बारिश अब हल्की पड़ चुकी थी, लेकिन असाइलम के गलियारों में एक अजीब सन्नाटा था—जैसे कोई अनदेखी ताकत यहाँ के हर कोने में छिपकर बस सही समय का इंतजार कर रही हो।
पहला कर्मचारी गुस्से में पैर पटकता हुआ स्टोर रूम की ओर बढ़ा।
"साला यहाँ ही छिप होगा !"
दरवाजे पर पहुँचकर उसने उसे धक्का दिया।
कर्रर्रर्र...आवाज करते हुए दरवाजा खुला। और एक ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया।इतनी ठंडी कि उसकी हड्डियाँ काँप उठीं।
उसने झटके से अंदर कदम रखा और चारों ओर देखने लगा। अंधेरा। गहरा काला अंधेरा। बस दूर एक कोने में हल्का-सा बल्ब टिमटिमा रहा था।
उसने स्विच दबाकर लाइट चालू कर दी।
पीली रोशनी में पुरानी अलमारियाँ, धूल से भरे फर्नीचर और कोनों में जमी मकड़ियों की जालियाँ दिखने लगीं।
"अबे! कहाँ छुपा है? बाहर आ!"
उसने गुस्से में चिल्लाते हुए अपने साथी को आवाज दी।
कोई जवाब नहीं आया।
हवा अब भी सर्द और भारी थी, जैसे कमरे में कोई और भी मौजूद हो।
उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाते हुए कहा।
"मुझे पता है मोनालिसा को लेकर तू यही कही छुपा है। चल अब नाटक बंद कर। बाहर आ।"
अपने दोस्त को आवाज देते हुए वह आगे बढ़ने लगा।
फर्श पर पड़े पुराने कागज और धूल उसके पैरों के नीचे दबकर सरसराने लगी।
तभी...
उसकी नज़र नीचे फर्श पर पड़ी।
एक अलमारी के पीछे जमीन पर पड़ी मोनालिसा का चेहरा नजर आ रहा था।
सफ़ेद... स्थिर... निर्जीव।
उसके मन में एक ही ख्याल आया।
"ये कमीना लाश को यहाँ घसीटकर ले आया और अब इसके साथ मज़े कर रहा है!"
गुस्से से उसकी आँखें लाल हो गईं।
उसने तेज़ी से कदम बढ़ाए।
लेकिन...सर्रर्रर्रर...
उसने अपनी आँखों के सामने देखा
मोनालिसा की लाश अचानक खींची जाने लगी!
जैसे कोई उसे घसीटकर अंधेरे में ले जा रहा हो।
"अबे रुक... क्या कर रहा है तू?"
उसने गुस्से से दहाड़ा और अलमारी को लांघकर वहां तक पहुँचा। पर कुछ नहीं था।
मोनालिसा की लाश गायब हो चुकी थी।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
तभी...
दूर एक अलमारी के पीछे फर्श पर फिर वही चेहरा दिखाई दिया। मोनालिसा का निर्जीव चेहरा।
"अबे कमीनें! तू क्या कर रहा है?" उसने दाँत पीसते हुए अपने साथी को चेतावनी दी।
पर इस बार...
लाश और तेज़ी से घसीट ली गई!
सर्रर्रर्ररर!
उसके कदम ठिठक गए।
गुस्से में वह दौड़ता हुआ अलमारी के पीछे पहुँचा।
पर वहाँ कुछ भी नहीं था।
सिर्फ धूल।
अब उसे सचमुच गुस्सा आने लगा।
तभी उसके ठीक पीछे की एक अलमारी का दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा। लकड़ी के रगड़ खाने की तीखी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा। उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
अंधेरे में डूबी उस अलमारी का दरवाजा पूरी तरह खुल चुका था।
अंदर...
कुछ था वहाँ।
कोई... या कुछ... जो उसे देख रहा था।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
उसने गला साफ़ किया और गुस्से से चिल्लाया—
"बस बहुत हो गया ! अगर तू नहीं रुका, तो मैं तुझे जान से मार दूँगा! मोनालिसा को मेरे हवाले कर दे!"
कमरा बिलकुल शांत था।
बस हल्की-हल्की हवा की सरसराहट थी।
पर अचानक...
उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी महसूस हुई।
ठंडी सांसों की छुअन उसकी गर्दन से होकर गुज़री।
उसका शरीर झनझना उठा।
उसने झट से पीछे मुड़कर देखा—
और तभी...
उसके मुँह से दर्द से भरी चींखें निकलने लगी। इतनी ज़ोर से कि पूरा स्टोर रूम उसकी गूँज से काँप उठा और उसी के साथ पुरे मेंटल एसाइलम में मरिज जोर जोर से चीखने लगे।
अपने दोस्त की वो चिल्लाने की आवाज सुनकर ऑफिस के कमरे में शराब की बोतल रखने आया दुसरा कर्मचारी बुरी तरह घबरा गया था। उसके कानों में न सिर्फ अपने साथी की दिल दहला देने वाली चीखें गूंज रही थीं, बल्कि पूरे मेंटल असाइलम के मरीज चिल्ला रहे थे। चारों तरफ से आती वह भयानक आवाजें उसके दिमाग में हथौड़े की तरह चोट कर रही थीं।
उसका बदन पसीने से भीग चुका था, पर किसी अनहोनी की आशंका से भरे दिल के साथ वह दौड़ता हुआ स्टोर रूम की ओर बढ़ा। उसका साथी अंदर फंसा हुआ था, और उसकी चीखें धीरे-धीरे धीमी पड़ रही थीं।
गिरते पडते वह स्टोर रूम के सामने पहुंचा, दरवाजा अंदर से बंद था। उसने झट से हैंडल घुमाने की कोशिश की, पर दरवाजा हिला तक नहीं। घबराहट में उसने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। इस बीच, मरीजों की दिमाग हिला देने वाली आवाजें और तेज हो गईं। उन आवाजों ने जैसे उसका दिमाग कुतरना शुरू किया था। अब वो खुद भी चिल्लाते हुए अपने दोनों कानों को कसकर पकड़कर जमीन पर बैठ गया। उसकी सांसें तेज हो गई थीं, दिल की धड़कन जैसे कानों में गूंज रही थी। अचानक, वह सब आवाजें शांत हो गईं। ना मरीजों के चिल्लाने की आवाज आ रही थी ना उसके दोस्त की आवाज आ रही थी। चारों ओर एक जानलेवा सन्नाटा छा गया था।
वह घबराते हुए उठा और स्टोर रूम के दरवाजे की ओर देखा। वह अब आधा खुला था।
"ये… ये कैसे हो सकता है?"
उसका दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया। खुले दरवाजे से धीरे से भीतर दाखिल हुआ। कमरे के भीतर लाइट नहीं थी। उसने अपना मोबाइल निकाला और टॉर्च शुरू की।
" रमेश , कहां है तू.."
अपने दोस्त को आवाज लगाते हुए वह एक एक कदम आगे बढ़ने लगा। पूरा स्टोर रूम देख लिया, अब वह स्टोअर रूम के आखिरी छोर तक पहुंच गया था। पर उसका दोस्त कहीं नहीं था तभी उसके कानों पर दरवाजा खुलने की आवाज आई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो स्टोर रूम के उस दरवाजे से उसका दोस्त बाहर जाता दिखाई दिया।
" अरे रमेश, रुक जा। कहां जा रहा है।"
अपने दोस्त को आवाज लगाते हुए वह स्टोर रूम के उस दरवाजे के तरफ दौड़ने लगा। स्टोअर रूम काफी बड़ा था। दौड़ते हुए वह दरवाजे तक पहुंचा और बाहर गया तो उसका दोस्त मेंटल एसाइलम के आखिरी छोर पर जाता दिखा और अंधेरे में गुम हो गया। वह रास्ता तहखाने की तरफ जाता था । उसने दोबारा दौड़ लगाई और तेजी से सीढ़ियां उतर कर नीचे आया। पर तभी कुछ कदमों पर स्थीत दाईं तरफ के कमरे का वह दरवाजा एकदम से बंद होने की आवाज आई।
वह उस कमरे के पास पहुंचा और दरवाजा पीटते हुए बोला।
तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पोस्टमार्टम रूम का दरवाजा उसके सामने था—पुराना, जंग खाया हुआ और डरावनी चुप्पी से भरा।
उसने धीरे से हाथ बढ़ाया और कांपते हुए दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा एक अजीब सी चरमराहट के साथ खुला, मानो किसी ने अंदर से उसे जबरदस्ती रोक रखा था।
अंदर घना अंधेरा पसरा था। उसने जैसे ही मोबाइल की टॉर्च जलाने के लिए बटन दबाया, टॉर्च एक पल के लिए चमकी और फिर झपककर बंद हो गई।
कमरे में अंधेरा और भी घना हो गया।
उसने घबराते हुए मोबाइल को जोर-जोर से हिलाया, टॉर्च फिर से जली। हल्की-हल्की रोशनी में उसने चारों ओर नजरें दौड़ाईं।
पोस्टमार्टम रूम की दीवारों पर पुराने खून के धब्बे सूखकर काले पड़ चुके थे। टाइल्स जगह-जगह से टूटी हुई थीं। लोहे के कई जंग लगे औजार एक टेबल पर अस्त-व्यस्त पड़े थे, जैसे किसी ने इनका इस्तेमाल कर किसी को चीरा हो और फिर जल्दी में छोड़ दिया हो।
टॉर्च की हल्की रोशनी में कोने-कोने पर जमी गहरी धूल और मकड़ी के जाले भी साफ नजर आ रहे थे।
फिर अचानक…
बिजली की एक झलक कमरे में चमकी और तुरंत बंद हो गई।
उसका शरीर सुन्न हो गया था।
कुछ देर तक वह हिम्मत जुटाकर खड़ा रहा, लेकिन तभी उसे लगा जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा हो। किसी की ठंडी सांसें उसकी गर्दन के पास महसूस हो रही थीं।
उसका गला सूख गया।
उसने घबराकर धीरे-धीरे सिर घुमाया, लेकिन पीछे सिर्फ अंधेरा था।
फिर...
कमरे की बत्तियाँ अचानक एक पल के लिए फिर से जल उठीं और उसने जो देखा, उससे उसकी रूह काँप गई।
सामने पोस्टमार्टम टेबल पर एक सफेद कपड़े में लिपटी हुई लाश रखी थी।
"ये क्या है ?"
उसका बदन बुरी तरह काँपने लगा।
लाश पूरी तरह से सफेद चादर में लिपटी थी, लेकिन उसके पैरों की दिशा कुछ अजीब थी, जैसे शरीर को जबरदस्ती मोड़ा गया हो।
उसने हिम्मत जुटाकर कमरे में आगे कदम बढ़ाया। हर कदम के साथ उसकी धड़कन और तेज होती गई।
फिर...
बत्तियाँ फिर से बुझ गईं!
कमरा दोबारा अंधेरे में डूब गया।
अचानक, उसे अपने पीछे किसी के भारी-भरकम कदमों की आहट सुनाई दी।
"कौन है?"
उसने कांपती आवाज में पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
फिर अचानक...बत्तियाँ फिर से जल उठीं, और इस बार उसने जो देखा, उसने उसकी आत्मा को जैसे शरीर से बाहर निकाल दिया।
पोस्टमार्टम टेबल पर पड़ी लाश का सफेद कपड़ा खिसक चुका था। टेबल पर मोनालिसा की लाश सफेद कपड़े में लिपट कर रखी हुई थी। इतनी देर से उसके दिल में बसा डर थोड़ा काम हो गया। मोनालिसा के खूबसूरत जिस्म को देखकर वह बोला।
"साले इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी.. अगर सीधे-सीधे बोल देता के पुराने पोस्टमार्टम रूम में आ जाना, तो मैं आ जाता..। चल अब तु भी बाहर आ। बहुत काम करना है । "
इतना कह कर वह अपने दोस्त को इधर उधर ढुंढते हुए आवाज लगाने लगा। तभी उसे अपने पीछे कुछ हलचल होती सुनाई दे। उसने पीछे मुड़कर देखा तो पोस्टमार्टम टेबल पर पड़ी उस लाश का चेहरा दोबारा किसी ने ढक दिया था।
" रमेश नाटक बंद कर बाहर आ। और क्या इसका मुंह ढक रहा है। "
कहते हुए उसने झट से लाश के ऊपर से झट से वह सफेद कपड़ा पुरी तरह से हटा दिया। और सामने का नज़ारा देख जैसे उसके दिल ने एक पल के लिए धड़कना ही बंद कर दिया। पोस्टमार्टम टेबल पर मोनालिसा की नहीं बल्कि उसी के दोस्त की लाश पड़ी थी। वो भी उसके पेट के उपर का ही हिस्सा था। आधी लाश गायब थी। कांपते हाथों से उसने टोर्च की रोशनी फर्श पर डाली तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई तो पूरी जमीन खून से लाल हो गई थी। उसके हाथ-पैर सुन्न हो गए।
और तभी टेबल पर पड़ी लाश के मुंह से एक दर्द भरी कराह निकली जिसे सुनकर वह डर के मारे एकदम से पीछे की तरफ हट गया पर खून पर पैर फिसलने की वजह से वो जमीन पर गिर पड़ा और उसी के साथ मोबाइल बंद हो गया। फर्श पर फैले गीले चिपचिपे खून से उसका शरीर भीग चुका था। उस बेहद डरावने और घिनौने अहसास ने उसे भीतर से झकझोर कर रख दिया था।
अंधेरे में उसे सिर्फ अपने इर्द-गिर्द किसी की खौफनाक मौजूद की महसूस हो रही थी । घबराकर उसके हाथ जमीन पर गीरे मोबाइल को तलाश रहे थे पर हाथ लग रहा था तो खून और सिर्फ खून। उसने पीछे मुड़कर देखा तो दरवाजा आधा खुला था। वह झट से उठा और दरवाजे की तरह दौड़ने लगा। पर लग रहा था जैसे कोई उसी तेजी के साथ उसपर झपटने के लिए दौड़ रहा है। पर वो पुरी जान लगाकर दरवाजे की तरफ दौड़ने लगा। सांस फूलने लगी, दिल जोर से धड़कने लगा, , गला सूख चूका था। आंखों में मौत का साया नजर आने लगा, अब उसे अपना अंत नजर आ चुका था। वो डरावना साया उसपर झपट ही पड़ा था पर तभी वो दरवाजे से बाहर निकल गया। उसके साथ ही दरवाजा बंद हो गया। पर बगैर पीछे मुडे वो दौड़ता रहा। गिरते-पडते हैं वह तहखाना से बाहर निकाला और ऑफिस रूम की तरफ भागने लगा। दौड़ते हफ्ते ऑफिस रूम के भीतर पहुंचा और लैंडलाइन कनेक्शन से डॉक्टर को फोन लगाया।
" डॉक्टर... डॉक्टर... डॉक्टर साहब, जल्द से जल्द अस्पताल आईये। "
"क्या हुआ.. तुम इतना हांफ क्यो रहे हो ?"
" डॉक्टर साहब ,यहां कुछ भयानक हो रहा है। आप जल्दी आईये।"
" क्या बकवास कर रहे हो ? तुम होश में तो हो या पी रखी है ?"
"डॉक्टर साहब, मां कसम मैंने शराब नहीं पी। आप जल्दीसे यहां आईये, वो मोनालिसा की लाश गायब हो चुकी है, और रमेश।"
इतना कहकर वो फूट-फूटकर रोने लगा।
"रमेश को क्या हुआ ? और तु रो क्यों रहा है ?"
" रमेश को किसी...."
आगे कुछ बोलता इससे पहले फोन कट हो गया और बाहर कहीं शॉर्ट सर्किट से बिजली चली गई। अब पूरे अस्पताल में जानलेवा अंधेरा और गहरी खामोशी फैल गई। और उस खामोशी में उसे अपने दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी। छोटी सी आवाज भी होती तो वह सिहर उठता। बीना आवाज किए उसने धीरे से टेबल का ड्रावर खिंचकर भीतर हाथ डालकर टटोलने लगा, एक टॉर्च हाथ लग गई। बटन दबाकर टॉर्च शुरू की और उस टोर्च की रोशनी में अपने आजू-बाजू देखने लगा। पर गहरी खामोशी के अलावा से कुछ नहीं था। तभी उसे अपने कमरे के बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। पर बाहर जाकर देखने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी। वो चुपचाप उस कमरे के एक कोने में दुबककर बैठा डॉक्टर साहब का इंतजार करने लगा। रह-रहकर उसका शरीर सिहर उठता। तभी झट से दरवाजा खोल कर उसका दोस्त रमेश भीतर दाखिल हुआ और उसे पर गुस्से से चिल्लाते हुए बोला।
"क्यों बे साले मोनालिसा कहां है ? अकेले-अकेले मजा लूटना चाहता है ? तेरी सारी हरकत में डॉक्टर साहब को बता दूंगा। नौकरी चली जाएगी, देख ले।"
अजय को सामने देख वो खुशी के मारे पागल हो गया।
"अजय तू जिंदा है ? "
" जिंदा हूं का क्या मतलब ? मुझे क्या हुआ है ?"
" मैं... मैंने अभी-अभी तुझे पोस्टमार्टम रूम में टेबल पर सफेद कपड़े में देखा था।''
'' मतलब तूने शराब भी अकेली ही पी ली।"
'' नहीं , मैं शराब नहीं पी । यह देख , बोतल अभी भी मेरे पास है।''
और टेबल के नीचे रखी उस बोतल को उठाकर अजय को दिखाई।
''अबे वह शराब के नहीं, पानी की बोतल है । उसमें पानी है। शायद तेरा दिमाग खराब हो गया है। बोतल का पानी अपने सर पर डाल और ठंडा हो जा। और बता मोनालिसा कहां है ?''
उसे काफी गुस्सा आया उसने सचमुच वह बोतल अपने सर पर डालकर खाली कर के बोला।
''मुझे सच में नहीं पता मोनालिसा कहां है, मैं खुद उसे ढूंढ रहा हूं। और खून से सने मेरे हाथ देख। ''
इतना कहकर उसने अपने खून से सने हाथों को सामने करके अजय को दिखाया पर। उस कमरे में उसका दोस्त नहीं था। वह अकेला उस के कमरे में खड़ा था। और अजीब सी स्मेल उसे अपने कपड़ों से आ रही थी। उसने जमीन पर पड़ी उस बोतल को देखा तो वह अति ज्वलनशिल द्रव था।
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