एक छोटी-सी विधवा, एक छोटा-सा बालक, और एक अनिश्चित भविष्य — यही था चंद्रगुप्त का बचपन; परंतु इसी कठिनाई की मिट्टी में वह वृक्ष पनप रहा था जो आगे चलकर हिन्दुस्तान को अपनी छाया में लेने वाला था.
चंद्रगुप्त के पिता का देहांत कब हुआ — इसका कोई निश्चित विवरण नहीं मिलता. परंतु अधिकांश विद्वानों का अनुमान है कि यह उनकी पाँच-सात वर्ष की आयु में हुआ. कारण? लगभग सभी ऐतिहासिक कथाएँ चंद्रगुप्त के बाल्यकाल का वर्णन एक अकेली माँ के साथ करती हैं. यह अनुपस्थिति इतनी प्रमुख है कि इसे संयोग नहीं कहा जा सकता.
पिता की मृत्यु के विषय में दो मुख्य परंपराएँ हैं. पहली — वे एक स्थानीय युद्ध में मारे गए. उस समय उत्तर भारत में नंद-वंश का राज था, और नंद-राजा अपने अधीनस्थ छोटे-छोटे गणों और कुलों पर निरंतर दबाव डालते थे — कर-वसूली के लिए, सैनिकों की भर्ती के लिए, या कभी-कभी केवल अहंकार के लिए. इसी प्रकार के किसी संघर्ष में चंद्रगुप्त के पिता मारे गए हो सकते हैं. दूसरी परंपरा — कुछ जैन स्रोतों के अनुसार, उनकी मृत्यु एक बीमारी से हुई. परंतु यह कम प्रचलित मत है.
जो भी हो, मुख्य तथ्य यह है कि एक बहुत छोटी आयु में चंद्रगुप्त ने अपने पिता को खो दिया. यह एक भावनात्मक आघात तो था ही — परंतु इससे भी बड़ा था आर्थिक संकट. पिता के देहांत के साथ ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत भी समाप्त हो गया. एक छोटी-सी विधवा अपने बालक को कैसे पालेगी? यह एक कठिन प्रश्न था.
परंतु माँ — जिनका नाम परंपरा के अनुसार "मुरा" था — टूटी नहीं. वे एक धैर्यवान, संयमी, और स्वाभिमानी स्त्री थीं. उन्होंने रिश्तेदारों के सामने हाथ नहीं फैलाया. कुछ-कुछ सहायता उन्होंने ली — विशेष रूप से अपने भाई से, जो चंद्रगुप्त के मामा थे — परंतु यह सहायता न्यूनतम थी. उन्होंने स्वयं श्रम किया. कताई-बुनाई की. पशु-पालन में भाग लिया. और अपने पुत्र को कभी यह नहीं समझने दिया कि वे "अनाथ" हैं.
एक प्रसिद्ध कथा है — एक बार चंद्रगुप्त गाँव के अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे, और एक बच्चे ने ताना मारा — "तू तो अनाथ है. तेरे पास पिता नहीं." छोटे चंद्रगुप्त रोते हुए घर आए. माँ ने उन्हें अपनी गोद में लिया. कुछ क्षण कोई कुछ नहीं बोला. फिर माँ ने धीरे से कहा, "बेटा, तू अनाथ नहीं है. तेरी माँ है. और एक माँ कभी-कभी पिता से अधिक मज़बूत हो सकती है. तू कभी मत भूलना — हम साधारण लोग नहीं हैं. हम मौर्य हैं. हम मोर हैं — जो वर्षा में भी अपने पंख फैलाकर नाच सकते हैं." बालक चंद्रगुप्त ने माँ के मुख की ओर देखा. उनकी आँखों में आँसू थे, परंतु एक स्थिर मुस्कान भी. माँ की उस बात ने जीवन-भर उनके भीतर एक विशेष आत्म-गौरव भरा.
उन कठिन वर्षों में चंद्रगुप्त ने बहुत कुछ सीखा. उन्होंने सीखा कि श्रम क्या होता है — माँ के साथ खेतों में जाते समय, माँ के साथ चक्की चलाते समय, माँ के साथ पशुओं को चराते समय. उन्होंने सीखा कि स्वाभिमान क्या होता है — रिश्तेदारों के सामने कैसे माँ अपना सिर ऊँचा रखती हैं, कैसे वे किसी के प्रति आभार तो प्रकट करती हैं, परंतु निर्भरता नहीं दिखातीं. उन्होंने सीखा कि कठिनाई का सामना कैसे किया जाता है — कैसे रोटी कम होने पर भी माँ बच्चे को पूरा खिलाकर स्वयं भूखी रह जाती हैं.
शिक्षा भी कोई बड़ी नहीं थी. गाँव में एक छोटा-सा "उपगुरुकुल" था, जहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण कुछ बच्चों को अक्षर-ज्ञान और संस्कृत के सरल श्लोक पढ़ाते थे. चंद्रगुप्त वहाँ नियमित जाते थे. वे एक तीव्र बुद्धि के बालक थे — जो भी पढ़ाया जाता, वे तुरंत समझ लेते. वे श्लोकों को कंठस्थ कर लेते. विशेष रूप से उन्हें भगवद्गीता के कुछ श्लोक — "कर्मण्येवाधिकारस्ते," "योगस्थः कुरु कर्माणि" — बहुत प्रिय थे. ये श्लोक उनके भीतर एक विशेष कर्म-निष्ठा भर रहे थे. वृद्ध ब्राह्मण-गुरु एक बार माँ से बोले — "मुराजी, यह बच्चा साधारण नहीं है. इसकी बुद्धि असामान्य है. यदि इसको उच्च शिक्षा मिले, तो यह बहुत आगे जाएगा."
परंतु उच्च शिक्षा के लिए धन कहाँ था? तक्षशिला, उज्जयिनी, मगध — ये सब विश्वविद्यालय बहुत दूर थे, और महंगे थे. एक साधारण विधवा अपने पुत्र को वहाँ कैसे भेजे? यह प्रश्न माँ के मन में बार-बार उठता. वे रात्रि में दीप के प्रकाश में अपने पुत्र को सोते हुए देखतीं, और मन-ही-मन प्रार्थना करतीं — "हे महादेव, मेरे बच्चे को वह मार्ग दिखाओ जो उसके लिए सर्वोत्तम हो. मैं केवल एक माँ हूँ — मेरी सीमाएँ हैं. परंतु आप तो असीम हैं — आप मेरे बच्चे को वहाँ ले जाओ, जहाँ इसका भविष्य है."
शायद इसी प्रार्थना का फल था — कि एक दिन आचार्य चाणक्य उस गाँव से गुज़रे. परंतु इस मुलाक़ात की कथा एक अलग ही कथा है, जिसे अगले अध्याय में विस्तार से देखेंगे.
इन कठिन वर्षों में चंद्रगुप्त के बाल्यकाल का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू था — साथियों का साथ. यद्यपि वे "अनाथ" थे, यद्यपि उनका परिवार "साधारण" था, परंतु उनके कुछ अद्भुत मित्र भी थे. इन मित्रों में सबसे विशेष थे एक बालक — जिनका नाम परंपरा के अनुसार "वैरोचक" या "वरुण" था. ये एक स्थानीय व्यापारी के पुत्र थे, और चंद्रगुप्त के बहुत निकट मित्र. आगे चलकर, जब चंद्रगुप्त सम्राट बने, तब ये उनके सेनापति बने — पुराने मित्र, अब राज्य की रक्षा के साथी.
एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता — चंद्रगुप्त ने बाल्यकाल में ही पशुओं — विशेषकर घोड़ों और हाथियों — से अद्भुत प्रेम विकसित किया. एक बार उनके मामा का एक घोड़ा बीमार हो गया. सब वैद्य आए, परंतु कोई समाधान नहीं निकाल पाए. छोटे चंद्रगुप्त ने उस घोड़े के निकट कई दिन तक बिताए — उसे सहलाते हुए, उसे चारा देते हुए, उसकी देख-भाल करते हुए. कुछ ही दिनों में घोड़ा ठीक हो गया. यह "घोड़े के साथ संबंध" आगे चलकर उनके युद्ध-कौशल का एक आधार बना. वे घोड़े पर बैठकर युद्ध लड़ने में निपुण थे — जो उस ज़माने के राजसी कौशल का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था.
तो यह था चंद्रगुप्त का बाल्यकाल — पिता रहित, परंतु माँ-समृद्ध; धन-रहित, परंतु संस्कार-समृद्ध; राजसी पहचान-रहित, परंतु आत्म-गौरव-समृद्ध. इसी मिट्टी में पनप रहा था वह बीज, जो आगामी वर्षों में एक विशाल वृक्ष बनेगा. और इस वृक्ष को सींचने वाले माली थे आचार्य चाणक्य — जिनकी छाँव में चंद्रगुप्त ने अपनी असली शिक्षा पाई. आगामी अध्याय में हम देखेंगे — कैसे एक "राजा-राजा" के खेल ने इतिहास का सबसे प्रसिद्ध गुरु-शिष्य संबंध स्थापित किया.
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