एक सुनसान पहाड़, ज़मीन पर खिंची अजीब-सी रेखाएँ, और एक भारी पत्थर — जिसके नीचे छुपा था एक भयानक राज़।
अगली सुबह सूरज निकलते ही जादूगर अलादीन के दरवाज़े पर खड़ा था। माँ ने अलादीन को साफ़ कपड़े पहनाए। उसके माथे पर हाथ फेरा।
"बेटा, मामा की बात मानना। शाम तक लौट आना।"
"हाँ माँ।"
दोनों बाज़ार से होते हुए शहर के दरवाज़े के बाहर निकले। सड़क छूटती गई। हरियाली कम होती गई। धीरे-धीरे रास्ते में बस रेत और पत्थर रह गए।
"मामा, अभी और कितना दूर?" अलादीन हाँफ रहा था।
"बस थोड़ा-सा बेटा। एक बार तू वो खज़ाना देख लेगा, तो तू सब थकान भूल जाएगा।"
दोपहर हो गई। सूरज सिर पर तप रहा था। आगे एक छोटी-सी पहाड़ी थी। जादूगर ने उसी पहाड़ी की ओर इशारा किया।
"वहीं है वो जगह। चल, ज़रा और चलते हैं।"
पहाड़ी के पीछे एक सुनसान घाटी थी। चारों तरफ़ बस पत्थर ही पत्थर। हवा भी जैसे रुकी हुई थी। कोई पंछी नहीं, कोई आवाज़ नहीं। बस एक अजीब-सी ख़ामोशी।
जादूगर ने अपने थैले से कुछ सूखी टहनियाँ निकालीं। उन्हें ज़मीन पर ढेर लगाकर रखा। फिर एक छोटा-सा पत्थर निकाला। उस पत्थर को टहनियों पर रगड़ा।
तुरंत आग जल उठी। पर ये साधारण आग नहीं थी। इसकी लपटें नीली-हरी थीं। और उन लपटों से धुएँ के बजाय एक मीठी-सी खुशबू निकल रही थी।
अलादीन डर के मारे दो कदम पीछे हट गया।
"म-मामा, ये क्या है?"
"डर मत बेटा। बस देखता रह।"
जादूगर ने थैले से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला। उसमें से कुछ काला पाउडर लेकर आग में फेंका। फिर ज़ोर-ज़ोर से कुछ अजीब-से शब्द बोलने लगा — ऐसे शब्द जो अलादीन ने पहले कभी नहीं सुने थे।
अचानक धरती हिलने लगी। अलादीन के पैरों के नीचे की मिट्टी काँप उठी। पास ही ज़मीन फटी, और एक बड़ा-सा पत्थर अपने आप ऊपर उठ गया। उसके नीचे एक सीधा-सा रास्ता था — जो ज़मीन के अंदर नीचे जा रहा था।
उस अंधेरे रास्ते से एक ठंडी हवा आ रही थी। और उसके साथ एक हल्की-सी सुनहरी रोशनी भी।
जादूगर ने अलादीन का हाथ पकड़ा।
"सुन बेटा, ध्यान से सुन। इस गुफा में नीचे जा। तीन कमरे आएँगे — एक सोने का, एक चांदी का, और एक हीरों का। तीनों में से किसी भी चीज़ को मत छूना। अगर तूने एक भी सिक्का छुआ, तो तू पत्थर का बन जाएगा।"
अलादीन ने डरते हुए सिर हिलाया।
"तीनों कमरे पार करने के बाद एक छोटा-सा बगीचा आएगा। बगीचे में पेड़ों पर अजीब-से रंगीन फल लगे होंगे। उन्हें चाहे तो तू ले लेना — वो तेरे लिए हैं।"
"और मामा? वो खज़ाना?"
"बगीचे के बीच में एक खंभा होगा। उस खंभे पर एक छोटा-सा पुराना तेल का चिराग रखा होगा। बस वो चिराग ले आना। और कुछ नहीं।"
अलादीन को अजीब लगा। इतनी सारी सोने-चांदी की चीज़ें छोड़कर एक टूटा-सा चिराग? पर उसने पूछा नहीं।
जादूगर ने अपनी उंगली से एक अंगूठी उतारी। पीतल की एक छोटी-सी अंगूठी, जिसमें हरे रंग का पत्थर जड़ा था।
"ये अंगूठी पहन ले। ये तुझे रास्ते में किसी भी मुसीबत से बचाएगी।"
अलादीन ने अंगूठी पहन ली।
अलादीन धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। पहले कुछ कदम बाद ही ज़मीन के ऊपर की रोशनी छूट गई। चारों तरफ़ बस वो हल्की सुनहरी चमक रह गई।
थोड़ी देर में पहला कमरा आया। अलादीन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
पूरा कमरा सोने से भरा था। सोने की थालियाँ, सोने के मटके, सोने के सिक्के दीवार से दीवार तक बिखरे हुए। हर सिक्का चमक रहा था जैसे अभी-अभी ढाला गया हो।
अलादीन का हाथ अपने आप बढ़ने लगा। पर उसे मामा की बात याद आई। उसने हाथ खींच लिया।
दूसरा कमरा चांदी का था — और तीसरा हीरों से भरा। हर हीरा एक बच्चे की मुट्ठी जितना बड़ा। हर हीरा अपनी रोशनी से चमक रहा था।
अलादीन ने अपनी आँखें नीचे झुका लीं और तेज़ी से तीनों कमरे पार कर गया।
आख़िर में वो उस बगीचे में पहुँचा। बगीचा वाकई अजीब था। पेड़ों पर पत्ते सुनहरे थे, और फल — कुछ लाल, कुछ हरे, कुछ नीले, कुछ सफ़ेद। हर फल जैसे एक रत्न हो।
अलादीन ने कुछ फल अपनी जेब में भर लिए।
बगीचे के बीच में सच में एक छोटा-सा खंभा था। और उस पर रखा था — एक पुराना, धूल से सना तेल का चिराग। मामूली पीतल का। ऐसा चिराग जो उसके बाज़ार में दो पैसे में बिकता।
अलादीन ने हाथ बढ़ाकर चिराग उठा लिया। उसकी जेब में रखा। और वापस मुड़ गया।
जब वो सीढ़ियाँ चढ़कर वापस ऊपर पहुँचा, तो जादूगर बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहा था।
"चिराग ला बेटा! जल्दी मुझे पकड़ा! पहले चिराग!"
उस आवाज़ में अब वो प्यार नहीं था। एक तेज़ लालच था। एक भूख थी।
अलादीन गुफा के मुँह पर खड़ा था — आधा अंदर, आधा बाहर। उसके हाथ में चिराग था। पर अब उसे डर लगने लगा था।
"मामा, पहले मुझे ऊपर तो आने दो। फिर..."
"नहीं! पहले चिराग दे!"
अलादीन ने हाथ पीछे खींच लिया।
जादूगर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसकी आँखों में आग जल उठी। उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और कुछ कड़े-से शब्द बोले।
ज़ोर का धमाका हुआ। वो भारी पत्थर अपने आप वापस अपनी जगह आ गिरा। गुफा का मुँह बंद हो गया।
अलादीन अंदर ही अंदर रह गया।
"मामा! मामा! दरवाज़ा खोलिए! मैं अंदर बंद हो गया!"
पर बाहर से कोई जवाब नहीं आया। बस ख़ामोशी।
और तभी अलादीन को समझ में आया — वो आदमी उसका मामा था ही नहीं।
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