बाज़ार में पहुँच कर घीसू बोला, “लकड़ी तो उसे जलाने भर की मिल गई है क्यूँ माधव।”
माधव बोला, “हाँ लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”
“तो कोई हल्का सा कफ़न ले-लें।”
“हाँ और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है।”
“कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”
“और क्या रखा रहता है। यही पाँच रुपये पहले मिलते तो कुछ दवा दारू करते।”
दोनों एक दूसरे के दिल का माजरा मानवी तौर पर समझ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। यहाँ तक कि शाम हो गई। दोनों इत्तिफ़ाक़ से या अमदन एक शराब ख़ाने के सामने आ पहुँचे और गोया किसी तय-शुदा फ़ैसले के मुताबिक़ अंदर गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों तज़बज़ुब की हालत में खड़े रहे। फिर घीसू ने एक बोतल शराब ली। कुछ गजक ली और दोनों बरामदे में बैठ कर पीने लगे।
कई कुज्जियाँ पैहम पीने के बाद दोनों सुरूर में आ गए।
घीसू बोला, “कफ़न लगाने से क्या मिलता। आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”
माधव आसमान की तरफ़ देख कर बोला, गोया फ़रिश्तों को अपनी मासूमियत का यक़ीन दिला रहा हो। “दुनिया का दस्तूर है। यही लोग बामनों को हजारों रुपये क्यूँ देते हैं। कौन देखता है। परलोक में मिलता है या नहीं।”
“बड़े आदमियों के पास धन है फूँकें, हमारे पास फूँकने को क्या है।”
“लेकिन लोगों को क्या जवाब दोगे? लोग पूछेंगे कि कफ़न कहाँ है?”
घीसू हँसा, “कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढा, मिले नहीं।”
माधव भी हँसा, इस ग़ैर मुतवक़्क़े ख़ुश-नसीबी पर क़ुदरत को इस तरह शिकस्त देने पर बोला, “बड़ी अच्छी थी बेचारी। मरी भी तो ख़ूब खिला-पिला कर।”
आधी बोतल से ज़्यादा ख़त्म हो गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगवाईं, गोश्त और सालन और चटपटी कलेजियाँ और तली हुई मछलियाँ।
शराब ख़ाने के सामने दुकान थी, माधव लपक कर दो पत्तलों में सारी चीज़ें ले आया। पूरे डेढ़ रुपये ख़र्च हो गए, सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।”
दोनों उस वक़्त इस शान से बैठे हुए पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाब-देही का ख़ौफ़ था न बदनामी की फ़िक्र। ज़ोफ़ के इन मराहिल को उन्होंने बहुत पहले तय कर लिया था। घीसू फ़लसफ़ियाना अंदाज़ से बोला, ”हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्य न होगा।”
माधव ने सर-ए-अ'क़ीदत झुका कर तसदीक़ की, “जरूर से जरूर होगा। भगवान तुम अंतरयामी (अ'लीम) हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से उसे दुआ दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वो कभी उम्र भर न मिला था।”
एक लम्हे के बाद माधव के दिल में एक तशवीश पैदा हुई। बोला, “क्यूँ दादा हम लोग भी तो वहाँ एक न एक दिन जाएँगे ही।”
घीसू ने इस तिफ़्लाना सवाल का कोई जवाब न दिया। माधव की तरफ़ पुर-मलामत अंदाज़ से देखा।
“जो वहाँ हम लोगों से पूछेगी कि तुमने हमें कफ़न क्यूँ न दिया, तो क्या कहेंगे?”
“कहेंगे तुम्हारा सर।”
“पूछेगी तो जरूर।”
“तू कैसे जानता है उसे कफ़न न मिलेगा? मुझे अब गधा समझता है। मैं साठ साल दुनिया में क्या घास खोदता रहा हूँ। उसको कफ़न मिलेगा और इससे बहुत अच्छा मिलेगा, जो हम देंगे।”
माधव को यक़ीन न आया। बोला, “कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिए।”
घीसू तेज़ हो गया, “मैं कहता हूँ उसे कफ़न मिलेगा तो मानता क्यूँ नहीं?”
“कौन देगा, बताते क्यूँ नहीं?”
“वही लोग देंगे जिन्होंने अब के दिया। हाँ वो रुपये हमारे हाथ न आएँगे और अगर किसी तरह आ जाएँ तो फिर हम इस तरह बैठे पिएँगे और कफ़न तीसरी बार लेगा।”
जूँ-जूँ अंधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मय-ख़ाने की रौनक़ भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई बहकता था, कोई अपने रफ़ीक़ के गले लिपटा जाता था, कोई अपने दोस्त के मुँह से साग़र लगाए देता था। वहाँ की फ़िज़ा में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो चुल्लू में ही उल्लू हो जाते हैं। यहाँ आते थे तो सिर्फ़ ख़ुद-फ़रामोशी का मज़ा लेने के लिए। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा से मसरूर होते थे। ज़ीस्त की बला यहाँ खींच लाती थी और कुछ देर के लिए वो भूल जाते थे कि वो ज़िंदा हैं या मुर्दा हैं या ज़िंदा-दर-गोर हैं।
और ये दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले ले के चुसकियाँ ले रहे थे। सब की निगाहें उनकी तरफ़ जमी हुई थीं। कितने ख़ुश-नसीब हैं दोनों, पूरी बोतल बीच में है।
खाने से फ़ारिग़ हो कर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठा कर एक भिकारी को दे दिया, जो खड़ा उनकी तरफ़ गुरसना निगाहों से देख रहा था और “देने” के ग़ुरूर और मसर्रत और वलवले का, अपनी ज़िंदगी में पहली बार एहसास किया। घीसू ने कहा, “ले जा खूब खा और असीरबाद दे, जिसकी कमाई थी वो तो मर गई मगर तेरा असीरबाद उसे जरूर पहुँच जाएगा, रोएँ रोएँ से असीरबाद दे, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं।”
माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देख कर कहा, “वो बैकुंठ में जाएगी। दादा बैकुंठ की रानी बनेगी।”
घीसू खड़ा हो गया और जैसे मसर्रत की लहरों में तैरता हुआ बोला, “हाँ बेटा बैकुंठ में न जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथ से लूटते हैं और अपने पाप के धोने के लिए गंगा में जाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं।”
ये ख़ुश-ए'तिक़ादी का रंग भी बदला। तलव्वुन नशे की ख़ासियत है। यास और ग़म का दौरा हुआ। माधव बोला, “मगर दादा बेचारी ने जिंदगी में बड़ा दुख भोगा। मरी भी कितनी दुख झेल कर।” वो अपनी आँखों पर हाथ रख कर रोने लगा।
घीसू ने समझाया, “क्यूँ रोता है बेटा! खुस हो कि वो माया जाल से मुक्त हो गई। जंजाल से छूट गई। बड़ी भागवान थी जो इतनी जल्द माया के मोह के बंधन तोड़ दिए।”
और दोनों वहीं खड़े हो कर गाने लगे; ‘ठगनी क्यों नैना झमकावे! ठगनी।
सारा मय-ख़ाना महव-ए-तमाशा था और ये दोनों मैकश मख़मूर महवियत के आलम में गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी, गिरे भी, मटके भी, भाव भी बताए और आख़िर नशे से बदमस्त हो कर वहीं गिर पड़े।
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