(SCENE 1: आहान का कमरा - रात का सन्नाटा)
SFX: (झाड़ू से कांच समेटने की आवाज़ - Chhan-Chhan, आहान की भारी सांसें)
सूत्रधार: कमरे में बिखरे कांच के टुकड़े अब साफ़ हो चुके थे, लेकिन हवा में तनाव अभी भी कांच की तरह चुभ रहा था। इशानी ज़मीन पर बैठकर सफाई कर रही थी, और आहान अपनी कुर्सी पर बैठा, अँधेरे को 'महसूस' कर रहा था।
आहान: (व्यंग्य से) क्या हुआ? अभी तक भागी नहीं? कांच चुभा नहीं क्या?
इशानी: (कांच को डस्टबिन में डालते हुए) नहीं सर। मुझे आदत है। गरीबी में हम नंगे पैर चलते हैं, तो चमड़ी मोटी हो जाती है।
आहान: (हंसते हुए) ओहो! इमोशनल ड्रामा? देखो मिस... जो भी तुम्हारा नाम है...
इशानी: इशानी।
आहान: देखो इशानी, तुम यहाँ सिर्फ़ पैसों के लिए हो। अपनी यह 'महानता' अपने पास रखो। मुझे पता है तुम भी दो दिन में भाग जाओगी। इस अँधेरे में दम घुट जाएगा तुम्हारा।
इशानी: (खड़ी होकर) मेरा दम नहीं घूटेगा सर। क्योंकि मेरे पास एक वजह है यहाँ रुकने की। और वैसे भी... अँधेरा कमरे में है, आपकी ज़िंदगी में नहीं। अगर आप चाहें तो...
आहान: (चिल्लाकर) भाषण मत दो! मुझे भूख लगी है। खाना लाओ। और याद रखना... मुझे खाने में कोई आवाज़ पसंद नहीं। अगर चम्मच प्लेट से टकराया, तो प्लेट तुम्हारे सिर पर होगी। जाओ!
(इशानी चुपचाप कमरे से निकल जाती है।)
(SCENE 2: किचन - सौतेली माँ का आदेश)
SFX: (बर्तनों की आवाज़, कुकर की सीटी)
सूत्रधार: इशानी किचन में पहुंची। वहां रामू काका आहान के लिए खाना निकाल रहे थे। तभी मोहिनी देवी वहां आ गईं।
मोहिनी देवी: (इशानी को रोकते हुए) अरे रुको! तुम आहान के लिए क्या ले जा रही हो?
इशानी: जी, दाल और चावल। रामू काका ने बनाया है।
मोहिनी देवी: (थाली चेक करते हुए) इसमें घी डाला है?
रामू काका: जी मालकिन, छोटे सरकार को सूखी रोटी पसंद नहीं।
मोहिनी देवी: (गुस्से में) रामू! डॉक्टर ने मना किया है। आहान का वज़न बढ़ रहा है। (इशानी से) यह घी वाली दाल हटाओ। उसे उबली हुई दाल और सूखी रोटी दो। बिना नमक की।
इशानी: (हैरान होकर) लेकिन मैडम... बिना नमक और घी के वो कैसे खाएंगे? वो बीमार हैं, सज़ा क्यों?
मोहिनी देवी: (इशानी के करीब आकर, डरावनी आवाज़ में) सवाल पूछना तुम्हारा काम नहीं है लड़की। उसे ज़िंदा रखना है, खुश नहीं। उसे एहसास होना चाहिए कि वो एक 'मरीज़' है। जो कहा है वो करो, वरना एडवांस के पैसे वापस करो और दफा हो जाओ।
(इशानी मन मसोस कर रह जाती है। वो बिना नमक की दाल और रूखी रोटी लेकर ऊपर जाती है।)
(SCENE 3: आहान के कमरे में - खाने की मेज़)
SFX: (थाली रखने की आवाज़। आहान खाने की खुशबू लेने की कोशिश करता है।)
आहान: आज खाने में क्या है? खुशबू नहीं आ रही।
इशानी: वो... दाल-रोटी है सर। डॉक्टर ने हल्का खाना बताया है।
(आहान एक निवाला तोड़ता है और मुंह में डालता है।)
आहान: (थूकते हुए - Thoo!) यह क्या है? यह दाल है या पानी? न नमक, न मसाले? (गुस्से में थाली को धक्का देता है) ले जाओ इसे! मुझे नहीं खाना! तुम सब मुझे मारना चाहते हो!
SFX: (थाली ज़मीन पर गिरती है - Clatter)
इशानी: (दुखी होकर) सर, प्लीज खा लीजिये। दवाई लेनी है आपको।
आहान: (खड़ा होकर, छड़ी ढूंढते हुए) दवाई? ज़हर दे रही हो तुम लोग मुझे! निकल जाओ!
(आहान गुस्से में कमरे में इधर-उधर चलने लगता है। उसे दिखाई नहीं देता कि आगे ज़मीन पर अभी भी कांच का एक छोटा टुकड़ा बचा रह गया था, या फिर थाली गिरने से कुछ और टूट गया है।)
इशानी: (देखते हुए) सर! रुकिए! आगे मत जाइये!
आहान: मुझे मत रोको! मैं इस जेल से बाहर जाना चाहता हूँ!
(SCENE 4: नंगे पैर और खून - द टेस्ट)
सूत्रधार: आहान जानबूझकर या अनजाने में उस दिशा में बढ़ा जहाँ ज़मीन पर टूटी हुई प्लेट के टुकड़े पड़े थे। उसने चप्पल नहीं पहनी थी।
इशानी: (चिल्लाते हुए) सर! वहां कांच है!
(आहान नहीं रुका। उसने पैर आगे बढ़ाया।)
SFX: (इशानी के दौड़ने की आवाज़। वो आहान के पैरों के बीच अपना हाथ या पैर रख देती है, या उसे धक्का देकर सोफे पर गिरा देती है।)
आहान: (गिरते हुए) क्या कर रही हो तुम? मुझे धक्का दिया?
इशानी: (हांफते हुए) वहां कांच था सर। आपके पैर कट जाते।
आहान: (संभलकर बैठते हुए, सख्त आवाज़ में) तो कटने देतीं! मुझे दर्द महसूस करना है। कम से कम पता तो चले कि मैं ज़िंदा हूँ। तुम मुझे क्यों बचा रही हो?
इशानी: क्योंकि यह मेरा काम है।
आहान: (इशानी का हाथ पकड़ता है, अँधेरे में टटोलता है) तुम्हारा हाथ... तुम कांप रही हो? (उसे महसूस होता है कि इशानी के हाथ में कुछ गीला लगा है) यह क्या है?
इशानी: (दर्द छिपाते हुए) कुछ नहीं सर। वो... दाल गिर गई थी।
आहान: (सूंघते हुए) यह दाल नहीं... खून है। (हैरान होकर) तुम्हें चोट लगी है? मुझे बचाने में?
इशानी: छोटी सी खरोंच है। मैं साफ़ कर लूँगी। आप... आप प्लीज बैठ जाइये। मैं दूसरी थाली लाती हूँ। और इस बार... (दृढ़ता से) ...इस बार मैं अपने हिस्से का नमक डालकर लाउंगी।
(SCENE 5: रात - इशानी की डायरी)
SFX: (रात का सन्नाटा। इशानी अपने छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में बैठी है। पेन चलने की आवाज़।)
सूत्रधार: रात के 2 बज रहे थे। इशानी ने अपने हाथ पर पट्टी बांधी थी। वो अपनी डायरी लिख रही थी।
इशानी (Voiceover): आज का दिन बहुत मुश्किल था। आहान बुरे इंसान नहीं हैं... वो बस बहुत टूटे हुए हैं। उनकी सौतेली माँ उन्हें भूखा रख रही हैं, उन्हें तोड़ रही हैं। मुझे लगा था यह सिर्फ़ एक नौकरी है, लेकिन अब लग रहा है कि यहाँ एक साज़िश चल रही है। मुझे आहान को बचाना होगा... सिर्फ़ अपने पापा के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए।
(तभी उसे आहान के कमरे से पियानो बजने की आवाज़ सुनाई देती है।)
SFX: (पियानो की बहुत ही उदास और दर्दनाक धुन)
इशानी: (खिड़की से देखते हुए) यह धुन... इसमें कितना दर्द है।
सूत्रधार: उस अँधेरे महल में, पियानो की आवाज़ ही एकमात्र चीज़ थी जो सच्ची थी। आहान अपना दर्द बयां कर रहा था, और इशानी... वो पहली बार उस दर्द को समझ रही थी। पिंजरे में दो पंछी थे—एक घायल, और दूसरा मज़बूर।
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