1 ब्राह्मण कुल और चाणक्य का जन्म FREE 2 बचपन और तक्षशिला की ओर FREE 3 तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन FREE 4 आचार्य बनना FREE 5 मगध और नंद वंश का दर्शन FREE 6 मगध दरबार में अपमान FREE 7 प्रतिज्ञा — नंद वंश का अंत FREE 8 चन्द्रगुप्त की पहचान FREE 9 तक्षशिला की वापसी और प्रशिक्षण का आरंभ FREE 10 प्रारंभिक प्रशिक्षण के वर्ष FREE 11 सिकंदर का आगमन FREE 12 पुरु का संग्राम FREE 13 सिकंदर की वापसी और चन्द्रगुप्त की पहली सेना FREE 14 पहली पराजय और एक छोटा-सा सबक FREE 15 किनारों से जीत — एक नई रणनीति FREE 16 पाटलिपुत्र पर अप्रत्याशित आक्रमण FREE 17 राज्याभिषेक और एक नए वंश का आरंभ FREE 18 राजमहल का पहला महीना FREE 19 अर्थशास्त्र की रचना FREE 20 सात अंगों का राज्य-तंत्र FREE 21 कूटनीति के सूत्र FREE 22 सेलुकस का आक्रमण और संधि FREE 23 मेगस्थनीज़ का पाटलिपुत्र-वास FREE 24 दक्षिण भारत की ओर FREE 25 चाणक्य-नीति के सूत्र FREE 26 मौर्य प्रशासन और गुप्तचर-व्यवस्था FREE 27 विषकन्या-षडयंत्र FREE 28 बिंदुसार का युग FREE 29 चाणक्य का अंतिम काल FREE 30 विरासत — अर्थशास्त्र की अमर पुस्तक FREE
Font Size
17px
Font
Background
Line Spacing
Episode 3 5 min read 1 0 FREE

तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन

F
Funtel
9 ghante pehle

तक्षशिला — एक ऐसा नगर जिसकी कथा भारत के सबसे पुराने काल से चली आ रही थी। पुराणों के अनुसार राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने इस नगर की नींव रखी थी। उन्हीं के नाम पर इसका नाम पड़ा।

नगर के मध्य में था विश्वविद्यालय। पर यह आधुनिक विश्वविद्यालयों की तरह एक भवन में नहीं था। तक्षशिला एक "विद्यापीठ" — एक खुली शिक्षा-नगरी थी। यहाँ अनेक छोटे-छोटे आश्रम थे। हर आश्रम में एक मुख्य आचार्य। आसपास उनके विद्यार्थी रहते। प्रत्येक आचार्य अपने अपने विषय में निपुण।

विद्यापीठ में लगभग दस हज़ार छात्र थे। पाँच सौ से अधिक आचार्य। सब विषय पढ़ाए जाते थे — वेद, उपनिषद, धर्म-शास्त्र, चिकित्सा, आयुर्वेद, शल्य-चिकित्सा, युद्ध-कौशल, राजनीति, अर्थशास्त्र, ज्योतिष, खगोल-विद्या, गणित, संगीत, चित्रकला।

एक दिलचस्प बात — तक्षशिला में पढ़ाई के लिए कोई शुल्क नहीं था। पर एक नियम था। हर छात्र अपने आचार्य के घर का काम करता था। सेवा के बदले शिक्षा। विद्यार्थी के परिवार की सामर्थ्य के अनुसार वे कुछ दान देते थे। पर अनिवार्य कुछ नहीं।

बालक चाणक्य जी जब तक्षशिला पहुँचे — वे एक दीन-हीन ब्राह्मण बालक की तरह दिखे। फटे कपड़े, धूल से सना चेहरा। पर उनकी आँखों में एक अद्भुत चमक थी।

विद्यापीठ के मुख्य द्वार पर — एक प्रवेश-परीक्षा होती थी। हर नए छात्र को कुछ प्रश्न पूछे जाते। एक वरिष्ठ आचार्य उत्तर सुनकर तय करते — किस आचार्य के पास भेजा जाए।

चाणक्य जी की प्रवेश-परीक्षा एक वरिष्ठ आचार्य ने ली — जिनका नाम था आचार्य धन्वंतरि। वे चिकित्सा-शास्त्र के प्राध्यापक थे, पर वे विद्यापीठ के मुख्य प्रवेश-अधिकारी भी थे।

"बालक, तुम्हारा नाम?"

"चाणक्य।"

"पिता का नाम?"

"आचार्य चणक।"

"कहाँ से आए?"

"दक्षिण भारत के कौटिल्य गोत्र से।"

"तुम्हारी पूर्व शिक्षा?"

"पिता जी से चारों वेद, प्रमुख उपनिषद, धर्म-शास्त्र, पाणिनि का व्याकरण।"

आचार्य धन्वंतरि ने सिर हिलाया। फिर एक प्रश्न पूछा —

"बालक, एक प्रश्न पूछूँ। एक राजा के राज्य में बहुत-सा सोना है। पर उसकी प्रजा भूखी है। दूसरी ओर एक राजा के पास सोना कम है, पर प्रजा प्रसन्न है। दोनों में कौन-सा राजा बेहतर?"

चाणक्य जी ने एक क्षण सोचा। फिर उत्तर दिया —

"आचार्य जी, दोनों ही अधूरे राजा। पहला राजा अपनी प्रजा का धन छीनकर अपना खज़ाना भर रहा है। दूसरा राजा प्रजा को प्रसन्न रखने में अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है, पर शायद वह राज्य की रक्षा के लिए पर्याप्त सेना नहीं रख सकता। आदर्श राजा वह है — जिसके पास पर्याप्त धन भी हो, और प्रजा भी प्रसन्न हो। एक के बिना दूसरा अधूरा है।"

आचार्य धन्वंतरि की आँखें फैल गईं। यह उत्तर एक तेरह वर्ष के बालक से अपेक्षित नहीं था।

"बालक, तुम्हारी रुचि किस विषय में है?"

"आचार्य जी, मुझे राजनीति में रुचि है। मैंने पाटलिपुत्र से आते हुए नंद-राज्य देखा। मेरे मन में अनेक प्रश्न उठे। मैं इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढना चाहता हूँ।"

"राजनीति? पर तुम तो ब्राह्मण कुल के हो। ब्राह्मण-धर्म तो वेद-अध्ययन और पुरोहिताई।"

"आचार्य जी, ब्राह्मण-धर्म पर बहस तो आगे होगी। पर एक बात कहूँ। आचार्य चाणक्य के पुत्र होने के नाते — मेरे पिता ने मुझे यह सिखाया है। ब्राह्मण-धर्म केवल पुरोहिताई नहीं — समाज को मार्ग दिखाना भी है। यदि एक ब्राह्मण देखता है कि समाज ग़लत मार्ग पर जा रहा है — तो उसका धर्म है उसे ठीक करना। राजा को मार्गदर्शन देना भी ब्राह्मण-धर्म।"

आचार्य धन्वंतरि चुप रहे कुछ क्षण। फिर मुस्कुराए।

"बालक, तुम्हारा प्रवेश हो गया। तुम्हें मैं आचार्य पिप्पलाद के पास भेजूँगा। वे राजनीति और अर्थशास्त्र के सबसे बड़े आचार्य हैं तक्षशिला में। तुम्हारा मार्गदर्शन वही करेंगे।"

चाणक्य जी ने सिर झुकाकर सहमति दी।

आचार्य पिप्पलाद एक वृद्ध, अनुभवी आचार्य थे। उनकी सफ़ेद दाढ़ी कमर तक। आँखों में एक स्थिरता। उन्होंने अपने जीवन के साठ वर्ष राजनीति-शास्त्र के अध्ययन में लगाए थे।

उनके आश्रम में लगभग पचास विद्यार्थी थे। सब बड़े-बड़े राजकुमार, धनी व्यापारियों के बेटे। उन सब में चाणक्य जी सबसे सादे — एक ग़रीब ब्राह्मण बालक।

आरंभ में कुछ विद्यार्थियों ने चाणक्य जी का मज़ाक़ उड़ाया। उनके फटे कपड़े, उनकी सादी पोटली। पर आचार्य पिप्पलाद ने तत्काल हस्तक्षेप किया।

"बच्चो, मेरे आश्रम में एक नियम है। जो विद्यार्थी अपने सहपाठी को छोटा समझे — वह मेरे आश्रम से तत्काल बाहर। मैं ज्ञान के लिए विद्यार्थी चाहता हूँ — अहंकार के लिए नहीं।"

एक विद्यार्थी ने उठकर माफ़ी माँगी। दूसरों ने भी।

उस दिन से चाणक्य जी का सम्मान आश्रम में बढ़ने लगा।

आचार्य पिप्पलाद की शिक्षा-पद्धति बहुत विशेष थी। वे केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देते थे। वे विद्यार्थियों को राज्य के असली कार्यकलाप दिखाते। तक्षशिला के राजा के दरबार में ले जाते। न्यायालय में बैठाते। बाज़ार में भेजकर देखने को कहते — कैसे व्यापार चलता है।

"बच्चो, राजनीति किताब में नहीं — जीवन में होती है। मैं तुम्हें केवल नियम पढ़ाऊँगा। पर असली पाठ — तुम्हें स्वयं अनुभव से सीखने हैं।"

चाणक्य जी ने हर पाठ ध्यान से पढ़ा। हर अनुभव को मन में बसाया। चार वर्षों में — वे तक्षशिला के सबसे प्रतिभावान विद्यार्थी बनते जा रहे थे।

आचार्य पिप्पलाद ने एक बार कहा — "मेरे पास साठ वर्षों में अनेक विद्यार्थी आए। पर इस बालक चाणक्य जैसा कोई नहीं। यह एक दिन भारत के इतिहास को बदलेगा। आप मेरी बात याद रखना।"

Aage kya hoga? 👇
Agla Episode
Continue Reading
Pichla 📋 Sab Episodes Agla

💬 Comments (0)

टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें

लॉगिन करें
पहली टिप्पणी करें! 🎉

तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्ययन

How would you like to enjoy this episode?

📖 0 sec