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एक टूटा हुआ गुलाब और दैत्य का गुस्सा

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एक छोटा-सा गुलाब, एक भयानक चेहरा, और एक भारी सौदा — जिसने सेठ धनराज की आत्मा को दहला दिया।

एक रहस्यमयी रात

सेठ धनराज अकेले उस विशाल महल के अंदर खड़ा था। उसने बहुत बार आवाज़ लगाई। पर कोई नहीं बोला।

उसका पेट बहुत भूखा था। बारिश में भीगा हुआ। थका हुआ।

उसने सोचा — "जो भी इस महल का मालिक है — मैं बस एक रात रुकूँगा। एक बार खाऊँगा। फिर सुबह निकल जाऊँगा।"

मेज़ पर खाना ताज़ा था। उसने कुछ खाया। फिर पीछे एक नर्म-सा बिस्तर देखा। लेट गया।

नींद आ गई।

सुबह जब उठा — हैरानी। उसके गीले कपड़े सूख चुके थे। एक नई पोशाक उसके पास तैयार। एक गरम चाय की प्याली मेज़ पर। सब कुछ — पर एक भी इंसान नज़र नहीं आ रहा।

"क्या मैं सपना देख रहा हूँ? कोई जादू है यहाँ।"

बाग़ में एक गुलाब

सेठ धनराज ने महल के पीछे का बाग़ देखा। बहुत सुंदर बाग़ था। हर तरह के फूल। बिल्कुल वैसे जैसे उसकी पुरानी हवेली में थे।

एक कोने में — एक गुलाब का पेड़। बहुत बड़ा। पूरा फूलों से लदा।

उसके मन में अचानक बेला की याद आई।

"हाँ! बेला ने तो बस एक गुलाब माँगा था। मैं उसे ख़ाली हाथ क्यों लौटाऊँ? यहाँ तो हज़ार गुलाब हैं। एक तोड़ने से मालिक को क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"

उसने हाथ बढ़ाया। एक सबसे सुंदर लाल गुलाब को छुआ। एक झटके में तोड़ लिया।

तुरंत — एक भयानक गर्जना।

"रुक जा! कौन है मेरे बाग़ में?"

सेठ धनराज ने पीछे मुड़कर देखा।

उसके सामने एक भयानक प्राणी खड़ा था। शरीर इंसान का। पर सिर शेर जैसा। हाथ भालू जैसे — बड़े नाख़ून। आँखें आग जैसी जल रही थीं। मुँह से तेज़ साँसें निकल रही थीं।

सेठ धनराज की हाथ से गुलाब छूट गया। वो ज़मीन पर बैठ पड़ा।

"म-माफ़ करिए, साहब! मुझे माफ़ करिए!"

दैत्य का सौदा

दैत्य ने उसे ध्यान से देखा। उसकी आवाज़ अब भी कठोर थी, पर थोड़ी कम।

"मैंने तुझे रात भर अपने महल में आसरा दिया। खाना दिया। कपड़े दिए। बिस्तर दिया। और तू मेरी एक चीज़ चुराने को तैयार हो गया?"

"साहब, मेरी एक छोटी-सी बेटी है। उसने बस एक गुलाब माँगा था। मेरे पास और कुछ नहीं था लाने को। इसलिए..."

दैत्य ने कुछ देर रुककर सोचा।

"तेरी बेटी?"

"हाँ साहब। उसका नाम बेला है।"

दैत्य की आँखों में एक चमक आई। एक भयानक चमक।

"ठीक है। मैं तुझे माफ़ करता हूँ। पर एक शर्त है।"

"क्या साहब?"

"तू अपनी बेटी को मेरे पास भेज दे। हमेशा के लिए। वो यहाँ मेरी मेहमान बनकर रहेगी। तू ज़िंदा बच जाएगा।"

सेठ धनराज के पाँव से ज़मीन खिसक गई।

"नहीं साहब! ये नहीं हो सकता!"

"फिर तेरी जान जाएगी। यहीं इसी पल। तेरा घोड़ा भी।"

"साहब, थोड़ा वक़्त दीजिए। मैं घर जाकर बेटियों को आख़िरी बार देख आऊँ। फिर मेरा क्या करिएगा।"

दैत्य ने एक पल सोचा।

"ठीक है। मैं तुझे एक हफ़्ते का वक़्त देता हूँ। एक हफ़्ते बाद — या तू ख़ुद यहाँ लौट। या तेरी बेटी आए। एक तो ज़रूर आना चाहिए।"

"वादा साहब।"

"और एक बात — ये गुलाब ले जा। अपनी बेटी को दे। उसे भी पता रहना चाहिए — एक गुलाब की कितनी बड़ी कीमत है।"

घर वापसी

सेठ धनराज घोड़े पर बैठकर निकला। एक गुलाब हाथ में। पर मन भारी।

घर पहुँचा। तीनों बेटियाँ दौड़ती हुईं।

"पिताजी! मेरा रेशमी कपड़ा?"

"मेरी हीरे की चूड़ियाँ?"

बेला ने पीछे से धीरे-से पूछा —

"पिताजी, आप ठीक तो हैं?"

पिता ने तीनों को बैठाया। एक-एक करके पूरी कहानी सुनाई। डूबी जहाज़, ख़ाली पॉकेट, तूफ़ान, रहस्यमयी महल, गुलाब, दैत्य, सौदा।

ईशा और स्नेहा एक-दूसरे को देखतीं रहीं। अपनी निराशा अब और बढ़ गई।

"और बेला! तेरी एक छोटी-सी ज़िद के कारण पिताजी को ये भुगतना पड़ा! एक गुलाब! कौन माँगता है गुलाब?"

"हाँ! बेला ही जिम्मेदार है!"

बेला ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

"पिताजी, मेरी ग़लती। मैं ही जिम्मेदार। मैं ही जाऊँगी।"

"नहीं बेटी! मैं अपनी बेटी को कैसे एक दैत्य के पास भेज दूँ?"

"पिताजी, मैं आपको ख़ोने नहीं दे सकती। आप पूरे परिवार की जान हैं। मैं एक हूँ। मेरी जान कोई बात नहीं।"

पिता रोने लगा।

"बेटी, मेरी सबसे प्यारी बेटी। तू मेरे लिए ये बलिदान दे रही है?"

"पिताजी, ये बलिदान नहीं। ये मेरा फ़र्ज़ है। और मुझे लगता है — कौन जाने — शायद वो दैत्य उतना बुरा न हो जितना दिखता है।"

एक हफ़्ते का दर्द

एक हफ़्ता बीता। बेला ने अपनी सब किताबें बाँधीं। एक छोटा-सा थैला। दो जोड़ी कपड़े। एक छोटी-सी डायरी।

आख़िरी रात उसने अपने पिता के माथे को चूमा।

"पिताजी, आप दुख मत करिए। मेरा भगवान है।"

दोनों बहनों ने ऊपरी मन से उसे विदा कही।

"बहन, सकुशल जा।"

(पर मन में दोनों ने सोचा — चलो, छोटी जा रही है। हमें अब उसकी पढ़ाई की बातें नहीं सुननी पड़ेंगी।)

अगली सुबह — सेठ धनराज और बेला घोड़े पर बैठकर दैत्य के महल की तरफ़ चले।

दैत्य के महल का दरवाज़ा

शाम तक वो महल पहुँचे। पिता के पाँव कांपे। पर बेला ने उसका हाथ पकड़ा।

"पिताजी, अब हम ख़ुद को संभालते हैं।"

दरवाज़ा खुला हुआ था। दोनों अंदर गए।

दालान में मेज़ पर खाना सजा हुआ। दो थालियाँ। दो प्यालियाँ।

"बेटी, खाना खा। शायद ये हमारे साथ हमारा आख़िरी खाना हो।"

दोनों बैठे। खाना खाने लगे।

तभी — दरवाज़े पर एक भारी क़दमों की आवाज़।

दैत्य अंदर आया।

बेला ने पहली बार उसे देखा। उसकी आँखें फटी रहीं। पर वो डरी नहीं।

उसने हाथ जोड़े।

"साहब, मेरा नाम बेला है। मैं अपने पिताजी की वजह से आपके पास आई हूँ। आप जो चाहेंगे, करिए।"

दैत्य ने उसकी आँखों में देखा। फिर पिता की तरफ़।

"अच्छा। तुम दोनों आ गए। अब मेरे पास तेरी बेटी रहेगी। तू वापस जा।"

पिता ने एक झटका खाया।

"साहब, मेरी बेटी का अच्छा ख़याल रखिएगा।"

"वादा।"

पिता ने बेला को आख़िरी बार गले लगाया। दोनों की आँखों से आँसू बहे।

फिर पिता घोड़े पर बैठा। वापस जाने के लिए मुड़ा।

दरवाज़े बंद हो गए।

बेला अकेली खड़ी रह गई। एक विशाल महल। एक भयानक दैत्य। और एक नई ज़िंदगी।

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