आज से लगभग चौबीस सौ वर्ष पहले की बात है। तब का भारत आज से बहुत भिन्न था। उत्तर में हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ। पूर्व में बंगाल का हरा-भरा डेल्टा। पश्चिम में सिंधु नदी और उससे आगे यवन देश। दक्षिण में विंध्य के घने जंगल। और बीच में — गंगा की उपजाऊ घाटी, जहाँ अनेक छोटे-बड़े राज्य फैले हुए थे।
उन दिनों भारत एक नहीं था। यहाँ सोलह महाजनपद थे — सोलह बड़े राज्य। इनमें सबसे शक्तिशाली था मगध — जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। मगध के राजा सबसे धनी, सबसे विशाल सेना के स्वामी, और सबसे ऊँची प्रतिष्ठा के अधिकारी थे।
उस समय मगध पर एक नया राजवंश शासन कर रहा था — नंद वंश। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था धनानंद। नाम से ही पता चलता है — धन से युक्त नंद। उसके राजकोष में अनगिनत सोना-चाँदी। उसकी सेना में लाखों सैनिक। पर एक बात — धनानंद का स्वभाव कठोर था। वह अहंकारी, क्रोधी, और कई बार न्याय से दूर।
उसी काल में — सिंधु नदी के पार — एक और बड़ी हलचल हो रही थी। यवन देश के एक नौजवान सम्राट सिकंदर — पूरे संसार को जीतने का सपना देखता हुआ — पूर्व की ओर बढ़ रहा था। उसकी सेना मिस्र, फ़ारस, और मध्य एशिया को जीतकर अब भारत के द्वार पर थी।
भारत के लिए ये दो बड़े संकट — एक भीतरी (नंद का कुशासन) और एक बाहरी (सिकंदर का आक्रमण)। दोनों का सामना कौन करेगा?
उत्तर इतिहास के एक छोटे-से कोने में पल रहा था। एक छोटे से ब्राह्मण घर में। एक छोटे-से बालक के रूप में।
उस बालक का जन्म-स्थान विषय इतिहासकारों में विवादास्पद है। कुछ कहते हैं तक्षशिला के पास। कुछ कहते हैं पाटलिपुत्र के पास के एक गाँव में। पर सबसे प्राचीन परंपरा कहती है — दक्षिण भारत के एक ब्राह्मण कुल में, जो बाद में उत्तर की ओर आया।
कुल का नाम था — कौटिल्य गोत्र। इसी कारण आगे चलकर इस बालक को कौटिल्य भी कहा जाने लगा।
बालक के पिता का नाम था — चणक। वे एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। वेद, उपनिषद, धर्म-शास्त्र — सब के ज्ञाता। पर वे कोई दरबारी पंडित नहीं थे। उन्होंने एक छोटे-से गाँव में अपना आश्रम स्थापित किया था। वहाँ वे विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा देते थे।
माता का नाम था — चणेश्वरी। वे एक धर्मनिष्ठ, संयमित स्त्री थीं। आचार्य चणक के साथ उन्होंने एक सादा जीवन जीने का व्रत लिया था।
दोनों की एक ही संतान थी — एक छोटा-सा पुत्र। इस पुत्र का नाम पिता ने अपने ही नाम से प्रेरित होकर रखा — "चाणक्य।" जिसका अर्थ है — चणक का पुत्र।
(इस बालक के तीन नाम चलन में थे। पहला — चाणक्य (पिता के नाम से)। दूसरा — विष्णुगुप्त (बचपन में दिया गया मूल नाम)। तीसरा — कौटिल्य (कुल-गोत्र से)। तीनों नाम एक ही व्यक्ति के लिए। इस ग्रंथ में हम मुख्य रूप से "चाणक्य" का प्रयोग करेंगे।)
शिशु चाणक्य जी का जन्म कोई असाधारण घटना नहीं थी। न आसमान फटा। न देव-दुदुम्भि बजी। न कोई भविष्यवाणी हुई। एक साधारण ब्राह्मण घर में — एक साधारण रात में — एक छोटा-सा शिशु पैदा हुआ।
पर एक बात — इस शिशु के बारे में। जन्म के समय उनके मुँह में एक पूर्ण विकसित दाँत था। यह बहुत असामान्य था।
एक पुरोहित आए जन्म-पत्रिका बनाने। उन्होंने यह दाँत देखा। उनकी आँखें फटी रह गईं।
"आचार्य चणक," उन्होंने कहा, "यह बालक कोई साधारण नहीं। जन्म के समय दाँत — यह एक राजचिह्न है। ज्योतिष में यह कहता है — यह बालक एक दिन एक राजा बनेगा।"
आचार्य चणक मुस्कुराए। पर उनकी मुस्कान में एक चिंता भी थी।
"पुरोहित जी, हमारा कुल ब्राह्मण है। राजा बनना हमारा धर्म नहीं। हम जो हैं — वो रहेंगे।"
उन्होंने एक छोटा-सा निर्णय किया। उन्होंने उस दाँत को तुरंत निकाल दिया। यह एक प्रकार का प्रतीकात्मक कार्य था। "मेरा बेटा राजा नहीं बनेगा। मेरा बेटा एक आचार्य होगा।"
पर पुरोहित ने एक छोटी-सी बात कही — जो आगे चलकर सच निकली।
"आचार्य चणक, आपने दाँत निकाल दिया। पर इसका अर्थ नहीं कि बालक राजा नहीं बनेगा। बल्कि अब यह बालक स्वयं राजा नहीं — पर एक राजा को राजा बनाएगा। यह बालक एक राज-निर्माता होगा।"
यह बात आचार्य चणक के मन में बैठ गई। उन्होंने भविष्य में कुछ नहीं कहा। पर वे जानते थे — यह पुरोहित कुछ ज़रूरी बात कह गया है।
शिशु चाणक्य जी बढ़ने लगे। दिन-ब-दिन। पहली सीख माँ से। दूसरी पिता से। और तीसरी — आश्रम में आने वाले विद्यार्थियों से।
आचार्य चणक का आश्रम एक छोटा-सा स्थान था। पर वहाँ शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा था। दूर-दूर से युवक आते थे — वेद सीखने, धर्म-शास्त्र सीखने, राजनीति सीखने। आचार्य चणक हर एक को धैर्य से सिखाते।
शिशु चाणक्य जी को इन कक्षाओं में बैठने की अनुमति बचपन से ही थी। माँ उनकी गोद में लेकर पीछे एक कोने में बैठतीं। बालक चुपचाप हर एक शब्द सुनता रहता। उनकी आँखों में एक अद्भुत एकाग्रता।
तीन वर्ष की आयु तक — वे संस्कृत के सरल श्लोक स्वयं बोलने लगे। पाँच वर्ष की आयु में — पंचतंत्र की कथाएँ अपने मुँह से। सात वर्ष की आयु में — गायत्री मंत्र, ईशोपनिषद, और कुछ छोटे वैदिक स्तोत्र।
आचार्य चणक हैरान थे। पर हैरानी के साथ-साथ एक चिंता भी।
"यह बालक मेरे जैसा नहीं। यह कुछ और। पर क्या?"
उन्होंने अपने एक मित्र से बात की — एक प्रसिद्ध ज्योतिषी से। उस ज्योतिषी ने भी बालक को देखा और कहा —
"आचार्य, आपके पुत्र की कुंडली में एक भारी योग है। यह बालक एक दिन — पूरे भारत के इतिहास को बदलेगा। पर एक चेतावनी — इसका मार्ग आसान नहीं होगा। बहुत-सी कठिनाइयाँ होंगी। बहुत-सा अपमान।"
आचार्य चणक ने सुना। उनके मन में पुरोहित की पुरानी बात याद आई। शायद यह बालक — सच में — एक असाधारण बालक है।
उन्होंने मन में एक निर्णय किया। "यह बालक जब बड़ा होगा — मैं इसे तक्षशिला भेजूँगा। तक्षशिला — भारत का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय। वहाँ इसका विकास सबसे अच्छा होगा।"
पर यह दिन अभी कुछ वर्ष दूर था। अभी — चाणक्य जी एक नन्हा-सा बालक थे। एक छोटा-सा आश्रम। एक छोटा-सा गाँव। पर मन में — एक बड़ा-सा भविष्य।
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