1 ब्राह्मण कुल और चाणक्य का जन्म FREE 2 बचपन और तक्षशिला की ओर FREE 3 तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन FREE 4 आचार्य बनना FREE 5 मगध और नंद वंश का दर्शन FREE 6 मगध दरबार में अपमान FREE 7 प्रतिज्ञा — नंद वंश का अंत FREE 8 चन्द्रगुप्त की पहचान FREE 9 तक्षशिला की वापसी और प्रशिक्षण का आरंभ FREE 10 प्रारंभिक प्रशिक्षण के वर्ष FREE 11 सिकंदर का आगमन FREE 12 पुरु का संग्राम FREE 13 सिकंदर की वापसी और चन्द्रगुप्त की पहली सेना FREE 14 पहली पराजय और एक छोटा-सा सबक FREE 15 किनारों से जीत — एक नई रणनीति FREE 16 पाटलिपुत्र पर अप्रत्याशित आक्रमण FREE 17 राज्याभिषेक और एक नए वंश का आरंभ FREE 18 राजमहल का पहला महीना FREE 19 अर्थशास्त्र की रचना FREE 20 सात अंगों का राज्य-तंत्र FREE 21 कूटनीति के सूत्र FREE 22 सेलुकस का आक्रमण और संधि FREE 23 मेगस्थनीज़ का पाटलिपुत्र-वास FREE 24 दक्षिण भारत की ओर FREE 25 चाणक्य-नीति के सूत्र FREE 26 मौर्य प्रशासन और गुप्तचर-व्यवस्था FREE 27 विषकन्या-षडयंत्र FREE 28 बिंदुसार का युग FREE 29 चाणक्य का अंतिम काल FREE 30 विरासत — अर्थशास्त्र की अमर पुस्तक FREE
Font Size
17px
Font
Background
Line Spacing
Episode 2 6 min read 2 0 FREE

बचपन और तक्षशिला की ओर

F
Funtel
9 ghante pehle

बालक चाणक्य जी का बचपन उसी छोटे-से आश्रम में बीता। पिता आचार्य चणक की निगरानी में। माँ चणेश्वरी के स्नेह में।

आश्रम का दिन सूर्योदय से पहले आरंभ होता था। बालक चाणक्य जी सबसे पहले उठते थे। पास के एक छोटे-से तालाब में स्नान। फिर सूर्य-नमस्कार। फिर अपने हिस्से का जल भरकर आश्रम में लाना।

उनके पिता ने एक नियम बनाया था — हर बालक को आश्रम का कुछ काम करना है। राजा का बेटा हो या ब्राह्मण का — सब समान। बालक चाणक्य जी ने यह सीख बहुत गहराई से ली। आगे चलकर उनके सब निर्णयों में यह झलकता रहा — श्रम और श्रम-करने वाले का सम्मान।

एक दिन — चाणक्य जी लगभग दस वर्ष के थे — एक छोटी-सी घटना घटी। आश्रम में एक नया विद्यार्थी आया। उसका नाम था सुदर्शन। उसके पिता एक बड़े व्यापारी थे। सुदर्शन को घर में बहुत-से सेवक मिलते थे — खाना परोसने वाले, कपड़े धोने वाले, सब काम करने वाले।

आश्रम में सुदर्शन ने काम करने से इनकार किया। उन्होंने कहा — "मैं तो व्यापारी का बेटा हूँ। मैं काम क्यों करूँ? यह तो छोटे लोगों का काम।"

आचार्य चणक ने यह सुना। पर वे कुछ नहीं बोले। उन्होंने अपने बेटे को इशारा किया।

बालक चाणक्य जी सुदर्शन के पास गए। एक छोटा-सा घड़ा हाथ में। "भाई सुदर्शन, चलो — हम साथ जाकर तालाब से जल लाएँ।"

"मैं नहीं जाऊँगा।"

"फिर मैं अकेले जाता हूँ। पर एक बात कहूँ?"

"क्या?"

"मेरे पिता — आचार्य चणक — स्वयं अपने हाथ से जल भरते हैं। मेरी माँ अपने हाथ से रोटियाँ बनाती हैं। हम सब एक जैसे काम करते हैं। तुम्हारे पिता ने तुम्हें यहाँ क्यों भेजा? बस ज्ञान के लिए नहीं — एक नया जीवन सीखने के लिए। बाहर तुम व्यापारी का बेटे हो। यहाँ तुम बस एक विद्यार्थी।"

सुदर्शन कुछ देर मौन रहे। फिर उन्होंने अपना घड़ा उठाया। साथ में चले।

आचार्य चणक ने यह दूर से देखा। उन्होंने मन में मुस्कुराया। "मेरा पुत्र शिक्षा देना भी जानता है।"

बारह वर्ष की आयु तक — चाणक्य जी की वैदिक शिक्षा लगभग पूरी हो गई थी। चारों वेद। प्रमुख उपनिषद। धर्म-शास्त्र। पाणिनि का व्याकरण।

एक रात — आचार्य चणक ने अपने पुत्र को पास बिठाया।

"बेटा, तुम्हारी मूल शिक्षा अब पूरी है। अब तुम्हें आगे की शिक्षा के लिए जाना होगा।"

"कहाँ पिताजी?"

"तक्षशिला।"

बालक चाणक्य जी की आँखों में चमक आई। तक्षशिला का नाम वे बहुत बार सुन चुके थे। अनेक विद्यार्थी आश्रम आते-जाते उसकी कथाएँ सुनाते थे।

तक्षशिला सिंधु नदी के पार था — पंजाब क्षेत्र के उत्तर-पश्चिम कोने में। प्राचीन भारत का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय। यहाँ अनेक देशों से छात्र आते थे — फ़ारस, यवन, चीन, मध्य एशिया से भी। यहाँ वेद, धर्म, चिकित्सा, आयुर्वेद, युद्ध-कौशल, राजनीति, अर्थशास्त्र, ज्योतिष, कला — सब विषयों की शिक्षा।

"पिताजी, मैं कब जाऊँगा?"

"अगले महीने। तुम्हारी आयु अभी बारह की है। तेरह की होते-होते तुम तक्षशिला होगे।"

"और कितने वर्ष रहूँगा?"

"बेटा, तक्षशिला की शिक्षा कोई नियम-समय की नहीं। जब तक तुम्हें पूर्ण लगे, तब तक रहना। शायद आठ वर्ष, शायद दस, शायद पंद्रह। कोई सीमा नहीं।"

बालक चाणक्य जी ने सिर हिलाया। उनका मन ख़ुश था — पर एक उदासी भी। माँ-पिता से इतनी लंबी जुदाई।

विदाई का दिन आया। माँ चणेश्वरी ने अपने पुत्र के लिए एक छोटी-सी पोटली बनाई। दो जोड़ी कपड़े। एक छोटी-सी पुस्तक — जिसमें वैदिक मंत्र। कुछ सूखे फल। और एक छोटा-सा रुद्राक्ष का माला — जो उनकी अपनी माँ ने उन्हें दिया था।

"बेटा, यह माला अपनी गर्दन में रखना। जब-जब तुम्हें कठिन क्षण आए — इसे छूकर अपनी माँ की याद करना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।"

बालक चाणक्य जी ने माँ के पाँव छुए। फिर पिता के।

आचार्य चणक ने अपने पुत्र के माथे पर हाथ रखा।

"बेटा, तुम तक्षशिला जा रहे हो। एक बात याद रखना। ज्ञान केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं। ज्ञान — एक चरित्र है। एक दृष्टि। तुम जब-जब किसी कठिन प्रश्न से सामने हो — तब अपने भीतर का ब्राह्मण से पूछना। शास्त्र क्या कहते हैं? मेरा कुल क्या कहता है? मेरा पिता क्या सिखाएगा? यदि उत्तर मिले — वही करना। यदि न मिले — तो भी झूठ नहीं बोलना। हर कठिन प्रश्न का सत्य उत्तर — एक ब्राह्मण का धर्म है।"

"और एक बात — जब तुम तक्षशिला जाओगे — वहाँ तुम्हें अनेक प्रकार के लोग मिलेंगे। राजकुमार, व्यापारी, शूद्र, यवन। सब को बराबर रखना। जाति या वर्ग के आधार पर किसी को छोटा मत मानना। हर मनुष्य की अपनी प्रतिभा होती है। तुम्हें सब से कुछ न कुछ सीखना है।"

बालक चाणक्य जी ने ध्यान से सुना। पिता की बात उनके मन में बैठ गई। आगे चलकर — तक्षशिला में, मगध में, चन्द्रगुप्त के साथ — जब-जब वे एक नए मनुष्य से मिले — पिता की यह सीख याद आती।

एक छोटे-से कारवाँ के साथ चाणक्य जी निकले। कारवाँ में कुछ व्यापारी थे — जो उत्तर की ओर जा रहे थे। बैलगाड़ियाँ, ऊँट, घोड़े। एक ब्राह्मण बालक उनके बीच।

यात्रा कई महीने की थी। हर दिन कुछ कोस आगे। हर रात एक नए ठिकाने पर। चाणक्य जी ने रास्ते में बहुत कुछ देखा — बड़े गाँव, छोटे शहर, घने जंगल, बहती नदियाँ। प्रत्येक जगह की अपनी संस्कृति। अपनी भाषा। अपने रिवाज।

एक दिन कारवाँ ने पाटलिपुत्र से होकर गुज़रा। उस समय पाटलिपुत्र मगध की राजधानी था। एक विशाल शहर। सोने-चाँदी के बाज़ार। हाथियों के झुंड। नंद वंश का एक शक्तिशाली राज्य।

बालक चाणक्य जी ने पाटलिपुत्र की भव्यता देखी। पर साथ-साथ उनकी आँखों ने कुछ और भी देखा। शहर के बाहरी भाग में — ग़रीब लोग। भूखे बच्चे। टूटी झोंपड़ियाँ। सरकारी सैनिकों की कठोरता।

"यह कैसा राज्य है?" उन्होंने मन में सोचा। "धन है — पर असमानता बहुत बड़ी। सेना है — पर अपनी प्रजा पर अत्याचार करती है।"

उनके मन में पाटलिपुत्र के बारे में एक संकेत बैठ गया। आगे चलकर — कई वर्ष बाद — वे फिर से पाटलिपुत्र आएँगे। और उस समय का दर्शन इतिहास का मार्ग बदलने वाला था।

पर अभी — कारवाँ आगे बढ़ा। पाटलिपुत्र पीछे छूटा। और चाणक्य जी ने अपना पहला बड़ा सबक सीख लिया था।

एक राज्य की महानता — उसके सोने में नहीं, उसकी प्रजा की प्रसन्नता में होती है।

कुछ दिन बाद — कारवाँ ने सिंधु नदी पार की। और तक्षशिला के द्वार पर पहुँचे।

Aage kya hoga? 👇
Agla Episode
Continue Reading
Pichla 📋 Sab Episodes Agla

💬 Comments (0)

टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें

लॉगिन करें
पहली टिप्पणी करें! 🎉

बचपन और तक्षशिला की ओर

How would you like to enjoy this episode?

📖 0 sec