अर्जुन के फ्लैट की हवा अब भारी हो चुकी थी, जैसे ऑक्सीजन की जगह कोई पुराना, नम गुबार भर गया हो। वह तली हुई मछली की गंध साधारण नहीं थी—वह एक बुलावा थी, जो कंक्रीट की दीवारों को चीरकर उन गलियों तक जा पहुँची थी जहाँ रोशनी जाने से डरती है।
हवा के साथ वह एक पुराने, उजाड़ मकान तक पहुँची।
वहाँ, छत पर बैठी थी वह।
लंबे उलझे बाल। पर उसके बाल केवल उलझे हुए नहीं थे, वे ज़मीन पर किसी काले नाग की तरह रेंग रहे थे। जब उसने हवा को सूँघा, तो उसकी रीढ़ की हड्डी से एक कड़कराती हुई आवाज़ आई।
उसके उल्टे पैर मुंडेर पर टिके थे और नाखून इतने नुकीले थे कि अंधेरे को चीर दें।
और आँखों में—सदियों की भूख। एक ऐसी भूख जो मांस की नहीं, बल्कि 'अतृप्ति' की थी। सदियों से सूखी हुई उसकी जीभ ने अपने नुकीले काले दांतों पर फेरा। पेतनी को दावत मिल गई थी।
मछली की खुशबू ने उसकी दबी हुई इच्छा को जगा दिया। उसने फिर से एकबार हवा को सूँघा, जैसे कोई नशा हो।
“कितना तरसा एक मछली के लिए……
आख़िर बरसों का इंतज़ार आज पूरा हुआ…..
आह्ह्ह! क्या ख़ुशबू है…..
आज का यह दिन तो मेरा है…..
बस मेरा।
आज, वर्षों का इंतज़ार खत्म होने वाला था।”
उधर अर्जुन अपने फ्लैट पहुँचा। जैसे ही वह खाना खोलने वाला था, दरवाज़े की घंटी बजी।
दरवाज़े के उस पार खड़ी थी एक बेहद खूबसूरत औरत। उसकी सुंदरता असामान्य थी—अलौकिक। वह इतनी सुंदर थी कि उसकी त्वचा चांदनी जैसी चमक रही थी। पर अगर अर्जुन अपनी नज़रें उसके चेहरे से हटाकर नीचे फर्श पर डालता, तो उसे दिखता कि उस औरत की कोई परछाई नहीं थी। उसके पैर सारी के नीचे एक अजीब कोण पर मुड़े हुए थे। हवा में मोगरे की खुशबू के पीछे दबी हुई शमशान की राख की गंध थी।
“हाय, मैं परी हूँ।”
उस की आवाज़ सुन के अर्जुन जैसे सम्मोहित हो गया, जैसे कोई मकड़ी अपने जाल को धीरे से हिला रही हो।
“... क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”
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