एक डरावना दैत्य, एक रोज़ का खाना, और कुछ धीमी-धीमी मुलाक़ातें — जिनसे बेला का डर थोड़ा-थोड़ा कम होने लगा।
पिता के जाने के बाद बेला कुछ देर खड़ी रही। फिर दैत्य ने उसकी तरफ़ देखा।
"बेटी, डरने की कोई बात नहीं। मैं तुझे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा। तू बस यहाँ मेरी मेहमान है।"
उसकी आवाज़ में अब वो गर्जना नहीं थी जो बाग़ में थी। ये नर्म थी। उदास भी।
"साहब, मेरा कमरा कौन-सा है?"
"ऊपर बाएँ। एक बड़ा कमरा। तेरे लिए ख़ास तैयार किया है।"
बेला ऊपर गई। दरवाज़ा खोला। और एक झटके में रुक गई।
कमरा बहुत सुंदर था। एक बहुत बड़ा बिस्तर। नर्म रेशमी चादरें। कोने में एक किताबों से भरी अलमारी। मेज़ पर एक छोटा-सा गुलदान — उसमें उसके पसंद के गुलाब। खिड़की पर पर्दे जो धीरे-धीरे हिल रहे थे।
"मेरे लिए?"
उसने अपना थैला रखा। बिस्तर पर बैठ गई।
उसे एहसास हुआ — दैत्य का चेहरा भयानक है, पर उसका दिल शायद वैसा नहीं।
शाम को बेला नीचे उतरी। दालान में मेज़ पर खाना तैयार। पर इस बार सिर्फ़ एक थाली।
"साहब, आप नहीं खाएँगे?"
"बेटी, मैं तुझसे कुछ दूरी रखूँगा। मेरा चेहरा ही ऐसा है कि कोई भी देखकर अपना खाना भूल जाए। तू अकेली खाना खा। मैं देखता रहूँगा।"
बेला ने सोचा। फिर सिर हिलाया।
"साहब, मुझे आपसे डर नहीं लगता। आप मेरे साथ खाना खा सकते हैं।"
दैत्य ने एक पल रुककर देखा। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। मेज़ पर बैठा।
उसने अपनी थाली का खाना अपनी बड़ी, नाख़ून-वाली उंगलियों से उठाने की कोशिश की। पर उसे ठीक से नहीं आता था।
बेला ने मुस्कुराकर कहा —
"साहब, ज़रा यूँ — कांटे से लीजिए।"
उसने उसे एक छोटा-सा कांटा दिखाया।
दैत्य ने कोशिश की। पहले गिरा। फिर दूसरी बार। आख़िर में थोड़ा-सा खाना उसके मुँह तक पहुँचा।
बेला हँस पड़ी।
"साहब, बच्चों जैसे सीखते हैं!"
दैत्य की आँखों में पहली बार एक चमक आई। एक छोटी-सी चमक — जो पिघलने वाली बर्फ़ जैसी थी।
दिन बीतने लगे। बेला हर सुबह उठती। बाग़ में टहलती। किताब पढ़ती। दोपहर को खाना खाती।
शाम को — हर शाम — दैत्य उसके पास आता। दोनों खाना खाते। बातें करते।
दैत्य ने बेला से बहुत-सी बातें कहीं — किताबों की, सितारों की, पुरानी कहानियों की।
"साहब, आप तो बहुत पढ़े-लिखे लगते हैं।"
"बेटी, मेरी एक पुरानी ज़िंदगी थी। उस ज़िंदगी में मैं और कुछ था।"
"पुरानी ज़िंदगी? क्या आप दैत्य पैदा नहीं हुए?"
दैत्य ने सिर झुका लिया।
"बेटी, ये कहानी एक दिन सुनाऊँगा। अभी नहीं।"
एक रात खाने के बाद — दैत्य ने बेला की तरफ़ झुककर पूछा —
"बेटी, क्या तू मुझसे शादी करेगी?"
बेला चौंक गई। उसने जल्दी से जवाब नहीं दिया।
"साहब, मैं... आपसे शादी?"
दैत्य ने सिर हिलाया।
"नहीं बेटी, अभी जल्दी नहीं। बस मन में रख। अगर एक दिन तेरे मन में मेरे लिए जगह बने — तो बता।"
बेला ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। एक भयानक चेहरा। पर उसकी आँखों में एक उदासी, एक नर्मी।
"साहब, मैं सोचूँगी।"
उस रात बेला बहुत देर तक जागी।
"मैं उससे शादी करूँगी? पर वो तो दैत्य है! दिखने में भयानक! पर... पर उसका दिल कितना अच्छा है। उसकी बातें कितनी समझदार। उसकी दया मुझे हर पल महसूस होती है।"
"क्या मेरा डर सिर्फ़ उसकी सूरत से है? और दिल से उसके बारे में मैं क्या सोचती हूँ?"
उसे जवाब अभी साफ़ नहीं था।
एक हफ़्ता, दो हफ़्ते, चार हफ़्ते। बेला महल की हर एक चीज़ से अभ्यस्त हो गई। हर शाम दैत्य आता। दोनों बातें करते।
दैत्य ने बहुत-सी पुरानी बातें सुनाईं। दूर देशों की कहानियाँ। पुराने राजाओं की लड़ाइयाँ। प्यार की कहानियाँ।
बेला सुनती रहती। और हँसती।
एक शाम — दैत्य ने पूछा —
"बेला, क्या तू मुझसे शादी करेगी?"
बेला ने अब पहली बार सोचने में बहुत वक़्त नहीं लिया।
"साहब, अभी नहीं।"
दैत्य की आँखों में दुख आया।
"नहीं?"
"साहब, माफ़ करिए। पर अभी मेरे मन में आपके लिए दोस्ती है। शादी नहीं।"
दैत्य ने सिर हिलाया। पर उसकी उदासी साफ़ थी।
एक रात बेला अपने कमरे में थी। उसने एक चमकता आईना देखा — जो दीवार पर टँगा था।
उसने आईने में अपना चेहरा देखा। फिर मन में सोचा — "पिताजी, मेरी बहनें — क्या कर रहे होंगे?"
तुरंत — आईने में एक चमक आई। उसका अपना चेहरा बदल गया। उसकी जगह — उसके पिता का चेहरा।
पिता एक बिस्तर पर लेटे थे। बहुत बीमार। उनके पास कोई नहीं था।
बेला की आँखों से आँसू बहने लगे।
"पिताजी!"
उसने आईना दीवार से उतारा। दौड़ती हुई दैत्य के पास गई।
"साहब! मेरे पिताजी बीमार हैं! बहुत बीमार!"
उसने उसे आईना दिखाया।
दैत्य ने ध्यान से देखा। फिर एक भारी आहें भरीं।
"बेला, तू उन्हें देखने जाना चाहती है?"
"हाँ साहब! बहुत-बहुत!"
दैत्य कुछ देर रुका।
"ठीक है। मैं तुझे जाने देता हूँ। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"तू बस एक हफ़्ते के लिए जाएगी। एक हफ़्ते के बाद वापस आ जाएगी। अगर नहीं आई — तो मैं ज़िंदा नहीं रहूँगा।"
बेला ने जल्दी से सिर हिलाया।
"वादा साहब। एक हफ़्ते के बाद ज़रूर लौटूँगी।"
दैत्य ने अपनी जेब से एक छोटी-सी अंगूठी निकाली।
"ये पहन ले। जब वापस लौटना हो — बस अपने हाथ पर इसे घुमाना। तू एक झटके में महल पहुँच जाएगी।"
बेला ने अंगूठी पहनी।
"साहब, धन्यवाद।"
"और बेला..."
"हाँ साहब?"
"मुझे भुलाना मत।"
उसकी आवाज़ में जो दर्द था — वो बेला ने पहले कभी नहीं सुना था।
"नहीं भुलाऊँगी, साहब। वादा।"
उसने आँखें बंद कीं। एक झटका। और अगले ही पल — वो अपने पिता के घर के सामने थी।
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