एक छोटी-सी अंगूठी, एक पुराना चिराग, और दो ऐसे जिन्न — जिन्होंने अलादीन की पूरी ज़िंदगी पलट दी।
अलादीन गुफा के अंदर बंद था। ऊपर से रोशनी का कोई रास्ता नहीं। बाहर से कोई आवाज़ नहीं। बस वो सुनहरी चमक, जो अब ठंडी और डरावनी लगने लगी थी।
उसने ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीटा। चिल्लाया। रोया। पर वो भारी पत्थर हिला तक नहीं।
अलादीन सीढ़ियों पर ही बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
"माँ, मैं अब घर कैसे आऊँगा? वो आदमी असली मामा था ही नहीं... मुझे कैसे यकीन हो गया उसकी बातों पर?"
उसने अपने हाथ जोड़े। दुआ माँगने लगा। पर दुआ माँगते वक़्त उसने बस आदत से अपने हाथों को आपस में रगड़ा।
उसके दाएँ हाथ की उंगली में वो पीतल की अंगूठी थी। जब उसने हाथ रगड़े, तो अंगूठी भी रगड़ खा गई।
तुरंत एक धमाका हुआ। अंगूठी से धुएँ का एक गुबार निकला — और उस धुएँ में से एक बहुत बड़ा-सा शरीर बाहर आया।
अलादीन के सामने एक विशाल जिन्न खड़ा था। उसका रंग नीला, बाल लंबे काले, और शरीर पर बस सोने के कंगन। वो इतना बड़ा था कि उसका सिर गुफा की छत से छू रहा था।
"बोलो मालिक! क्या हुक्म है? मैं इस अंगूठी का जिन्न हूँ। जिसके पास ये अंगूठी होती है, उसका हुक्म मानना मेरा फ़र्ज़ है।"
अलादीन की हालत देखने लायक थी। आँखें बड़ी, मुँह खुला हुआ। पर डर के बीच भी उसे एक उम्मीद की किरण दिख गई।
"मु-मुझे यहाँ से बाहर निकालो! मेरी माँ के पास!"
"जो हुक्म, मालिक।"
जिन्न ने अपना बड़ा-सा हाथ बढ़ाया। एक झटके में अलादीन को उठाया। फिर एक और धमाका हुआ — और अगले ही पल अलादीन अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा था।
जिन्न गायब हो चुका था।
अलादीन ने दरवाज़ा खटखटाया। माँ ने खोला, और बेटे को देखकर रोते हुए सीने से लगा लिया।
"बेटा! तू ठीक है? कहाँ था इतनी देर? वो तेरा मामा कहाँ है?"
अलादीन ने सब कुछ बताया। माँ ने सुना तो उसे यकीन ही नहीं हुआ।
"बेटा, तू झूठ बोल रहा है। ये सब कैसे हो सकता है?"
"माँ, सच कह रहा हूँ। देखो, ये रंगीन फल मैं ले आया हूँ। और ये पुराना चिराग।"
उसने जेब से वो चिराग निकाला। पर भूख इतनी ज़्यादा थी कि माँ-बेटे के पास उसे देखने का वक़्त नहीं था। दो दिन से किसी ने ठीक से कुछ खाया नहीं था।
"माँ, घर में कुछ है खाने को?"
माँ ने सिर हिलाया। "नहीं बेटा। पर ये चिराग दे — मैं इसे साफ़ करके बेच आती हूँ बाज़ार में। शायद थोड़े पैसे मिल जाएँ।"
उसने कपड़ा लिया और चिराग पर रगड़ने लगी।
तुरंत — एक बहुत ज़ोर का धमाका हुआ। पूरा कमरा हिल गया। चूल्हे की आग भभक उठी। और चिराग से एक बहुत बड़ा गुलाबी-नारंगी धुआँ निकला।
उस धुएँ में से एक और जिन्न बाहर आया। पर ये पहले वाले से दस गुना बड़ा था। उसका सिर छत से ऊपर निकल रहा था। पूरा कमरा उसकी रोशनी से जगमगा उठा।
"बोलो मालिक! क्या हुक्म है? मैं इस चिराग का जिन्न हूँ। मेरी ताक़त बहुत बड़ी है। दुनिया में जो कुछ भी आप माँगेंगे, मैं ला दूँगा।"
माँ डर के मारे बेहोश-सी हो गईं। अलादीन ने उन्हें संभाला। फिर साँस ली, और जिन्न से कहा —
"पहले हमारे लिए कुछ खाने को ला दे। हम बहुत भूखे हैं।"
"जो हुक्म।"
एक पल बाद कमरे के बीच सोने की एक बड़ी थाली रखी थी। उस थाली पर तरह-तरह के पकवान — गरमा-गरम चावल, कोरमा, रोटियाँ, खजूर, दूध, और मिठाइयाँ।
जिन्न गायब हो गया।
माँ-बेटे ने पेट भर के खाया। जब पेट भर गया, तो अलादीन ने सोने की थाली को देखा।
"माँ, ये थाली ही बहुत महँगी है। हम इसे बेच दें, तो कई महीने आराम से जी सकते हैं।"
माँ ने सिर हिलाया। "बेटा, पर अब वो चिराग किसी और को मत दिखाना। और जिन्न को भी ज़्यादा मत बुलाना। ये जादू की चीज़ है — गलत हाथों में पड़ी, तो बहुत मुसीबत हो जाएगी।"
अलादीन ने वादा किया।
अगले कई दिन अलादीन और उसकी माँ उसी थाली के पैसों से चलते रहे। पर अलादीन अब वो पुराना शरारती लड़का नहीं रहा था। उसने माँ के साथ काम सीखना शुरू किया।
एक दिन वो बाज़ार में था। तभी जलूस की आवाज़ आई। ढोल बजे। पहरेदार आगे चलने लगे।
"रास्ता खाली करो! रास्ता खाली करो! राजकुमारी बद्र-अल-बदर हम्माम जा रही हैं!"
लोगों ने रास्ता छोड़ दिया। सब अपनी-अपनी आँखें ज़मीन पर झुकाए खड़े हो गए। नियम था — राजकुमारी का चेहरा कोई आम आदमी नहीं देख सकता।
पर अलादीन की जिज्ञासा रुकी नहीं। उसने बाज़ार के एक कोने में, परदे के पीछे से चुपके से देखा।
राजकुमारी पालकी में बैठी थीं। उन्होंने अपना नक़ाब हटाया हुआ था। उनके चेहरे से जैसे चाँद की रोशनी निकल रही थी। बाल लंबे, आँखें बादाम जैसी, होंठ गुलाब की पंखुड़ी जैसे।
अलादीन उन्हें देखता रह गया। पालकी निकल गई। बाज़ार खाली हो गया। पर अलादीन वहीं खड़ा रहा।
उस रात वो खाना नहीं खा सका। नींद नहीं आई। बस एक ही चेहरा आँखों के सामने था।
आख़िर में उसने माँ से कहा —
"माँ, मुझे राजकुमारी बद्र से शादी करनी है।"
माँ हाथ से रोटी गिर गई।
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