३४० ईसा पूर्व के एक छोटे-से गाँव में एक माँ की गोद में जन्म लेने वाले बालक चंद्र को कौन जानता था कि वही एक दिन हिन्दुस्तान का पहला महान सम्राट बनने वाले हैं — और उनके बाल्यकाल की हर कठिनाई एक भावी साम्राज्य की नींव बन रही है.
चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग ३४० ईसा पूर्व में हुआ — ठीक वर्ष का इतिहासकारों में मतभेद है. कुछ ३४५ ईसा पूर्व कहते हैं, कुछ ३४० ईसा पूर्व, कुछ ३३० ईसा पूर्व. परंतु लगभग एक मत है — यह वही समय था जब उत्तर भारत में मगध साम्राज्य अपने अंतिम नंद-वंश के अधीन था, और उत्तर-पश्चिम में फ़ारस का शक्तिशाली अकेमिनिड साम्राज्य अपने अंतिम दिनों में था. यूनान में सिकंदर अभी जन्मा भी नहीं था. चीन में चु, छिन, चु, और अन्य राज्यों के बीच संग्राम चल रहा था. विश्व एक बड़ी संक्रांति में था. और इसी संक्रांति के बीच, भारत के एक छोटे-से गाँव में एक बालक का जन्म हुआ — जो एक दिन इस संक्रांति का एक प्रमुख सूत्रधार बनने वाला था.
चंद्रगुप्त के कुल का नाम था "मौर्य" — और इस नाम के नामोत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं. एक मत के अनुसार उनकी माता का नाम "मुरा" था, और इसी से "मुरा-पुत्र" अर्थात् "मौर्य" बना. यह मत मुख्यतः ब्राह्मण पुराण-स्रोतों में मिलता है — विशेषकर विष्णु पुराण में. परंतु आधुनिक विद्वानों में इस मत पर संदेह है, क्योंकि "मौर्य" शब्द संस्कृत व्याकरण के अनुसार "मुरा" का पुल्लिंग रूप नहीं बनाता.
दूसरा और अधिक स्वीकृत मत यह है कि चंद्रगुप्त "मोरिय" गण के थे — एक प्राचीन क्षत्रिय जाति, जो "पिप्पलिवन" नामक क्षेत्र में रहती थी. यह क्षेत्र संभवतः आज के पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर स्थित था. बौद्ध परंपरा — विशेषकर महावंश और दीपवंश — इस मत का समर्थन करती है. इन ग्रंथों के अनुसार, "मोरिय" शब्द मोर पक्षी से सम्बंधित है, क्योंकि इस गण के प्रदेश में मोरों की बहुलता थी. कुछ अन्य व्याख्याएँ भी हैं, परंतु यह सबसे प्रचलित है.
तीसरा मत — कुछ जैन स्रोतों के अनुसार — चंद्रगुप्त एक मयूरपोषक (मोर-पालक) परिवार से थे. यह परिवार राज्य के लिए मोर पालता था, क्योंकि मोर पालन एक राजसी कार्य था. परंतु यह मत भी विवादास्पद है, क्योंकि यह उन्हें एक "नीच" वंश से जोड़ने का प्रयास है — जो शायद ब्राह्मणवादी विरोध का एक रूप था.
जो भी हो, एक बात निश्चित है — चंद्रगुप्त का कुल विशाल राजसी नहीं था. वे महान साम्राज्य के राजकुमार नहीं थे. उनके पूर्वज भले ही एक छोटे-से गण के प्रमुख रहे हों, परंतु जिस समय चंद्रगुप्त का जन्म हुआ, उनका परिवार साधारण रूप में जी रहा था. उनके पिता एक प्रकार के स्थानीय प्रमुख थे, परंतु महान शासक नहीं थे. इस अर्थ में, चंद्रगुप्त एक "साधारण" परिवार से थे — और उनकी बाद की उपलब्धि और भी अद्भुत प्रतीत होती है.
चंद्रगुप्त के पिता के विषय में स्रोत बहुत स्पष्ट नहीं हैं. कुछ स्रोतों के अनुसार उनका नाम "सर्वार्थसिद्धि" था, परंतु यह नाम अधिक मत्स्य पुराण में आता है — और इतिहासकारों के बीच इसकी प्रामाणिकता पर संशय है. परंतु एक बात स्पष्ट है — पिता की भूमिका चंद्रगुप्त के जीवन में बहुत संक्षिप्त रही. कुछ स्रोतों के अनुसार पिता एक स्थानीय युद्ध में मारे गए थे, जब चंद्रगुप्त मात्र पाँच-सात वर्ष के थे.
माँ ने अपने पुत्र को कैसे पाला — इसकी कोई औपचारिक कथा नहीं मिलती. परंतु कुछ लोक-कथाओं और बाद के नाटकों — विशेषकर मुद्राराक्षस — में संकेत मिलते हैं. माता मुरा (या जो भी उनका नाम हो) ने अपने पुत्र को साधारण ग्रामीण जीवन में पाला. वे एक धार्मिक स्त्री थीं, और उन्होंने अपने पुत्र में बचपन से ही स्वाभिमान, धैर्य, और कर्तव्य-निष्ठा के संस्कार डाले. एक प्रसिद्ध कथा है — चंद्रगुप्त जब बहुत छोटे थे, तब वे माँ के पास बैठकर रामायण की कथा सुनते. विशेष रूप से उन्हें राम के "एक-वचनी, एक-पत्नीव्रती, एक-बाणी" का पाठ बहुत प्रिय था. वे अपनी माँ से पूछते — "अम्मा, क्या मैं भी ऐसा बन सकता हूँ?" माँ हमेशा उत्तर देतीं — "बेटा, यदि तू सच्चे मन से चाहे, तो तू उससे भी बड़ा बन सकता है."
बाल्यकाल का सबसे प्रसिद्ध दृश्य — जो लगभग हर भारतीय बच्चे ने सुना है — वह है "राजा-राजा" का खेल. यह खेल चंद्रगुप्त अपने गाँव के साथियों के साथ खेलते थे. एक बच्चा "राजा" बनता, अन्य "मंत्री," "सूबेदार," "प्रजा" — कुछ "अपराधी" भी. राजा सिंहासन पर बैठकर मामलों की सुनवाई करता. न्याय करता. दंड या पुरस्कार देता. सब बच्चे इस खेल का आनंद लेते. परंतु जब चंद्रगुप्त "राजा" बनते, तब एक अद्भुत बात होती — उनका न्याय इतना सटीक होता, इतना न्यायप्रिय होता, इतना विवेकशील होता, कि बड़े लोग भी यह देखकर चकित रह जाते. कोई "अपराधी" को बिना सुने दंड नहीं दिया जाता. हर मामले में दोनों पक्षों की बातें सुनी जातीं. हर निर्णय में किसी-न-किसी प्राचीन सूत्र — जो बच्चे अपनी माओं से सीखते थे — का हवाला दिया जाता.
एक बार ऐसा हुआ कि उस गाँव से आचार्य चाणक्य गुज़र रहे थे. वे पाटलिपुत्र से लौट रहे थे — एक भयंकर अपमान सहकर. नंद-राजा धनानंद ने उन्हें अपने दरबार में अपमानित किया था. उनकी शिखा पकड़कर खींची थी. चाणक्य ने उसी क्षण प्रतिज्ञा ली थी — "जब तक मैं नंद-वंश का अंत नहीं करूँगा, तब तक यह शिखा बंधी ही नहीं जाएगी." खुले बाल लिए, क्रोध से तड़पते हुए, वे उत्तर भारत की ओर लौट रहे थे.
मार्ग में वे इस छोटे-से गाँव से गुज़रे. एक स्थान पर उन्होंने बच्चों को खेलते देखा. कुछ क्षण रुक गए. एक बच्चा "राजा" था. अन्य बच्चे उसके दरबार में थे. एक "अपराधी" को न्याय का प्रतीक्षा करवाई जा रही थी. चाणक्य ने ध्यान से देखा. उस "राजा" बच्चे की बात-व्यवहार में एक अद्भुत प्रौढ़ता थी. उनकी बातें सीधी थीं, परंतु तर्कपूर्ण. उनके निर्णय कठोर थे, परंतु निष्पक्ष. वे उन्हें "मूर्ख" नहीं समझे — परंतु एक भावी सम्राट के रूप में देखा.
आगामी अध्याय में हम देखेंगे — कैसे यह संक्षिप्त मुलाक़ात चंद्रगुप्त के जीवन को हमेशा के लिए बदल देती है, और कैसे एक गुरु-शिष्य की वह अनोखी जोड़ी बनती है जो भारतीय इतिहास में सबसे प्रसिद्ध जोड़ियों में गिनी जाती है — चाणक्य और चंद्रगुप्त. परंतु पहले, हमें थोड़ा और समझना होगा — पिता के देहांत के बाद उस माँ का संघर्ष क्या रहा, और कैसे एक माँ ने अपने पुत्र को इस अद्भुत यात्रा के लिए तैयार किया.
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