एक गरीब लड़के की कहानी, जिसकी ज़िंदगी एक अनजान आदमी के आने से अचानक बदलने लगी।
बहुत पुरानी बात है। दूर एक गर्म रेगिस्तान के किनारे एक खूबसूरत शहर बसा हुआ था। शहर के बीचोबीच एक बड़ा बाज़ार था — जहाँ तरह-तरह के सौदागर अपनी दुकानें सजाकर बैठते थे। कोई खजूर बेचता, कोई रंगीन कपड़े, कोई तांबे के बर्तन, और कोई मीठी मिठाइयाँ।
उसी शहर की एक तंग गली में एक छोटा-सा घर था। उस घर में एक विधवा माँ और उसका लड़का अलादीन रहते थे। माँ दिन-रात कपड़े सीकर पैसे कमाती थी, ताकि घर का चूल्हा जल सके।
अलादीन उम्र में बारह-तेरह साल का था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी, बाल काले-घुंघराले, और चेहरे पर हमेशा एक शरारती हँसी रहती। पर उसे काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था। पूरा दिन वो दोस्तों के साथ बाज़ार में घूमता रहता — कभी पतंग उड़ाता, कभी छुप-छुप के मिठाई की दुकान से एक टुकड़ा उठा लेता।
"अलादीन, कब तक ऐसे ही घूमता रहेगा बेटा?" माँ रोज़ कहती। "देख, मैं कितनी मेहनत करती हूँ। तू भी कुछ काम सीख ले।"
अलादीन सिर हिला देता। "हाँ माँ, कल से ज़रूर।"
और उसका "कल" कभी नहीं आता था।
एक दोपहर अलादीन हमेशा की तरह बाज़ार में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था। वो धूप में दौड़-दौड़कर हाँफ रहा था। तभी एक बूढ़ा-सा आदमी उसकी तरफ आया।
उस आदमी ने लंबा काला चोगा पहना था। सिर पर बड़ी-सी पगड़ी थी। दाढ़ी पतली और सफ़ेद। आँखें गहरी, और उन आँखों में कुछ अजीब-सी चमक थी।
उसने अलादीन का कंधा थपथपाया।
"बेटा, क्या तेरा नाम अलादीन है? क्या तू मुस्तफा दर्ज़ी का बेटा है?"
अलादीन चौंक गया। उसके पिता का नाम मुस्तफा था, जो कई साल पहले गुज़र गए थे।
"हाँ, मेरे अब्बा का नाम मुस्तफा था। आप कौन हैं?"
उस आदमी की आँखों में मानो आँसू छलक आए।
"बेटा! मैं तेरा सगा मामा हूँ। तेरे अब्बा का सगा भाई। बरसों से दूर देश में रहता था, इसलिए तू मुझे नहीं जानता। आज इतने सालों बाद आया हूँ अपने भतीजे को देखने।"
अलादीन ने उसे ध्यान से देखा। माँ ने तो कभी मामा का ज़िक्र नहीं किया था। पर वो आदमी इतने प्यार से बात कर रहा था कि अलादीन के मन में कुछ अच्छा-अच्छा-सा लगा।
"चल बेटा, मुझे अपनी माँ के पास ले चल। मैं उनके लिए तोहफ़े लाया हूँ।"
अलादीन उन्हें अपने घर ले गया। माँ चूल्हे के पास बैठी आटा गूंध रही थीं। दरवाज़े पर अनजान आदमी को देखकर वो हैरान हो गईं।
"भाभी जान!" आदमी ने हाथ जोड़े। "मैं मुस्तफा का छोटा भाई हूँ। याद है ना? मैं बहुत साल पहले व्यापार के लिए दूर निकल गया था। आज भाई की कब्र पर फूल चढ़ाने आया हूँ।"
माँ कुछ देर तक चुप रहीं। उनके मन में हज़ार सवाल थे — पर मेहमान को मेहमान की तरह बिठाना भी ज़रूरी था।
आदमी ने अपने थैले से सोने के सिक्के निकाले। पाँच चमकते हुए सिक्के माँ के हाथ में रख दिए।
"भाभी, ये बस छोटी-सी भेंट है। अलादीन के लिए मिठाइयाँ ले आइए। और कुछ अच्छा खाना भी।"
माँ की आँखें भर आईं। इतने पैसे तो उन्होंने महीनों में नहीं देखे थे। उनकी थोड़ी-सी शक की दीवार उसी पल टूट गई।
उस रात पूरे घर में बहुत समय बाद अच्छा खाना पका। मटन, चावल, सेवइयाँ। सब कुछ था। अलादीन ने इतना खाया कि पेट फूल गया।
खाने के बाद वो आदमी अलादीन के पास आकर बैठा।
"बेटा, सुन। कल सुबह मैं तुझे अपने साथ ले चलूँगा। शहर के बाहर एक बहुत खास जगह है। वहाँ एक बहुत बड़ा खज़ाना है — और वो पूरा खज़ाना तेरा होगा।"
अलादीन की आँखें बड़ी हो गईं। "खज़ाना? सच में मामा?"
"बिल्कुल सच। पर एक शर्त है। तुझे बिल्कुल वैसा ही करना होगा जैसा मैं कहूँगा। एक भी कदम इधर-उधर नहीं। समझा?"
अलादीन ने ज़ोर से सिर हिलाया। "हाँ मामा, बिल्कुल वैसा ही।"
आदमी मुस्कुराया। पर उसकी मुस्कान में कुछ अजीब-सा था — जैसे होंठ हँस रहे थे, पर आँखें नहीं।
अलादीन उस मुस्कान को नहीं समझ पाया। उसकी ख़ुशी में वो भूल गया कि कोई अजनबी अचानक मामा बनकर क्यों आया है। कोई असली मामा अचानक एक रात में सोने के सिक्के और खज़ाने की बातें क्यों करेगा।
उस रात अलादीन सपनों में सोने के पहाड़ देखता रहा।
पर सच यह था — जो आदमी उसे "मामा" कहकर ले जा रहा था, वो उसका रिश्तेदार बिल्कुल नहीं था। वो एक खतरनाक जादूगर था, जो दूर मिस्र देश से अलादीन की तलाश में आया था। और कल जो होने वाला था, वो किसी की भी सोच से परे था।
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