने बनाने की आदत कितनी मूर्खतापूर्ण है।
एक घने जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी। उसका नाम था — चित्रा। चित्रा का रंग सुनहरा-भूरा था। उसकी आँखें हीरे की तरह चमकती थीं। पूँछ इतनी झबरीली कि देखते ही बनती। और उसकी चालाकी? जंगल भर में मशहूर!
चित्रा अपने आप को बहुत बुद्धिमान समझती थी। वह दूसरों को मूर्ख कहती। हर एक छोटी-छोटी बात पर ख़ुद की तारीफ़ करती। "मैं सबसे चतुर हूँ," — वह रोज़ अपने आप से कहती।
एक दिन गर्मियों की दोपहर थी। सूरज चढ़ चुका था। चित्रा सुबह से कुछ नहीं खाई थी। पेट में चूहे दौड़ रहे थे। वह जंगल में खाने की तलाश में निकली।
उसने एक खरगोश देखा, पर वह तेज़ी से बिल में घुस गया। एक चिड़िया दिखी, पर वह उड़ गई। एक मेमना नज़र आया, पर उसके साथ माँ भेड़ थी, और चित्रा उससे डरती थी।
"हाय! आज तो कुछ भी हाथ नहीं आ रहा!"
वह आगे बढ़ती गई। इतने में — दूर से — एक मीठी ख़ुशबू आई। यह कोई फल की महक थी। चित्रा ने नाक उठाकर सूँघा।
"ये क्या है? बहुत स्वादिष्ट लग रही है!"
वह उस तरफ़ चलने लगी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती गई, ख़ुशबू तेज़ होती गई। अंत में वह एक बड़े-से अंगूर के पेड़ के पास पहुँची।
और जो उसने देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं!
पेड़ की डालियों पर रसीले, मीठे, गोल-गोल काले-बैंगनी अंगूरों के झुँड लटक रहे थे। हर अंगूर सूरज की रोशनी में चमक रहा था। शायद उनसे रस की बूँदें टपक रही थीं।
"वाह! क्या सुंदर अंगूर हैं! इनका स्वाद कितना मीठा होगा!"
चित्रा के मुँह में पानी आ गया। उसकी जीभ सूख रही थी। पेट और भी ज़ोर से चूँ-चूँ करने लगा।
चित्रा ने पेड़ के नीचे आकर ऊपर देखा। अंगूर का सबसे नीचा झुँड भी ज़मीन से कई फुट ऊपर था। एक साधारण लोमड़ी के लिए वहाँ तक पहुँचना मुश्किल था।
"पर मैं चित्रा! मैं चालाक! मैं हुषार! मेरे लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं!"
उसने पीछे हटकर एक लंबी छलाँग लगाई।
"फुदक!"
उसकी टाँगें ज़मीन से उठीं। वह हवा में उड़ी। हाथ ऊपर अंगूरों की तरफ़ बढ़ाए — पर...
"धम्म!"
वह नीचे गिर पड़ी। अंगूर तो दूर — उसकी छलाँग आधी ऊँचाई तक भी नहीं पहुँची। चित्रा अपनी पूँछ झाड़कर खड़ी हुई।
"कोई बात नहीं! ये पहली कोशिश थी। दूसरी बार पक्का!"
उसने दूसरी छलाँग लगाई। पहले से ज़्यादा ज़ोर से।
"फुदक! धम्म!"
फिर भी न पहुँची। थोड़ी ज़्यादा ऊँची तो गई, पर अंगूरों की डाल अभी भी कई इंच दूर थी।
तीसरी कोशिश — उसने पेड़ की जड़ों पर पैर टिकाकर उछाल लगाई।
"फुदक! धम्म!"
थोड़ी और ऊँची। पर फिर भी नाकाम।
चौथी, पाँचवी, छठी कोशिश। हर बार ज़ोर बढ़ाया। हर बार थोड़ी ज़्यादा ऊँची गई। पर अंगूर तो जैसे आसमान में लटके हुए थे — पहुँच से बाहर।
एक घंटा बीत गया। चित्रा थक गई। उसकी टाँगों में दर्द होने लगा। साँस फूलने लगी। पसीने से उसका सुनहरा फर गीला हो गया।
पर उसका अहंकार उसे रुकने नहीं दे रहा था।
चित्रा ने सोचा — "ज़ोर से छलाँग नहीं चल रही। तो कोई और तरकीब आज़माते हैं।"
उसने एक पत्थर ढूँढ़ा। पत्थर पर खड़ी होकर उसने छलाँग लगाई। पर पत्थर उसके पैरों के नीचे लुढ़का और वह गिर पड़ी।
उसने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की। पर पेड़ का तना सीधा और चिकना था। उसके पंजे फिसलते रहे। वह बार-बार नीचे गिरी।
उसने हवा में लटके बेल को पकड़ने की कोशिश की। पर वह कमज़ोर बेल थी, टूट गई।
एक और घंटा बीत गया। चित्रा अब बिल्कुल थक चुकी थी। उसकी जीभ बाहर लटकी हुई। साँस तेज़। टाँगें दुख रही थीं। और उससे ज़्यादा — उसका मन रोने को था।
"मैं चालाक हूँ। मैं हुषार हूँ। पर ये अंगूर मुझसे नहीं मिल रहे!"
तभी पास से एक खरगोश गुज़रा। उसने चित्रा को इस हालत में देखा — पसीने से लथपथ, बिखरे हुए बाल, थकी हुई।
"ओ चित्रा बहन! क्या कर रही हो?"
चित्रा ने जवाब नहीं दिया। पर खरगोश ने ऊपर की ओर देखा और सब समझ गया।
"अच्छा! तुम अंगूर पाने की कोशिश कर रही थीं? पर ये तो बहुत ऊँचे हैं। तुम्हारी पहुँच से बाहर।"
चित्रा का अहंकार चोट खा गया। एक खरगोश — वह छोटा, कमज़ोर खरगोश — उसकी असफलता को इस तरह बताए?
उसने तुरंत अपना चेहरा बदला। उसकी आँखें छोटी हो गईं। होंठ टेढ़े। नाक सिकुड़ी।
"अरे खरगोश भाई," — वह बनावटी हँसी हँसी, "तुम्हें लगा मैं ये अंगूर खा रही थी? ना ना ना। मैं तो... मैं तो बस देख रही थी।"
"देख रही थीं?"
"हाँ। मैं तो जब पास से गुज़री, तो ख़ुशबू सूँघी। थोड़ी देर के लिए उत्सुक हुई। पर अब मुझे पता चल गया।"
"क्या पता चला?"
चित्रा ने अपनी नाक ऊपर उठाई। ज़ोर से, सब को सुनाते हुए, ऐलान किया —
"ये अंगूर तो खट्टे हैं! देखो ज़रा कैसे कच्चे लग रहे हैं! मैं ऐसे खट्टे अंगूर खाने की मूर्ख नहीं! मेरा स्वाद बहुत अच्छा है। मैं तो मीठे फल ही खाती हूँ।"
खरगोश ने अंगूरों की तरफ़ देखा। वे तो रसीले, पके, मीठे लग रहे थे! रंग सुनहरा-बैंगनी। उनसे रस टपक रहा था।
"पर बहन, ये तो बहुत पके हुए दिख रहे हैं..."
"अरे नहीं नहीं," चित्रा ने जल्दी से बात बदली, "तुम्हें क्या मालूम! मेरा स्वाद बहुत अच्छा है। मैं अंगूरों की पहचान वाली हूँ। ये बिल्कुल खट्टे हैं। मुझे ख़ुशी है कि मैंने नहीं खाए! कौन ऐसे खट्टे अंगूर खाएगा!"
और वह नाक ऊपर उठाकर वहाँ से चली गई। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
खरगोश एकटक उसे जाते हुए देखता रहा। फिर हँस पड़ा। उसने ऊपर देखा। उसने अंगूरों की तरफ़ देखा।
"अरे! ये तो बहुत मीठे लग रहे हैं! बेचारी चित्रा। पहुँच नहीं पाई, तो खट्टे कह दिए! क्या ख़ूब बहाना है!"
तभी एक चिड़िया उड़कर आई। उसने एक अंगूर तोड़कर खाया।
"वाह! इतने मीठे, रसीले अंगूर! आओ खरगोश भाई, तुम भी खाओ।"
"पर बहन, चित्रा कह रही थी कि ये खट्टे हैं!"
चिड़िया हँसी। "अरे, चित्रा को नहीं मिले, इसलिए उसने खट्टे कह दिए। ये तो जंगल के सबसे मीठे अंगूर हैं।"
उसने एक अंगूर खरगोश को दिया। खरगोश ने खाया। मीठा! बेहद मीठा!
और दोनों ने मिलकर हँसी हँसी।
उस दिन से जंगल में एक नया मुहावरा बन गया। जब भी कोई जानवर किसी चीज़ को न पाने के बाद उसकी बुराई करने लगता, बाक़ी जानवर हँसकर कहते —
"अरे! 'खट्टे अंगूर' की कहानी है यह!"
और सब को चित्रा की कहानी याद आ जाती।
चित्रा कई दिनों तक छिप-छिप कर रही। जब भी कोई जानवर उसे देखता, वह दूसरी तरफ़ मुँह कर लेती। उसे अपनी बेवक़ूफ़ी पर शर्म आ रही थी।
एक दिन उसकी माँ ने उसे बुलाया। बोलीं —
"बेटी, सच बता। उस दिन क्या हुआ था?"
चित्रा रो पड़ी। माँ के पास सब कुछ बता दिया। कैसे वह अंगूर पाने की कोशिश में नाकाम रही। कैसे उसने झूठ बोला कि खट्टे हैं।
माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। बोलीं —
"बेटी, अब एक बात समझ ले। जब हम कोई चीज़ नहीं पा सकते, तो उसे बुरा कहना — यह कमज़ोरी है। ईमानदारी से कहो — 'मैं नहीं पा सकी।' इसमें कोई शर्म नहीं। शर्म इसमें है कि हम बहाने बनाएँ।"
"दूसरी बात — कुछ चीज़ें हमारी पहुँच से बाहर होती हैं। यह बुरा नहीं। हर किसी की अपनी क्षमता है। उसे स्वीकार करो। ज़बरदस्ती हर चीज़ अपनी मानने की कोशिश मत करो।"
चित्रा ने माँ की बात मन में बिठा ली।
प्यारे बच्चों, इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब अगली बार किसी दोस्त के पास कोई खिलौना हो जो तुम्हारे पास नहीं — और तुम कहने लगो "वो तो वैसे भी ख़राब है" — तो रुक जाओ। चित्रा को याद करो। ईमानदार रहो। हर चीज़ हमारी नहीं हो सकती। और यह ठीक है!
॥ बहाना न बनाओ, सच कहो — सच ही सच्चा साथी है ॥
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