छत्रपति शिवाजी महाराज — हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक
शिवनेरी की एक चट्टान पर एक माँ ने अपने बच्चे को गोद में लिया — और सपना देखा एक ऐसे राज्य का, जहाँ अपनी मिट्टी के लोगों का अपना राज हो। यह बच्चा था शिवाजी। उसकी माँ थीं जिजाबाई। तीन सौ साल की ग़ुलामी के बीच एक सोलह साल के लड़के ने तोरणा क़िले पर पहला झंडा फहराया — और हिन्दवी स्वराज्य की नींव रखी। प्रतापगढ़ में अफ़ज़ल खान, पवन खिंड में बाजी प्रभु का अमर बलिदान, लाल महल में शाइस्ता खान की कटी उँगलियाँ, सूरत की लूट, आगरा से मिठाई की टोकरियों में चमत्कारी पलायन, सिंहगढ़ पर तानाजी मालुसरे का बलिदान — एक के बाद एक ऐसी कहानियाँ जो आज भी दिल में आग जगाती हैं। 6 जून 1674 को रायगढ़ पर जब शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ — तो भारत की धरती पर एक नया छत्रपति बैठा। यह कथा है उन पचास वर्षों की — जो साधारण से असाधारण की यात्रा है। जिजाबाई की लोरी से लेकर रायगढ़ की समाधि तक। तीस अध्यायों में, सरल हिंदी में, मूल इतिहास की पूरी मर्यादा के साथ।
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