राजा विक्रमादित्य और एक भूतिया प्रेत बेताल — पच्चीस पहेलियों की वो रहस्यमयी रातें, जिनमें न्याय और बुद्धि की असली परीक्षा होती है।
उज्जैन — प्राचीन भारत का एक भव्य शहर। शिप्रा नदी के किनारे बसा हुआ। उसकी सड़कें चौड़ी, मंदिर ऊँचे, बाज़ार भरे हुए।
उस शहर का राजा था — विक्रमादित्य। एक महान, न्यायप्रिय, बुद्धिमान सम्राट। उनकी कीर्ति इतनी थी कि "विक्रम संवत" — एक नया कैलेंडर — उनके नाम पर शुरू हुआ। आज भी हम उसी संवत के अनुसार दिन गिनते हैं।
विक्रमादित्य की बहादुरी और न्याय की कथाएँ अनगिनत हैं। पर सबसे रहस्यमयी कथाएँ — विक्रम-बेताल की हैं।
एक समय — एक तांत्रिक साधक रोज़ राजा के दरबार में आता। उसका नाम था — शांतिशील। वह कहलाता था संत, पर असल में कुटिल साधक था।
शांतिशील रोज़ राजा को एक मीठा फल देता। राजा उसे ग्रहण करते। एक साल तक यह चला।
एक दिन — संयोग से — राजा ने वह फल अपने पालतू बंदर को दे दिया। बंदर ने फल चबाया — और उसमें से एक चमकता हुआ हीरा निकला!
राजा चौंके। उन्होंने जल्दी से बाक़ी फल जमा करवाए। हर एक में एक-एक रत्न! एक साल में राजा को 365 हीरे मिले — सबसे क़ीमती!
विक्रमादित्य ने तांत्रिक से पूछा — "बाबा, यह क्या? आपने क्यों मुझे यह सब दिए?"
तांत्रिक हँसा। "महाराज, मुझे एक काम है आपसे। उसी के लिए मैंने एक साल तपस्या की।"
"क्या काम?"
"महाराज, अमावस्या की रात आपको शहर के बाहर — श्मशान में — जाना होगा। वहाँ एक पुराने पीपल के पेड़ पर एक प्रेत — एक 'बेताल' — टँगा हुआ है। आपको उसे उतारकर मेरे पास लाना है। मुझे उसकी एक तंत्र-साधना में ज़रूरत है।"
"पर सावधान — रास्ते में बेताल बातें करेगा। पहेलियाँ सुनाएगा। आप एक भी शब्द नहीं बोलेंगे। अगर आपने जवाब दिया — तो बेताल फिर पेड़ पर वापस उड़कर लटक जाएगा।"
विक्रमादित्य ने वचन दिया। एक राजा का वचन।
उस अमावस्या की रात विक्रमादित्य अकेले श्मशान गए। हाथ में तलवार। अंधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं।
उन्होंने पीपल का पेड़ ढूँढ़ा। ऊपर देखा — हाँ, एक प्रेत झूल रहा था। उन्होंने पेड़ पर चढ़कर बेताल को नीचे उतारा। अपने कंधे पर रखा। और लौटने लगे।
थोड़ी ही दूर चलते बेताल बोला — "राजा! रास्ता लंबा है। चलो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।"
विक्रमादित्य चुप।
"तुम मुझसे नहीं बोलोगे, पर मैं ज़रूर बोलूँगा। सुनो..."
"एक नगर में दो भाई रहते थे। बड़े का नाम — रवि। छोटे का — कीरण।
"रवि शरीर से कमज़ोर था। पर बहुत बुद्धिमान। दिन-रात पुस्तकें पढ़ता। शास्त्र, गणित, विज्ञान — सब जानता। पर शारीरिक काम नहीं कर पाता।
"कीरण ठीक उल्टा। पर्वत-समान बलवान। पर बुद्धि कम। हाथ-पाँव भारी, पर सोच हल्की।
"दोनों के पिता एक व्यापारी थे। मरते समय उन्होंने एक बहुत क़ीमती हीरा छोड़ा। और कहा — 'यह हीरा उसे मिले जो योग्य हो।' पर 'योग्य' का मतलब उन्होंने नहीं बताया।
"दोनों भाई अपना दावा कर रहे थे। रवि कहता — 'मैं बुद्धिमान हूँ, मैं इस हीरे का सही उपयोग कर सकता हूँ।' कीरण कहता — 'मैं बलवान हूँ, मैं इसे चोरों से बचा सकता हूँ।'
"दोनों राजा के पास गए — फ़ैसले के लिए।"
"राजा ने सोचा। फिर एक परीक्षा रखी।
"'मैंने एक काम बताऊँगा। जो भी सही ढंग से करेगा, वही असली योग्य होगा। हीरा उसका।'
"दोनों ने हाँ कहा।
"राजा ने एक भारी पत्थर लाया। एक हाथ चौड़ा, मज़बूत। बीच में एक छोटा-सा छेद।
"'इस पत्थर को इस मंडप के बीच में रखना है। इसकी जगह — इस छेद से एक धागा लटकता हुआ — दिखे। बस।'
"कीरण ने तुरंत आगे आकर अपने मज़बूत हाथों से पत्थर उठाया। मंडप के बीच में रख दिया। फिर एक धागा निकालकर छेद में डाला। काम ख़त्म!
"'देखो! मेरा बल काम आया! मैंने आसानी से कर दिखाया!'
"रवि अभी भी सोच रहा था। पत्थर तो रख दिया गया। उसने कुछ नहीं किया। राजा का सवाल — कौन योग्य?
"राजा ने पूछा — 'रवि, क्या तुम भी कुछ करोगे?'
"रवि ने कहा — 'महाराज, कीरण ने तो काम कर दिया। पर एक प्रश्न है — असली परीक्षा यह नहीं थी।'
"'क्या कहना चाहते हो?'
"रवि ने कीरण को सलाम दिया। फिर राजा से कहा — 'कीरण ने पत्थर रख दिया। हाँ। पर सोचा नहीं — पत्थर को क्यों रखा। यह छेद किसलिए है? यह धागा क्या मतलब का?'
"राजा ने पूछा — 'तुम क्या समझते हो?'
"रवि ने कहा — 'महाराज, यह पत्थर — यह आपके पुराने मंडप का है। बहुत साल पहले इसे यहाँ से गिराया गया था। मंडप में पाँच पत्थर हैं — चार कोनों पर, एक बीच में। बीच का पत्थर ऊपर लटकती हुई एक दीप-माला को संभालता है। उस दीप-माला में हर साल एक नया दीप जलाया जाता है — पुश्तैनी परंपरा।'
"'अगर मेरी जानकारी सही है — तो छेद उस दीप-माला के लिए है। और उस धागे के सहारे दीप-माला हवा में लटकती है। एक प्राचीन परंपरा।'
"राजा ने आँखें बड़ी कीं। 'तुम्हें यह कैसे पता?'
"'महाराज, मेरे पिता ने मुझे यह बताया था। पुश्तैनी कथाएँ। मैंने सिर्फ़ पढ़ाई की है, पर परंपरा भी जानता हूँ।'
"राजा प्रसन्न। 'तो दीप-माला कहाँ है?'
"रवि ने आगे बढ़कर एक पुराने भंडार-कक्ष का रास्ता बताया। नौकरों ने वहाँ से एक पुरानी, टूटी-फूटी, पर बहुत क़ीमती चाँदी की दीप-माला निकाली। पर साल के लिए इस्तेमाल नहीं हुई थी।'
"रवि ने कहा — 'इसे साफ़ करो। फिर इस धागे से बाँधो। फिर इसे जलाओ। यह आज मंडप की पुश्तैनी परंपरा है। यह काम — हीरा प्राप्त करने का असली काम है।'
"नौकरों ने वैसा ही किया। एक रात के बाद — एक भव्य दीप-माला मंडप के बीच में जलने लगी।
"राजा ने हीरा रवि को दिया।"
बेताल ने कहा — "राजा विक्रमादित्य! अब बताओ — क्या राजा का यह फ़ैसला सही था? कीरण ने पत्थर रखा — काम किया। पर हीरा रवि को मिला। यह न्याय है? कीरण ने कुछ नहीं किया?"
"और दूसरा प्रश्न — रवि कमज़ोर है। हीरा कैसे बचाएगा? क्या कीरण को नहीं मिलना चाहिए था जो उसकी रक्षा कर सकता?"
"राजा! अगर तुम्हें उत्तर मालूम है और जवाब नहीं दिया — तो तुम्हारा सिर हज़ार टुकड़ों में फट जाएगा!"
विक्रमादित्य अब अपनी प्रतिज्ञा भूल गए। न्याय का सवाल था — चुप रहना नहीं हो सकता था। उन्होंने उत्तर दिया —
"बेताल! राजा का फ़ैसला बिल्कुल सही था। यहाँ कई बातें हैं —
"पहली — असली योग्यता क्या है? बल या बुद्धि? दोनों ज़रूरी हैं। पर बल बिना बुद्धि के बेकार है। कीरण ने पत्थर तो रखा, पर सोचा नहीं — क्यों रखा। उसने एक मूर्ख की तरह काम किया।
"रवि ने सोचा। समझा। परंपरा को पहचाना। यह असली योग्यता है। हीरे का सही उपयोग — यानी पुश्तैनी परंपराएँ बनाए रखना — रवि कर सकता है।
"दूसरी बात — रक्षा का सवाल। हाँ, रवि कमज़ोर है। पर वह बुद्धिमान है। बुद्धिमान आदमी अपने हीरे की रक्षा का इंतज़ाम कर सकता है — चौकीदार रख सकता है, मज़बूत तिजोरी बना सकता है। पर एक बलवान मूर्ख — हीरे को कैसे संभालेगा? अगर कोई चालाक उसे फँसा ले?
"तीसरी बात — पिता ने कहा था 'योग्य को हीरा।' योग्यता का मतलब बल नहीं — बुद्धि और समझ। रवि वह योग्य है।
"पर एक बात — कीरण को भी इनाम मिलना चाहिए। उसने मेहनत की है। उसकी मेहनत बेकार नहीं है। उसे बल का इस्तेमाल करने वाले काम सौंपने चाहिए — सेना में, मेहनत-मज़दूरी में।
"दोनों भाइयों को अपनी क्षमता के अनुसार जीवन जीना चाहिए। न तो रवि का बुद्धिमान होना — कीरण से ऊँचा है, न कीरण का बलवान होना रवि से।
"पर हीरे का प्रश्न — रवि के पास होना चाहिए। यही न्याय है।"
बेताल ने ज़ोर से हँसा।
"बहुत बढ़िया उत्तर, राजा! तुम्हारी न्याय-दृष्टि शानदार है! पर — तुम बोले! अब मैं वापस पेड़ पर जाता हूँ!"
और वह राजा के कंधे से उड़कर — फिर से पीपल के पेड़ पर लटक गया।
विक्रमादित्य नाराज़ नहीं हुए। वे शांति से पेड़ की तरफ़ गए। फिर से बेताल को उतारा। फिर से कंधे पर लिया। फिर से चलने लगे।
यही चक्र — पच्चीस रातें — चलता रहा। हर रात बेताल एक नई पहेली सुनाता। राजा हर बार जवाब देते, क्योंकि न्याय का सवाल था। बेताल हँसता और वापस पेड़ पर लटक जाता। पर राजा हर बार लौट आते।
शायद पच्चीसवीं रात — विक्रमादित्य अंत में बेताल को तांत्रिक के पास ले गए। पर बेताल ने उन्हें सावधान कर दिया कि तांत्रिक एक धोखेबाज़ है — और तांत्रिक का अंत हो गया।
"दो भाइयों की कहानी" से विक्रमादित्य का सबक यह था — बल और बुद्धि — दोनों की अपनी जगह है। पर सच्ची योग्यता — समझ और न्याय — से होती है।
प्यारे बच्चों, इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब कभी तुम्हें कोई काम मिले — पहले सोचो "यह काम क्यों है?", "इसे क्यों करना है?" फिर करो। बस मेहनत करना — मूर्खता हो सकती है। मेहनत के साथ समझ — यही सच्ची सफलता है। यही तुम्हें "रवि" बनाएगा, "कीरण" नहीं!
॥ बल अच्छा, बुद्धि श्रेष्ठ — पर समझ सर्वोच्च ॥
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें