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कफ़न

M
Munshi Premchand
21 Mar 2026

झोंपड़े के दरवाज़े पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने ख़ामोश बैठे हुए थे और अन्दर बेटे की नौजवान बीवी बुधिया दर्द-ए-ज़ेह से पछाड़ें खा रही थी और रह-रह कर उसके मुँह से ऐसी दिल-ख़राश सदा निकलती थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे।

जाड़ों की रात थी, फ़ज़ा सन्नाटे में ग़र्क़, सारा गाँव तारीकी में जज़्ब हो गया था।

घीसू ने कहा, “मालूम होता है बचेगी नहीं। सारा दिन तड़पते हो गया, जा देख तो आ।”
माधव दर्दनाक लहजे में बोला, “मरना ही है तो जल्दी मर क्यूँ नहीं जाती। देख कर क्या आऊँ।”

“तू बड़ा बे-दर्द है बे! साल भर जिसके साथ जिंदगानी का सुख भोगा उसी के साथ इतनी बेवफाई।”
“तो मुझ से तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम, माधव इतना कामचोर था कि घंटे भर काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उसे कोई रखता ही न था। घर में मुट्ठी भर अनाज भी मौजूद हो तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो एक फ़ाक़े हो जाते तो घीसू दरख़्तों पर चढ़ कर लकड़ी तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वो पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। जब फ़ाक़े की नौबत आ जाती तो फिर लकड़ियाँ तोड़ते या कोई मज़दूरी तलाश करते। गाँव में काम की कमी न थी। काश्तकारों का गाँव था। मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे मगर उन दोनों को लोग उसी वक़्त बुलाते जब दो आदमियों से एक का काम पा कर भी क़नाअत कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। काश दोनों साधू होते तो उन्हें क़नाअत और तवक्कुल के लिए ज़ब्त-ए-नफ़्स की मुतलक़ ज़रूरत न होती। ये उनकी ख़ल्क़ी सिफ़त थी।

अ'जीब ज़िंदगी थी उनकी। घर में मिट्टी के दो चार बर्तनों के सिवा कोई असासा नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी उर्यानी को ढाँके हुए दुनिया की फ़िक़्रों से आज़ाद। क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते मगर कोई ग़म नहीं। मिस्कीन इतने कि वसूली की मुतलक़ उम्मीद न होने पर लोग उन्हें कुछ न कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर या आलू की फ़स्ल में खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भून कर खाते या दिन में दस-पाँच ईख तोड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी ज़ाहिदाना अंदाज़ में साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सआदतमंद बेटे की तरह बाप के नक़्श-ए-क़दम पर चल रहा था बल्कि उसका नाम और भी रौशन कर रहा था।

उस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठे हुए आलू भून रहे थे जो किसी के खेत से खोद लाए थे। घीसू की बीवी का तो मुद्दत हुई इंतिक़ाल हो गया था। माधव की शादी पिछले साल हुई थी। जब से ये औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में तमद्दुन की बुनियाद डाली थी। पिसाई कर के, घास छील कर वो सेर भर आटे का इंतिज़ाम कर लेती थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वो आई, ये दोनों और भी आराम-तलब और आलसी हो गए थे बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई काम करने को बुलाता तो बे-नियाज़ी की शान में दोगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज सुब्ह से दर्द-ए-ज़ेह में मर रही थी और ये दोनों शायद इसी इंतिज़ार में थे कि वो मर जाए तो आराम से सोएँ।

घीसू ने आलू निकाल कर छीलते हुए कहा, “जा देख तो क्या हालत है, उसकी चुड़ैल का फसाद होगा और क्या। यहाँ तो ओझा भी एक रुपये माँगता है। किस के घर से आए।”

माधव को अंदेशा था कि वो कोठरी में गया तो घीसू आलुओं का बड़ा हिस्सा साफ़ कर देगा। बोला,
“मुझे वहाँ डर लगता है।”

“डर किस बात का है? मैं तो यहाँ हूँ ही।”
“तो तुम्हीं जा कर देखो न।”

“मेरी औरत जब मरी थी तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला भी नहीं और फिर मुझ से लजाएगी कि नहीं, कभी उसका मुँह नहीं देखा, आज उसका उधड़ा हुआ बदन देखूँ। उसे तन की सुध भी तो न होगी। मुझे देख लेगी तो खुल कर हाथ पाँव भी न पटक सकेगी।”
“मैं सोचता हूँ कि कोई बाल बच्चा हो गया तो क्या होगा। सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में।”

“सब कुछ आ जाएगा। भगवान बच्चा दें तो, जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वही तब बुला कर देंगे। मेरे तो लड़के हुए, घर में कुछ भी न था, मगर इस तरह हर बार काम चल गया।”
जिस समाज में रात दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुक़ाबले में वो लोग जो किसानों की कमज़ोरियों से फ़ायदा उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा फ़ारिग़-उल-बाल थे, वहाँ इस क़िस्म की ज़हनियत का पैदा हो जाना कोई तअ'ज्जुब की बात नहीं थी।

हम तो कहेंगे घीसू किसानों के मुक़ाबले में ज़्यादा बारीक-बीन था और किसानों की तही-दिमाग़ जमईयत में शामिल होने के बदले शातिरों की फ़ित्ना-परदाज़ जमा'अत में शामिल हो गया था। हाँ उसमें ये सलाहियत न थी कि शातिरों के आईन-ओ-आदाब की पाबंदी भी करता। इसलिए ये जहाँ उसकी जमा'अत के और लोग गाँव के सर्ग़ना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव अंगुश्त-नुमाई कर रहा था। फिर भी उसे ये तस्कीन तो थी ही कि अगर वो ख़स्ताहाल है तो कम से कम उसे किसानों की सी जिगर तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी सादगी और बे-ज़बानी से दूसरे बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते।

दोनों आलू निकाल-निकाल कर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ भी नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि उन्हें ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बैरूनी हिस्सा तो ज़्यादा गर्म न मालूम होता था लेकिन दाँतों के तले पड़ते ही अंदर का हिस्सा ज़बान और हल्क़ और तालू को जला देता था और इस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वो अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते थे हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई जिसमें बीस साल पहले वो गया था। उस दावत में उसे जो सेरी नसीब हुई थी, वो उसकी ज़िंदगी में एक यादगार वाक़िआ थी और आज भी उसकी याद ताज़ा थी। वो बोला, “वो भोज नहीं भूलता। तब से फिर इस तरह का खाना और भर पेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सब को पूड़ियाँ खिलाई थीं, सब को। छोटे बड़े सब ने पूड़ियाँ खाईं और असली घी की। चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई अब क्या बताऊँ कि उस भोज में कितना स्वाद मिला।

कोई रोक नहीं थी। जो चीज़ चाहो माँगो और जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया कि किसी से पानी न पिया गया, मगर परोसने वाले हैं कि सामने गर्म गोल गोल महकती हुई कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं, नहीं चाहिए मगर वो हैं कि दिए जाते हैं और जब सब ने मुँह धो लिया तो एक-एक बीड़ा पान भी मिला मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी। खड़ा न हुआ जाता था। झटपट जा कर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दरिया दिल था वो ठाकुर।”

माधव ने उन तकल्लुफ़ात का मज़ा लेते हुए कहा, “अब हमें कोई ऐसा भोज खिलाता।”
“अब कोई क्या खिलाएगा? वो जमाना दूसरा था। अब तो सब को किफायत सूझती है। सादी ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँ रक्खोगे। मगर बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ खर्च में किफायत सूझती है।”

“तुमने एक बीस पूड़ियाँ खाई होंगी।”
“बीस से ज्यादा खाई थीं।”

“मैं पचास खा जाता।”
“पचास से कम मैंने भी न खाई होंगी, अच्छा पट्ठा था। तू उसका आधा भी नहीं है।” आलू खा कर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़ कर पाँव पेट में डाल कर सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अज़दहे कुंडलियाँ मारे पड़े हों और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

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