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छोरी

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Funtel
21 Mar 2026

नैरेटर : भरतपुर राजस्थान के जंगली इलाके के पास बसा एक छोटा सा आदिवासी गाँव, जहां मृत्यु का घनघोर तांडव हो रहा था। गांव में पैदा होने वाले हर लड़के पर एक मनहूसियत छाई हुई थी। घर में बेटा पैदा तो होता लेकिन अगली अमावस्या होते ही मारा जाता। गाँव में कई तांत्रिक आकर गए लेकिन कोई भी मौत के इस महातांडव को रोक नहीं सका। आज भी अमावस्या की रात थी और आज रात रघु के एक महीने के बेटे का निधन हो गया।

 

मीना (रोती हुई) : म्हारा बच्चा, उन्हुहू, म्हारा बच्चा। 

 

नैरेटर : मीना का रो रोकर बुरा हाल था। लेकिन सिर्फ वही नहीं पूरे गाँव में सभी शोक में डूबे थे क्योंकि पिछले एक महीनों में होने वाली ये तीसरी मौत थी। रघु ने अपना दिल कठोर करके अपने एक महीने के बेटे को एक सफ़ेद कपडे में लपेटा और गाँव के सब आदमियों ने मिलकर शमशान घाट जाकर उसे वहां दफना दिया। 

 

मोहन (दुखी) : पहले मेरा बेटा, फिर राजू का बेटा और आज। ऐसा लगता है जैसे हर अमावस्या को कोई उनकी बलि लेकर जा रहा है। लेकिन कौन। आखिर कब तक चलता रहेगा ये सब। इतने तांत्रिकों को बुलाया लेकिन कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। 

 

नैरेटर : इससे पहले कि कोई आगे कुछ बोलता, पीछे से उन्हें किसी की आवाज़ सुनाई दी, एक तांत्रिक काले रंग के वस्त्र धारण किए, लम्बी काली दाढ़ी, और हाथ में कमंडल लिए हुए था, उसने गाँव वालों की ओर देखा। दो क्षण के लिए वो मौन हो गया और फिर अगले ही पल बोला। 

 

तांत्रिक : लौट आई है वो… ! और अब उसकी रक्त की प्यास बुझा रहे हैं तुम्हारे कुलदीपक…! अगर तुम्हे उसके श्राप से छुटकारा नहीं मिला तो एक एक करके तुम सबके घर के कुलदीपक बुझ जाएंगे। अभी भी समय है, संभाल लो सब कुछ, वरना पछतावे के सिवा तुम्हारे हाथ कुछ नहीं आएगा। इस गांव की आने वाली पुश्तें मौत का ऐसा तांडव दिखेंगी कि पूरे गांव में किसी के घर कोई शोक मनाने वाला भी न रहेगा।

 

मोहन ) : य य ये, ये आप क्या बोल रहे हैं बाबा और आपको इन सब बातों के बारे में कैसे पता चला। 

 

तांत्रिक : मैं सब जानता हूं और यह भी जानता हूं कि यह सब क्यों हो रहा है। 

अपनी तंत्र विद्या से वो सब देख सकता हूं मैं जो तुम्हारी आँखें और बुद्धि नहीं देख समझ सकती।एक सदी पहले, इस गांव में एक औरत रहती थी। कहने को वो औरत थी लेकिन सीरत से डायन थी, वो कई बार गर्भ से हुई और उसने हर बार एक बेटे को जन्म दिया लेकिन जन्म के तीन दिन के भीतर ही उसके सारे बेटे मर जाते थे तब उसने तंत्र-मंत्र की विधियां सीखी। वो जब सातवीं बार गर्भ से हुई तो उसने अपनी होने वाली संतान को दीर्घायु बनाने के लिए गांव के बाकी नवजात बच्चों की बलि देनी शुरू कर दी। वो आठ बच्चों की बलियां दे चुकी थी, उसे इक्कीस बलियां पूरी करनी थी लेकिन उससे पहले ही गांव वालों को उसका काला सच पता चल गया और उन्होंने उसकी झोपड़ी में आग लगा दी। वो उस आग में झुलस कर मर गई लेकिन गांव वालों को यह श्राप देकर गई कि एक सदी के बाद वह फिर लौटेगी और गांव के किसी भी घर का कुलदीपक जिंदा नहीं रहने देगी। वो अपना वंश आगे बढ़ाती इससे पहले ही गांव वालों के द्वारा जलाकर मारी गई इसलिए वह किसी और के घर का वंश भी आगे नहीं बढ़ने देगी। 

 

मोहन (टेंशन) : यह आप क्या कह रहे हैं बाबा। ऐसे तो पूरे गांव का विनाश हो जाएगा, जब किसी का वंश ही आगे नहीं बढ़ेगा तो धीरे-धीरे करके पूरा गांव खत्म हो जाएगा। जब आप हमें इतना सब बता सकते हैं तो इसका समाधान भी कर सकते हैं। कुछ भी करके हमें इस श्राप से मुक्ति दिलाइए। हमारे वंश को खत्म होने से रोक लीजिए। 

 

तांत्रिक (गंभीर) : हम्ममम, ये समस्या जितनी जटिल है, इसका समाधान भी उतना ही मुश्किल है। उसके मुंह से उसका शिकार छीनना है तो उसे रक्त के बदले रक्त देना होगा। बलि के बदले बलि…! उसके श्राप से तुम सबको तभी मुक्ति मिल सकती है, जब उसे हम स्वयं अपनी इच्छा से बलि चढ़ाएं वह भी पूरी इक्कीस। लेकिन किसी जानवर की नहीं बल्कि अपनी संतानों की। 

मनोहर  : क्या, हम आपसे अपनी संतानों का जीवन बचाने का समाधान पूछ रहे हैं और आप हमें इस दलदल में और गहरा धकेल रहे हो। यहां पहले ही गांव के इतने बच्चों की जान जा चुकी है और आप कह रहे हो कि हमें अपनी मर्जी से उन्हें अपनी संतानों की, इक्कीस बेटों की बलि और चढ़ानी होगी। हम अपने हाथों से उसे अपने बेटों की बलि नहीं चढ़ा सकते। ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं आप। 

 

तांत्रिक (गंभीर) : मैने ऐसा नहीं कहा मूर्ख..!  बेटों को बचाना है इसलिए उसे बलि बेटों की नहीं दी जाएगी बल्कि उसकी दी जाएगी जिसका तुम्हारे वंश से कोई लेना-देना नहीं, जो तुम्हारे वंश को आगे नहीं बढ़ाएगी। छोरे की सलामती के लिए छोरी की बलि. देनी होगी.! 

 जिस दिन गांव से इक्कीस लड़कियों की बलि पूरी हो जाएगी, गांव पर से यह श्राप खुद ब खुद हट जाएगा। इसका यही एक समाधान है। 

 

राजू (गंभीर) : क्या, अपने हाथों से अपनी बेटियों की बलि देनी होगी। नहीं।  वो तो सिर्फ उन लड़कों की ही बलि लेके गई है जो नवजात थे, म्हारा नवजात बेटा तो खत्म हो गया तो मैं किसे बचाने की खातिर अपनी बेटी की बलि दूं। म्हारे परिवार नै तो अब उससे कोई खतरा ना है। 

 

तांत्रिक (गंभीर) : नहीं, चाहे नवजात हो या उससे बड़ा वो किसी को ना छोड़ेगी। अगर बेटों को बचाना है तो किसी को तो बलि पर चढ़ाना पड़ेगा ना, फैसला तुम्हारा है। मैं इसी शमशान में साधना के लिए बैठा हूं, जब निर्णय कर लो तो आ जाना वरना ये सिलसिला कभी नहीं थमेगा। लेकिन हां जो भी निर्णय लेना है, अगली अमावस्या से पहले लेना होगा क्योंकि अगर अगली अमावस्या को उसे लड़की की बलि नहीं मिली तो वो फिर से एक छोरे को ले जाएगी।

नैरेटर : तांत्रिक बाबा ने शमशान के एक कोने में अपना आसन लगाया और अपनी साधना करने के लिए बैठ गए। उन्होंने गांव वालों को जो बोला वो उस बात को समझ नहीं पा रहे थे कि बेटों को बचाने के लिए बेटियों को बलि पर चढ़ाना होगा और उसका फैसला भी उन्हें अगली अमावस से पहले ही लेना था। सब अपने-अपने घर आ गए थे लेकिन अगली कई रातें यही बात सोच सोच कर किसी को नींद नहीं आ रही थी। एक तो पहले ही गांव में बेटियों से किसी को ज्यादा मोह न था ऊपर से जब उन्हें पता चला कि गांव के छोरो के जीवन की डोर इन छोरियों के जीवन से बंधी है तब से तो वहां के माहौल में और भी नफरत भर गई थी।

गांव की महिला( रोते हुए): सालों देवी मा के लिए निर्जला उपवास किए तब जाकर पांच छोरियों पर एक छोरा जना था। उस पर भी उस डायन की नजर पड़ गई। अरे उसे अपनी भूख मिटाने के लिए किसी की बाली ही चाहिए थी तो इन 6 में से किसी एक को ले जाती मेरा लाडेसर क्यों छीन कर ले गई मुझसे..? 

 

महिला का पति: आज तेरा बच्चा ले गई है कल को किसी और का जाएगा। एक एक करके पूरा गांव श्मशान में बदल जाएगा। लेकिन न हम ये न होने देंगे।

 

 अमावस्या से एक दिन पहले गांव के सभी आदमी चौक में इकट्ठा हुए ताकि एक फैसला ले सकें।  

 

मुखिया : अगर तुम सब ने अपना फैसला कर लिया है तो बता दो क्योंकि अगर आज फैसला नहीं लिया तो कल अमावस की रात को फिर से किसी के घर का कुलदीपक बुझ जाएगा और आने वाली हर अमावस को ये सिलसिला इसी तरह दोहराया जाएगा। 

 

मनोहर : ऐसे तो ये सिलसिला थमने से रहा, इससे तो अच्छा यही है कि हम अपनी बेटियों को बलि चढ़ा दें। वैसे भी बेटियां हमारा वंश आगे नहीं बढ़ा सकती और हर घर के वंश को मिटने देने से तो अच्छा है कि हम इक्कीस बेटियों की बलि दे दें। आखिर कहीं तो ये सिलसिला रुकवाना ही पड़ेगा ना..! 

 

मोहन : हां, मेरा भी यही मानना है। 

 

नैरेटर : अपने बेटों को बचाने के लिए उन्होंने ये निर्णय लिया कि वो अपनी बेटियों की बलि चढ़ाएंगे। रात गहराई, सब लोग मिलकर शमशान की तरफ गए जहां तांत्रिक बाबा अपनी साधना में लीन थे। गांव वालों के कदम जैसे ही श्मशान में पड़े तांत्रिक बाबा को उनके आने का अंदेशा हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर अपना जाप रोक दिया और गांव के लोगों को इशारा करके अपने पास बुलाया। 

 

तांत्रिक : ले लिया निर्णय। 

 

मोहन (गंभीर) : हां बाबा, हम तैयार हैं। अपने बेटों को बचाने के लिए हम उसे अपनी बेटियों की बलि चढ़ाएंगे। 

 

तांत्रिक : तो फिर ठीक है, कल रात अमावस्या है तो कल गांव की एक लड़की को लेकर इसी शमशान में आ जाना लेकिन हां एक बात का ध्यान रखना, बलि उसी लड़की की स्वीकार होगी जो अपनी किशोरावस्था में होगी। नवजात या छोटी बच्चियों की बलियों को वो स्वीकार नहीं करेगी। 

 

नैरेटर : अगली रात हुई, गांव के एक आदमी बिरजू के घर कुछ दिन पहले ही बेटे ने जन्म लिया था, उसकी बेटी इसी महीने तेरह साल की हुई थी। गली की बाकी बच्चियों के साथ वो आंगन में खेल रही थी तभी बिरजू ने उसे आवाज़ लगाई। 

 

बिरजू : गंगा, ज़रा बात सुन मेरी।  

 

गंगा : हां बोलो बापू, क्या हुआ। चाय पीनी है। मैं अभी बना के लाती हूं। 

 

बिरजू : ना, ना, मने बाहर का एक काम है। तू भी म्हारे साथ चल। 

 

गंगा : पर बापू, मने अपनी सहेलियों के साथ खेलना है। म्हारा कहीं जाने का मन ना है। आप अकेले चले जाओ ना। 

 

बिरजू : अरे, थोड़ी देर में वापस आ जावेंगे। चल चल। वापस आके खेल लियो। 

 

नैरेटर : बिरजू ने अपनी बेटी को बातों में बहलाया और उस मासूम सी जान ने अपने पिता पर भरोसा कर लिया। बिरजू ने उसका हाथ पकड़ा और शमशान घाट की ओर चल पड़ा। 

 

गंगा : हम कहां जा रहे हैं बापू। चलो ना वापस घर चलते हैं। मने बहुत जोर से भूख लग रही है। 

 

बिरजू : अरे तू चिंता मत कर, तने सब खिलाऊंगा। तेरी खातिर एक तोहफा लिया है मने। ले इस खातिर अपनी आंखों पे पट्टी बांध ले। रास्ता खत्म होने वाला है। 

 

गंगा : पट्टी नहीं बांधो बापू, मने अंधेरे से डर लगे है। 

 

बिरजू : अरे कुछ ना होता छोरी। दिखा। 

 

नैरेटर : बिरजू ने गंगा को बातों में बहलाया और शमशान घाट के बाहर पहुंचते ही उसने उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी। 

 

बिरजू : धीरे धीरे कदम रखियो हां, बिल्कुल धीरे धीरे। 

 

नैरेटर : अपने पिता पर भरोसा करके उनका हाथ पकड़कर गंगा ने धीरे धीरे कदम आगे बढ़ाए। बिरजू ने उसे तांत्रिक बाबा के सामने जल रहे यज्ञ कुंड के पास बैठा दिया जहां तंत्र मंत्र की सामग्री के साथ एक धारदार हथियार भी रखा था। एक बार को तो बिरजू का दिल भी वो धारदार चाकू देखकर दहल उठा लेकिन अगले ही पल उसने सोचा। 

 

बिरजू (मन में) : ना, तांत्रिक बाबा ने बोला था कि बेटी की बलि मुझे अपनी स्वेच्छा से देनी होगी। मुझे अपने मन को कठोर करना होगा। वरना छोरी की जान भी चली जाएगी और उस डायन  को संतोष भी न मिलेगा। और वो फिर खा जावेगी हमारे गांव के छोरे को।

 

गंगा : बापू, हम कहां आ गए, मैं अपनी आंखों से पट्टी निकाल दूं क्या। 

 

बिरजू (घबराते हुए) : ना ना छोरी, अभी ना। बस थोड़ी देर और रुक जा। 

 

नैरेटर : तांत्रिक बाबा ने वो धारदार चाकू उठाया और बिरजू की सहमति के लिए उसकी तरफ इशारा किया। बिरजू ने हां में गरदन हिलाई और उसी वक्त तांत्रिक बाबा ने यज्ञ कुंड में गंगा को बलि चढ़ा दिया। बिरजू के कपड़ों पर अपनी ही बेटी के खून की छींटे थी। उसकी बेटी की कटी हुई खोपड़ी यज्ञ कुंड में जल रही थी और उसका कटा हुआ धड़ उसके पैरों के सामने गिरा हुआ तड़प रहा था लेकिन उसकी आंखों में इस बात का दुख नहीं था कि उसने अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी को बलि पर चढ़ा दिया है बल्कि उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी। 

 

बिरजू (सनकी खुश) : अब मेरे बेटे को कुछ नहीं होगा ना बाबा। 

 

तांत्रिक : नहीं। अब तेरा बेटा सुरक्षित है। तू अब निश्चिंत हो जा। 

 

नैरेटर : बिरजू बहुत खुश था कि अब उसके बेटे को कुछ नहीं होगा। वो खिलखिलाता हुआ अपने घर आया। 

 

बिरजू (खुश) : दे दी बलि छोरी की। इब अपने बेटे को कुछ ना होवेगा। अब हमारा वंश ना मिटेगा। 

 

मधु : चलो अच्छा है, कल हवन करा देंगे छोरी के नाम का। मन को छोटा न करो। वह बड़ी बहन थी छोरे की, उसका फर्ज था उसकी रक्षा करना।

 

नैरेटर : अमावस्या की रात को गंगा की बलि देने के बाद उस रात गांव में किसी लड़के की जान नहीं गई तो सब मान गए कि तांत्रिक बाबा ने उन्हें बिल्कुल सही उपाय बताया है। अब अगली अमावस्या आने वाली थी, गांव में जिसके घर में भी उनकी बेटी किशोरावस्था में थी, वो सभी एक एक कर हर अमावस्या को अपनी बेटी को बलि चढ़ाने के लिए तांत्रिक बाबा के पास लेकर जा रहे थे। एक के बाद एक करके 18 लड़कियों को वो लोग बलि पर चढ़ा चुके थे, बाकी थी अब बस तीन ।

 

तांत्रिक (क्रिपी स्माइल) : हा हा हा,   बस कुछ दिन और। बस कुछ दिन और ये खूनी खेल चलेगा उसके बाद मैं मुक्त हो जाऊंगा, मुक्त हो जाऊंगा हमेशा हमेशा के लिए। हा हा हा हा हा। ।

 

क्या रुक जाएगा यह खूनी खेल या ऐसे ही एक-एक करके गांव की लड़कियों की बलि चढ़ती रहेगी आखिर कौन है वह डायन और यह तांत्रिक डायन के बारे में इतने विश्वास के साथ कैसे सब कुछ जानता है। सारे सवालों के जवाब जानने के लिए हमारे साथ कहानी के अगले भाग में बने रहिए। 

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