1 नियति का आरम्भ FREE 2 पुत्रों का बलिदान FREE 3 गंगा का रहस्य और आठवां पुत्र FREE 4 युवराज का अभिषेक और सत्यवती ₹1 5 भीष्म प्रतिज्ञा ₹1 6 इच्छा मृत्यु का वरदान ₹1 7 शांतनु का अंत और विचित्रवीर्य ₹1 8 काशी स्वयंवर और अंबा का अपहरण ₹0 9 अंबा का क्रोध और परशुराम की एंट्री ₹0 10 गुरु और शिष्य का महायुद्ध ₹0 11 वेद व्यास का आगमन और तीन पुत्रों का जन्म ₹0 12 अंधेरे का बीज और पांडु का राज्याभिषेक ₹0 13 गांधारी की प्रतिज्ञा और कुंती का स्वयंवर ₹0 14 ऋषि किंदम का श्राप और पांडु का वनवास ₹0 15 युधिष्ठिर का जन्म और गांधारी का गर्भपात ₹0 16 अर्जुन और नकुल-सहदेव का जन्म ₹0 17 पांडु का अंत और हस्तिनापुर वापसी ₹0 18 भीम को विष और नागलोक की यात्रा ₹0 19 गुरु द्रोणाचार्य का आगमन ₹0 20 एकलव्य की गुरुदक्षिणा ₹0 21 रंगभूमि का शंखनाद और भीम-दुर्योधन का द्वंद्व ₹0 22 कर्ण का राज्याभिषेक और अटूट मित्रता ₹0 23 गुरुदक्षिणा और राजा द्रुपद का अहंकार ₹0 24 लाक्षागृह की साज़िश और विदुर की चेतावनी ₹0 25 हिडिम्ब वध और घटोत्कच का जन्म ₹0 26 बकासुर वध और पांचाल का निमंत्रण ₹0 27 मत्स्य भेदन और "भिक्षा बांट लो" ₹0 28 गांडीव की टंकार और इंद्रप्रस्थ का उदय ₹0 29 जरासंध वध और राजसूय यज्ञ की तैयारी ₹0 30 विनाश का खेल - द्यूत क्रीड़ा का आरंभ ₹0
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नियति का आरम्भ

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Funtel
21 Mar 2026

समय: मैं समय हूँ... अनादि, अनंत। मैंने सृष्टि का निर्माण देखा है और महाप्रलय का विनाश भी। मैंने राजाओं को रंक बनते देखा है और रंक को राजा। लेकिन भारतवर्ष के इतिहास में, कुरुक्षेत्र की उस लाल मिट्टी की कहानी जैसा कुछ भी नहीं। यह कहानी केवल एक युद्ध की नहीं है... यह कहानी है मानव मन की, ईर्ष्या की, त्याग की, और धर्म की। सुनो... उस महागाथा को, जिसने युगों को बदल दिया। यह है... महाभारत!

ऋषि शौनक: हे सूतपुत्र उग्रश्रवा! हम नैमिषारण्य के ऋषि हज़ारों वर्षों से ज्ञान की खोज में हैं। हमने कई पुराण सुने हैं। लेकिन आज... आज हमारा मन उस कथा को सुनने के लिए व्याकुल है जिसमें जीवन का सम्पूर्ण सार छिपा हो।

उग्रश्रवा: मुनिवर, वह कथा तो केवल एक ही है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित "जय संहिता"... जिसे अब दुनिया "महाभारत" कहती है। यह कथा कुरु वंश के महान राजाओं और उनके भीषण संघर्ष की है।

ऋषि शौनक: तो विलंब क्यों पुत्र? हमें उस पवित्र कथा का पान कराओ। यह सब कहाँ से शुरू हुआ?

उग्रश्रवा: यह कथा शुरू होती है हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु से। वो राजा, जिसके पास सब कुछ था... सिवाय शांति के।

राजा शांतनु: हस्तिनापुर का सिंहासन, अपार धन, अजेय सेना... सब कुछ है मेरे पास। फिर भी यह हृदय खाली क्यों है? ऐसा लगता है जैसे मैं किसी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। यह सुगंध कैसी है? और यह दिव्य आभा... गंगा के तट पर खड़ी वह स्त्री... क्या वह कोई मानवी है या स्वर्ग की अप्सरा? पानी की लहरें भी जैसे उसके चरणों को छूने के लिए मचल रही हैं। मुझे... मुझे उससे बात करनी होगी। हे देवी!

गंगा: प्रणाम, राजन। क्या आप आखेट के लिए आए थे?

राजा शांतनु: शिकार की तलाश में आया था, लेकिन अब लगता है कि मैं स्वयं घायल हो गया हूँ। देवी, आपका यह रूप... मैंने तीनों लोकों में ऐसा सौंदर्य नहीं देखा। मैं कुरु वंश का राजा शांतनु हूँ। क्या आप... क्या आप मेरी अर्धांगिनी बनना स्वीकार करेंगी?

गंगा: विवाह? इतनी शीघ्रता राजन? आप मुझे जानते भी नहीं। न मेरा नाम, न मेरा कुल।

राजा शांतनु: प्रेम परिचय का मोहताज नहीं होता देवी। मेरा हृदय आपके चरणों में है। मांग लीजिए, आप जो भी शर्तें रखेंगी, यह शांतनु उन्हें पूरा करेगा।

गंगा: सावधान राजन। आवेश में वचन मत दीजिये। मेरी शर्तें बहुत कठिन हैं।

राजा शांतनु: कहो देवी! हस्तिनापुर के राजा के लिए कुछ भी असंभव नहीं।

गंगा: ठीक है। मैं आपसे विवाह करूँगी। लेकिन मेरी दो शर्तें हैं। पहली... आप कभी मुझसे मेरा नाम या परिचय नहीं पूछेंगे। और दूसरी... मैं जो कुछ भी करूँ, चाहे वह अच्छा हो या बुरा... आप मुझे कभी रोकेंगे नहीं, और न ही कभी प्रश्न पूछेंगे। जिस दिन आपने मुझे रोका या प्रश्न पूछा... मैं उसी क्षण आपको छोड़कर चली जाऊंगी। क्या आपको स्वीकार है?

राजा शांतनु: मुझे स्वीकार है! मुझे सब स्वीकार है। मैं वचन देता हूँ, मैं कभी प्रश्न नहीं पूछूंगा।

गंगा: तो ठीक है, महाराज शांतनु। नियति का खेल आरम्भ होता है।

समय: प्रेम अंधा होता है। राजा शांतनु ने उस अजनबी सुंदरी के रूप में खोकर एक ऐसा वचन दे दिया, जो भविष्य में हस्तिनापुर के लिए अभिशाप बनने वाला था। वह स्त्री कोई साधारण स्त्री नहीं, स्वयं पापनाशिनी गंगा थी। शांतनु खुश थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि गंगा के गर्भ से जन्म लेने वाले पुत्रों के साथ गंगा क्या करने वाली है। क्या शांतनु अपना वचन निभा पाएंगे? या एक पिता का धैर्य टूट जाएगा?

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