दक्कन की चट्टानी पहाड़ियों के बीच, पुणे से उत्तर की ओर लगभग नब्बे कोस दूर, एक ऊँचा क़िला सर उठाए खड़ा था — शिवनेरी। साल था 1630 ईस्वी का, माह फाल्गुन। उत्तर से मुग़ल आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण में निज़ामशाही दरबार बिखर रहा था, और इसी अंधकार के बीच एक माँ अपने पेट में पल रहे जीव के लिए दुआ माँग रही थी।
"माते, एक दीप दे। बस एक — इस तीन सौ साल की रात में।"
शिवनेरी कोई साधारण क़िला नहीं था। उसकी चट्टानें खड़ी थीं, ऊपर एक छोटा सा पठार, और उस पठार के एक कोने पर एक प्राचीन मंदिर — शिवाई देवी का। आसपास के गाँव वाले बड़ी श्रद्धा से उन्हें पूजते थे। कहते थे — यह देवी पहाड़ की रक्षक है, और जो उसकी शरण में आए, उसकी संतान निडर पैदा होती है।
जिजाबाई जब गर्भ से थीं, तब शाहजी भोसले कर्नाटक के अभियान पर थे। शाहजी निज़ामशाही के एक प्रमुख सेनापति थे — और वही दिन थे जब निज़ामशाही ख़त्म होने को थी, मुग़ल और आदिलशाह दोनों की नज़र दक्कन पर थी। शाहजी ख़ुद यादव वंश की उस राजकुमारी से ब्याहे थे जिसके पिता लखुजी जाधवराव कभी निज़ामशाही दरबार के सबसे बड़े सरदारों में से थे — सिंदखेड राजा के स्वामी।
लखुजी और शाहजी के बीच राजनीतिक तनाव कई बार आया था। पर इन दोनों ख़ानदानी रिश्तों के बीच जिजाबाई का दिल बस एक चीज़ माँगता था — एक सुरक्षित स्थान, जहाँ उनका बच्चा शांति से जन्म ले सके।
शाहजी ने कहा था — "शिवनेरी जाओ। चारों ओर पहाड़ हैं। ऊपर देवी हैं। बच्चा वहीं जन्मे।"
जिजाबाई ने सर हिला दिया था। पर उनके मन में एक और बात थी — एक ऐसी बात जो उन्होंने अपने पति को भी पूरी तरह नहीं कही थी।
शिवनेरी के पठार पर, शिवाई देवी के मंदिर के सामने, जिजाबाई हर रोज़ बैठतीं। दीपक जलता, कपूर जलता, और एक माँ अपनी देवी से कुछ माँगती।
"माँ, बेटा दे। पर साधारण नहीं। ऐसा बेटा जो इस ज़मीन को जगाए। जो हम जैसे लोगों को सर उठाने का साहस दे। तीन सौ साल हो गए — हम अपनी ही धरती पर पराए हैं। हर मंदिर पर पहरा है, हर त्यौहार पर इजाज़त चाहिए, हर गाँव में किसी की हुकूमत है। माँ, अब बस। एक दीप दे — जो यह अंधकार चीर दे।"
देवी सुनती थीं या नहीं — कौन जाने। पर जिजाबाई को रात के सपनों में एक तेज़ रोशनी दिखती थी। एक छोटा सा बालक — हाथ में तलवार, सर पर मुकुट, और चेहरे पर माँ की ही आँखें।
शिवनेरी की उस सर्दी में जब हवा सख़्त चलती थी और रात को छत्रीयों के नीचे आग जलती थी, जिजाबाई धीरे-धीरे अपने बच्चे की प्रतीक्षा कर रही थीं। उनके पास कुछ दासियाँ थीं, एक अनुभवी दाई थी, और शाहजी द्वारा भेजे हुए कुछ विश्वासपात्र सेनापति। बाहरी दुनिया से क़िला कटा हुआ था — बस यही उनके लिए सही था।
एक रात आख़िरकार आई। फाल्गुन वद्य तृतीया, शुक्रवार, शके 1551 — हमारे आज के पंचांग के अनुसार 19 फ़रवरी 1630।
बाहर सर्दी अपने चरम पर थी। पहाड़ की रात में जब हवा क़िले की दीवारों पर सीटी बजाती है, तब वह आवाज़ ऐसी लगती है मानो कोई पुरातन देवता बात कर रहा हो। अंदर के एक कमरे में जलते दीपकों के बीच जिजाबाई की आँखें बंद थीं। होंठों पर एक मंत्र — "जय भवानी।"
दाई बोली — "महारानी जी, साँस लीजिए। साँस लीजिए।"
थोड़ी देर बाद — एक छोटी सी आवाज़ — एक नवजात की पहली रुलाई।
दाई ने बच्चे को साफ़ कपड़े में लपेटकर माँ की गोद में रखा। "माता जी — पुत्र हुआ है। स्वस्थ। पूर्ण।"
जिजाबाई ने आँखें खोलीं। बच्चे को देखा। एक छोटा सा चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, और उन आँखों में एक अजीब सी शांति। बच्चा रोया था पर अब चुप था — माँ की गर्मी में।
उन्होंने बच्चे को छाती से लगाया। एक चूम्मा माथे पर रखा।
"शिवाई माँ का दिया हुआ है यह," जिजाबाई ने धीरे से कहा। "इसका नाम भी शिवाजी होगा।"
क़िले के पुजारी ने मंत्र पढ़े। मंदिर में आरती हुई। दीप जले। नौकरों ने मिठाई बाँटी। और उस रात पूरे शिवनेरी क़िले में एक उत्सव था — पर बाहर की दुनिया में किसी को कुछ ख़बर नहीं थी कि एक छोटे से बच्चे के साथ इतिहास का एक नया अध्याय खुल रहा था।
दूर — कर्नाटक के किसी छावनी में — शाहजी भोसले को संदेश पहुँचा। दूत ने हाथ जोड़कर कहा — "महाराज, शिवनेरी से ख़बर है। महारानी जी ने पुत्र को जन्म दिया है। दोनों स्वस्थ हैं।"
शाहजी की आँखों में नमी आई। उनके पहले बेटे संभाजी का जन्म पहले हो चुका था; पर हर पिता के लिए हर बेटा एक नई दुनिया होता है। उनके पास सब था — सेना, धन, पद — पर एक पिता का मन हमेशा परिवार को ढूँढ़ता है।
"नाम क्या रखा?"
"शिवाजी, महाराज। शिवनेरी की देवी शिवाई के नाम पर।"
शाहजी ने सर हिला दिया। फिर धीरे से दोहराया — "शिवाजी।" शब्द में एक भारीपन था। अच्छा नाम है, उन्होंने सोचा। शक्तिशाली नाम।
शिवनेरी पर वसंत आया, फिर ग्रीष्म, फिर वर्षा। बच्चा बढ़ता गया — किलकारियों से, माँ की लोरियों से, क़िले की बूढ़ी दासियों के क़िस्सों से।
जिजाबाई हर शाम बच्चे को गोद में लेकर शिवाई देवी के मंदिर में आतीं। दीप जलाकर बच्चे का माथा देवी के चरणों से छुआतीं। बच्चे की आँखों में मंदिर का दीप जलता हुआ दिखता।
एक दिन एक बूढ़ी दासी ने पूछा — "महारानी जी, इतनी छोटी उम्र में बच्चे को मंदिर में लाना — क्यों?"
जिजाबाई ने मुस्कुराकर कहा — "देवी का दिया है। देवी का स्मरण ज़रूरी है। और एक बात — इस बच्चे को अभी से सिखाना है कि माँ-धरती और भगवान — दोनों उसके माथे पर हैं। बच्चा बड़ा होगा तो ज़िम्मेदारी भारी होगी। उसे पहले से तैयार करना है।"
दासी ने सर हिलाया। उसे पूरी बात समझ नहीं आई। पर इतना समझ आ गया था — यह माँ साधारण नहीं हैं। और यह बच्चा भी साधारण नहीं होगा।
उन शुरुआती महीनों में जब छोटे शिवाजी सोते थे — माँ की गोद में, सिर पर माँ की हथेली — दूर से क़िले के द्वार पर पहरेदारों की चाल की आवाज़ आती। यह आवाज़ एक भविष्य की धुन थी — सेनाओं की, घोड़ों की, युद्ध-नगाड़ों की। बच्चा सोता था; पर माँ जाग रही थीं। माँ की आँखें छत के पार दूर तक देख रही थीं — एक ऐसे सपने में जिसका नाम तब किसी को नहीं पता था। बाद में उस सपने का नाम पड़ा — हिन्दवी स्वराज्य।
तीन सौ साल का अंधकार था। पर एक दीप जला था। बहुत छोटा। पहाड़ के एक कोने में। शिवनेरी की चट्टानों पर। शिवाई देवी के चरणों में।
उस दीप की रोशनी कितनी दूर तक जाएगी, यह उस वक़्त किसी ने नहीं सोचा था।
पर माँ ने सोचा था।
और माँ की प्रार्थना ख़ाली नहीं जाती।
॥ जय शिवाई माता ॥ जय भवानी ॥ श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की कथा यहीं से प्रारंभ ॥
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