एक अमीर व्यापारी, तीन अलग-अलग बेटियाँ, और एक डूबे हुए जहाज़ की ख़बर — जिसने पूरे परिवार की क़िस्मत पलट दी।
बहुत पुरानी बात है। एक बड़े शहर में एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। उसका नाम था सेठ धनराज। उसकी हवेली शहर में सबसे बड़ी थी। उसके पास सोने की तिजोरियाँ, चांदी के बर्तन, बहुत सारे नौकर-नौकरानियाँ।
उसकी तीन बेटियाँ थीं। बड़ी का नाम ईशा। मँझली का नाम स्नेहा। और सबसे छोटी का नाम बेला।
तीनों दिखने में सुंदर थीं। पर तीनों के स्वभाव बिल्कुल अलग।
ईशा अपनी सुंदरता पर बहुत नाज़ करती थी। हर रोज़ नए कपड़े। हर रोज़ नई चूड़ियाँ। नौकरों से बात करना उसे पसंद नहीं था।
स्नेहा भी अपने आप पर बहुत मुग्ध थी। पूरा-पूरा दिन वो आईने के सामने बैठी रहती। बाल बनाती। मेहंदी लगाती।
दोनों बहनें अपनी छोटी बहन बेला को नीची नज़र से देखती थीं।
बेला की उम्र पंद्रह-सोलह साल की थी। पर वो दूसरी दोनों से पूरी तरह अलग थी।
उसे रेशमी कपड़े नहीं, सूती सादे कपड़े पसंद थे। उसे आईने में देखने में मज़ा नहीं आता — उसे किताबें पढ़ने में आता था। उसे नौकरों से दूरी रखना नहीं — उनके बच्चों के साथ खेलना अच्छा लगता था।
वो हर शाम बाग़ में बैठती। एक किताब हाथ में। और गुलाब के पेड़ के पास।
उसे गुलाब बहुत प्यारे थे। हर रंग के — लाल, गुलाबी, सफ़ेद, पीले।
"मेरी बेला, तू तो एकदम अजीब है।" बड़ी ईशा कहती। "किताबों से क्या होगा? शादी के बाद तो ये पुरानी बातें भूलनी हैं।"
"दीदी, मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं। पहले मैं अपने मन की पढ़ाई पूरी करना चाहती हूँ।"
"पागल लड़की।"
पर बेला हँस देती। उसे ताने का बुरा नहीं लगता। उसे पता था कि वो ख़ुश है — और बस यही सबसे बड़ी बात है।
एक दिन — एक तेज़ शाम — एक ख़बर आई जिसने पूरी हवेली को हिला दिया।
सेठ धनराज की पाँच बड़ी जहाज़ें — जो रत्न और मसाले लेकर वापस आ रही थीं — सब समंदर में डूब गईं।
एक भी बच नहीं पाई।
सेठ धनराज की पूरी पूँजी उन्हीं जहाज़ों में लगी थी। एक झटके में — वो ग़रीब हो गया।
हवेली बेची गई। नौकर निकाले गए। सोना-चांदी कर्ज़दारों ने ले लिया।
पूरा परिवार शहर के बाहर एक छोटे-से गाँव में आ गया। एक छोटा-सा कच्चा घर। एक छोटी-सी बाड़ी। और बहुत-सी कमी।
ईशा और स्नेहा रोने लगीं। दिन-रात रोतीं।
"पिताजी, अब हमारी क्या होगी? मेरे रेशमी कपड़े! मेरे गहने! कौन हमसे शादी करेगा?"
"मेरी आदत बिगड़ गई है! मैं इन कच्चे घरों में कैसे रहूँगी?"
पिता का दिल टूटा हुआ था। पर बेला ने अपनी बहनों को संभाला।
"दीदी, अब क्या रोना? जो हुआ, हुआ। हम मेहनत करेंगे। फिर से अमीर हो जाएँगे।"
"तू पागल है। तू कभी अमीर नहीं रही — तू क्या जानेगी हमारा दर्द?"
बेला ने सिर हिलाया। बात नहीं की।
उसने अगले दिन से ख़ुद काम शुरू कर दिया। सुबह जल्दी उठती। आँगन साफ़ करती। चूल्हा जलाती। पानी भरती। खाना बनाती। बाड़ी में सब्ज़ी उगाती।
"पिताजी, आप चिंता मत कीजिए। मैं हूँ। हम सब मिलकर ये दिन निकालेंगे।"
पिता की आँखों में आँसू आए।
"बेटी, तू मेरी सबसे बड़ी ताक़त है।"
लगभग एक साल बीत गया। एक दिन शहर से एक ख़बर आई।
"सेठ धनराज! आपकी एक छठी जहाज़ — जो आपको लगा कि डूब गई — असल में बच गई है। बस तूफ़ान में थोड़ी देर के लिए रास्ता खो गई थी। अब पास के बंदरगाह पर लंगर डाल चुकी है।"
सेठ धनराज की आँखों में चमक आई।
"मेरी जहाज़ बच गई?"
"हाँ साहब। आपको शहर जाकर अपना सामान देखना होगा। शायद आप फिर से अमीर हो सकते हैं।"
पूरे परिवार में ख़ुशी फैल गई।
ईशा और स्नेहा झटपट उछल पड़ीं।
"पिताजी, आप शहर जाएँ! मेरे लिए वो रेशमी कपड़ा लाइए! वही जो हम पुरानी हवेली में छोड़ आए थे!"
"और मेरे लिए हीरे की चूड़ियाँ! बहुत बड़ी वाली!"
पिता हँसे।
"बेटियों, अभी मुझे जहाज़ का सामान देखने दो। क्या बचा है, क्या नहीं — पता तो लगाऊँ। फिर वादा।"
उसने बेला की तरफ़ देखा।
"बेटी, तू भी कुछ माँग। तेरी क्या चाहत?"
बेला ने सोचा। फिर मुस्कुराई।
"पिताजी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप सकुशल लौट आइए।"
"नहीं बेटी, कुछ तो माँग।"
बेला ने थोड़ा शर्माते हुए कहा —
"पिताजी, अगर रास्ते में कहीं मिले — तो बस एक छोटा-सा गुलाब का फूल। हमारे गाँव में नहीं उगते। मुझे गुलाब बहुत पसंद हैं।"
पिता ने सिर हिलाया।
"बेटी, तू सच में मेरी बेटियों में सबसे अलग है। बाक़ी दोनों रेशम-हीरे माँगती हैं, और तू बस एक गुलाब। हाँ, ज़रूर लाऊँगा।"
अगले दिन सेठ धनराज अपने एक पुराने घोड़े पर सवार होकर शहर निकल पड़ा। उसने तीनों बेटियों के माथे चूमे।
"बेटियों, मैं हफ़्ते भर में लौट आऊँगा।"
घोड़ा चलने लगा।
शहर पहुँचकर पिता को एक बहुत बड़ा झटका लगा।
जहाज़ पर जो कुछ था — कर्ज़दारों ने पहले से दावा कर रखा था। एक के बाद एक ने अपनी रकम वसूली। आख़िर में सेठ धनराज के हाथ कुछ नहीं रहा।
"भगवान! मैं तो ख़ाली हाथ ही था!"
उसकी जेब में बस इतने ही पैसे थे कि वो वापस अपने घर पहुँच सके।
उसने सोचा — बेटियों को क्या मुँह दिखाऊँगा? न रेशम। न हीरे। न गुलाब।
उसने सिर झुकाकर अपने घोड़े पर बैठा। वापसी की राह पकड़ी।
आधी राह पर — एक भयानक तूफ़ान आ गया। बादल काले। बिजली। बारिश की बूंदें इतनी बड़ी कि घोड़े को आगे बढ़ना मुश्किल।
सेठ धनराज ने रास्ता खो दिया। उसका घोड़ा भी लड़खड़ाने लगा।
"भगवान, मेरी रक्षा करना। मेरी बेटियाँ मेरी राह देख रही हैं।"
तभी — दूर एक चमक उसे दिखी। एक रोशनी। जैसे कोई बड़ी इमारत हो।
उसने अपने घोड़े को उसी दिशा में मोड़ा।
नज़दीक पहुँचकर देखा — एक बहुत विशाल महल था। सुनहरे गुम्बद, संगमरमर की दीवारें, बड़े-बड़े दरवाज़े।
"इस सुनसान जगह पर इतना बड़ा महल? कौन रहता होगा?"
उसने दरवाज़ा खटखटाया। पर अंदर से कोई जवाब नहीं।
उसने धक्का दिया। दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर बहुत बड़ा दालान था। दीयों की रोशनी। मेज़ पर गरमा-गरम खाना सजा हुआ। पर कोई इंसान नहीं।
"कोई है? कोई है यहाँ?"
कोई जवाब नहीं।
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