अर्जुन चटर्जी—एक राष्ट्रीयकृत बैंक में काम करने वाला ईमानदार कर्मचारी।
मार्च का महीना था। साल के अंत का दबाव, रोज़ 10–12 घंटे की नौकरी, थकान और अकेलापन—सब कुछ उसके जीवन का हिस्सा बन चुका था।
उस दिन भी वोह बैंक की फाइलों के बोझ से दबी थी उसकी गर्दन में एक अजीब सी जकड़न थी, जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पीछे से खींच रहा हो।
उस रात भी वह देर से ऑफिस से निकला। शहर की लाइटें धुंधली पड़ चुकी थीं। अर्जुन जब अपनी बाइक से निकला, तो सड़कें खाली नहीं थीं—वे सुनसान थीं। हवा में एक सिहरन थी जो पसीने के बावजूद उसकी रीढ़ की हड्डी में उतर रही थी।
बाइक चलाते चलाते वह सोच रहा था कि घर में खाने को कुछ नहीं है। और ऊपर से यह थकान। इस थकान के बीच उसे अपनी माँ की याद आई—और संयोग देखो उसी समय गाँव से उसकी माँ का फोन आ गया।
माँ की आवाज़ में चिंता थी, अपनापन था।
कुछ इधर उधर की बातें करने के बाद आया वह चेतावनी—
“अच्छा सुन, आज अमावस्या है… मछली मत खाना। जनता है ना रात मच्छी खाने से पेतनी पीछे पढ़ जाती है।”
अर्जुन की हँसी उस वीराने में गूँजी, लेकिन वह हँसी उसके अपने कानों को भी पराई लगी। "माँ, अंधविश्वास की भी हद होती है," उसने बुदबुदाया।
पेतनी जैसी कोई चीज़ नहीं होती—यह सोचकर उसने माँ का फ़ोन काट दिया।
फोन रखते समय माँ ने भगवान का नाम लिया।
पर हर रात भगवान की नहीं होती।
देर रात एक ही दुकान खुली थी, कड़ाही में खौलता हुआ तेल काला पड़ चुका था, और उसमें से निकलने वाला धुआँ किसी साये की तरह हवा में तैर रहा था।
अर्जुन ने पूछा तो दूकानदार ने कहा अभी सिर्फ़ चिली फिश ही मिलेगा।
“ठीक है….जो है वही पैक कर दो,”
तभी उसके कान के पास एक ठंडी, बर्फीली फुसफुसाहट गूँजी: “माँ ने मना किया था न, अर्जुन?”
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