३४० ईसा पूर्व के एक धूल-भरे गाँव से लेकर श्रवणबेलगोला की पवित्र पहाड़ी तक — यह कथा है उस व्यक्ति की, जिन्होंने पहली बार हिन्दुस्तान को एक एकीकृत साम्राज्य का रूप दिया, और जिन्होंने दिखाया कि एक साधारण बालक भी सम्राट बन सकता है — यदि उसके साथ हो एक सच्चा गुरु.
भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके बिना भारतीय सभ्यता की कथा अधूरी रह जाती है. राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, अशोक, अकबर, शिवाजी — और इसी पंक्ति में एक नाम है — चंद्रगुप्त मौर्य. यह वह व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत को पहली बार एक "महान साम्राज्य" का अनुभव दिलाया. उनसे पहले भारत अनेक छोटी-बड़ी रियासतों, राज्यों, और गणों में विभाजित था. कुछ शक्तिशाली थे — मगध, कोसल, अवंति, गांधार — परंतु कोई भी एक केंद्रीय सत्ता नहीं थी जो सम्पूर्ण उत्तर भारत को एक करे. चंद्रगुप्त मौर्य ने यह कार्य किया. और उन्होंने न केवल किया — उन्होंने इसे इतनी मज़बूती से किया कि उनका वंश आगे चलकर सम्राट अशोक तक चला, जो आज भी विश्व-इतिहास में एक महानतम राजा माने जाते हैं.
परंतु चंद्रगुप्त की कथा केवल विजय की कथा नहीं है. यह एक ऐसी कथा है जिसमें बचपन की वंचना है, गुरु की दूरदृष्टि है, तपस्या-समान शिक्षा है, असफलताओं का दुःख है, और अंत में एक अद्भुत त्याग है. वे केवल एक "सम्राट" नहीं थे — वे एक "मानव" थे, जो जीवन के हर पहलू से गुज़रे — और प्रत्येक पहलू ने उन्हें कुछ सिखाया.
उनका जन्म लगभग ३४० ईसा पूर्व में हुआ — अर्थात् आज से लगभग २,३६५ वर्ष पहले. उनका कुल था "मौर्य" — जिसके नामोत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं. कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनकी माता का नाम "मुरा" था, और इसी से "मौर्य" बना. कुछ अन्य मतों के अनुसार वे "मोरिय" नामक एक प्राचीन क्षत्रिय गण के थे, जो पिप्पलिवन क्षेत्र में रहता था. जो भी हो — उनका कुल राजसी नहीं था. वे साधारण लोग थे — परंतु एक विशेष आत्म-गौरव और एक छिपी हुई शक्ति लिए हुए.
उनका बचपन कठिन था. पिता का देहांत बाल्यावस्था में ही हो गया. माँ ने अपनी संतान को कठिनाइयों के बीच पाला. कहा जाता है कि एक बार बालक चंद्र अपने साथियों के साथ "राजा-राजा" का खेल खेल रहे थे, और अपनी अद्भुत बुद्धि से न्याय कर रहे थे. इसी समय आचार्य चाणक्य — जिन्हें इतिहास "कौटिल्य" के नाम से भी जानता है — मार्ग से गुज़र रहे थे. वे पाटलिपुत्र से अपमानित होकर लौट रहे थे — मगध के नंद-राजा धनानंद ने उनका तिरस्कार किया था. परंतु इस बालक को देखकर उनके मन में एक विचार उठा. यह बच्चा साधारण नहीं है. इसमें वह तेज है जो किसी भावी सम्राट में होता है.
चाणक्य की दृष्टि वही दृष्टि थी जो किसी मूर्तिकार की होती है — जो शिला में मूर्ति देख लेता है. उन्होंने तुरंत निर्णय लिया — इसी बालक को मैं अपना शिष्य बनाऊँगा. इसी से नंद-वंश का अंत होगा. इसी से एक नए साम्राज्य का जन्म होगा. इसी से भारत का भविष्य बनेगा. यह एक प्रतिज्ञा थी — एक अत्यंत साहसिक प्रतिज्ञा. एक साधारण बालक को सम्राट बनाने की प्रतिज्ञा.
तक्षशिला के विश्व-विख्यात विश्वविद्यालय में चंद्रगुप्त की शिक्षा आरम्भ हुई. यहाँ उन्होंने राजनीति, अर्थशास्त्र, सैन्य-विज्ञान, धर्म-शास्त्र, चिकित्सा, ज्योतिष — हर शास्त्र का अध्ययन किया. लगभग आठ वर्षों की कठोर साधना के बाद वे एक ऐसे युवक बन चुके थे जो अपने युग का सर्वश्रेष्ठ राजसी पात्र था.
इसी दौरान भारत में एक ऐतिहासिक घटना घटी — सिकंदर महान का आगमन. ३२६ ईसा पूर्व में सिकंदर ने सिंधु नदी पार की. भारत के कुछ राजाओं ने उसका विरोध किया, कुछ ने आत्मसमर्पण किया. पुरुषोत्तम — जिन्हें यूनानी "Porus" कहते थे — उन्होंने झेलम के तट पर सिकंदर से युद्ध किया, परंतु पराजित हुए. कहा जाता है कि इस यात्रा में सिकंदर से युवा चंद्रगुप्त की भेंट भी हुई थी. यूनानी इतिहासकार Plutarch ने इस घटना का उल्लेख किया है — एक "Sandrokottos" नामक नवयुवक ने सिकंदर से कहा था कि भारत-विजय आसान है, क्योंकि नंद-राजा अपनी ही प्रजा से घृणित है.
सिकंदर की वापसी के बाद भारत में एक राजसी रिक्तता उत्पन्न हुई. इसी अवसर का लाभ उठाकर चंद्रगुप्त ने अपनी सेना का गठन आरम्भ किया. पंजाब के गाँवों से, हिमालय की तराई के पर्वतीय गणों से, अनेक छोटे-बड़े राजाओं से — उन्होंने सहयोग एकत्र किया. प्रारम्भिक प्रयासों में असफलता भी मिली. एक प्रसिद्ध कथा है — एक बार वे एक माँ के घर आए, जो अपने बच्चे को गरम खिचड़ी खिला रही थी. बच्चा बीच से खिचड़ी उठाकर खा रहा था और हाथ जला रहा था. माँ ने कहा — "मूर्ख! किनारे से खाओ. बीच से तो हाथ जलेगा." यह सुनकर चंद्रगुप्त को अपनी रणनीति-त्रुटि का अहसास हुआ. उन्होंने अब तक केंद्र — पाटलिपुत्र — पर सीधा आक्रमण किया था. परंतु अब उन्होंने सीमांत से शुरू किया, और एक-एक करके राज्य जीते. यह माँ की सीख आज भी रणनीति-शास्त्र में उद्धरित होती है.
अंत में, ३२१ ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र पर विजय हुई. नंद-वंश समाप्त हुआ. मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई. चंद्रगुप्त सम्राट बने. राजधानी पाटलिपुत्र — जो आज का पटना है. इसके बाद उन्होंने साम्राज्य का अद्भुत विस्तार किया — हिंदुकुश से बंगाल तक, हिमालय से कर्नाटक तक. ३०५ ईसा पूर्व में सेल्यूकस निकेटर से युद्ध हुआ — और एक संधि के साथ चंद्रगुप्त को आज के अफ़ग़ानिस्तान, बलूचिस्तान, और हिंदुकुश क्षेत्र की भूमि मिली. एक राजसी विवाह भी हुआ — सेल्यूकस की पुत्री से.
परंतु जो बात चंद्रगुप्त को सबसे अनूठा बनाती है, वह है उनका अंतिम निर्णय. लगभग २४-२५ वर्षों के शासन के बाद, अर्थात् २९७ ईसा पूर्व के आसपास, उन्होंने राज-काज छोड़ दिया. अपने पुत्र बिंदुसार को सिंहासन सौंपा. और स्वयं — अपने गुरु आचार्य भद्रबाहु के साथ — दक्षिण भारत की ओर निकले. कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर पहुँचकर वे एक दिगंबर मुनि के रूप में दीक्षित हुए. वहीं — एक छोटी-सी पहाड़ी पर — उन्होंने जैन परंपरा के अनुसार सल्लेखना ली. एक सम्राट का अंत — जिसने एक साम्राज्य खड़ा किया था, और जो अंत में अपनी देह को भी छोड़कर मोक्ष की ओर बढ़ा.
आगामी तीस अध्यायों में हम इसी अद्भुत यात्रा को देखेंगे. एक मौर्य कुल के बालक से लेकर हिन्दुस्तान के प्रथम सम्राट तक. और सम्राट से लेकर एक दिगंबर मुनि तक. यह कथा है एक व्यक्ति की — परंतु यह कथा है उस भारत की भी, जो अपने प्रथम महान साम्राज्य का जन्म देख रहा था. यह कथा है एक गुरु-शिष्य परम्परा की — जो भारतीय सभ्यता का मूल आधार है. और सबसे बड़ी बात — यह कथा है उस सत्य की, जो चाणक्य ने कहा था — "एक राजा वह होता है, जो अपनी प्रजा के लिए सब-कुछ त्याग सके."
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें