कुछ इच्छाएँ समय के साथ मरती नहीं हैं—वे इंतज़ार करती हैं।
और जब समय अनुकूल होता है, तो वे डर बनकर लौटती हैं।
बंगाल के घने जंगलों और दलदली ज़मीनों के बीच एक पुरानी कहावत है… हर रात भगवान की नहीं होती। अमावस्या की वो काली रात, जब चाँद भी शर्म से छिप जाता है, वो रात 'उसकी' होती है। वो रात—एक पयेतनी की होती है।
कौन है पयेतनी?
लोककथाएँ कहती हैं कि जब कोई विधवा या अविवाहित स्त्री, समाज की बंदिशों…. समाज द्वारा थोपे गए नियमों, वर्जनाओं और अधूरी इच्छाओं के साथ में घुट-घुट कर मर जाती है... जब उसकी आँखों में अधूरी हसरतें और गले में दबी हुई चीखें रह जाती हैं, तो यमराज भी उसे हाथ लगाने से डरता है। उसकी आत्मा भटकती है और जन्म लेती है एक पयेतनी।
सफेद चादर में लिपटी, उलटे पाँव, लंबे और सड़े हुए नुकीले नाखून, काले बिखरे बाल जो चेहरे को ढके रहते हैं... और आँखों में एक ऐसी आग, जो आपको जलाकर राख कर दे। लेकिन सावधान! पयेतनी का सबसे घातक हथियार उसका चेहरा नहीं, उसका मायाजाल है।
वह चाहे तो स्वयं को एक अलौकिक सुंदर स्त्री में बदल सकती है। और क्षण भर में खुद को दुनिया की सबसे हसीन स्त्री में बदल सकती है। इतनी सुंदर कि आप अपनी रूह तक उसे सौंप दें।
पर उस हुस्न के पीछे एक घिनौनी भूख छिपी है। एक ऐसी चीज़ का स्वाद, जिससे उसे जीते-जी जीवन में वंचित रखा गया।… मछली। मछली के मांस की वो महक उसे पागल कर देती है।
उसके भीतर बसती है एक ही लालसा—
मछली खाने की इच्छा।
अगर आप रात के सन्नाटे में मछली लेकर अकेले निकल रहे हैं, तो संभल जाइए। अगर वो गंध उस तक पहुँच गई, तो वो आपके पीछे आएगी। वो आपके कानों में मीठे शब्दों की चाशनी घोलेगी, आपको अपनी तरफ खींचेगी... लेकिन जैसे ही आप उसकी माया में फँसेंगे, वह न सिर्फ आपकी मछली छीनेगी, बल्कि आपके शरीर की जवानी और आपकी अमर आत्मा को भी नोच-नोच कर खा जाएगी।
यकीन नहीं होता? फिर तो आपको मिलना ही पड़ेगा अर्जुन से—अर्जुन चटर्जी। एक साधारण आदमी, जो विज्ञान पर भरोसा करता था, अंधविश्वासों पर नहीं। उसे नहीं पता था कि आज की रात, मछली की वो ताज़ा खुशबू उसे एक ऐसी प्यास के सामने खड़ा कर देगी, जिससे बचने का कोई रास्ता नहीं है।
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