समय: हस्तिनापुर के महलों में खुशियाँ गूंज रही थीं। राजा शांतनु का विवाह उस रहस्यमयी सुंदरी गंगा से हो चुका था। राजा शांतनु गंगा के प्रेम में इतने डूबे थे कि वे राज-काज, प्रजा, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व को भी भूल बैठे थे। लेकिन सुख की यह नींद जल्द ही टूटने वाली थी। नियति ने उस वचन की परीक्षा लेने का समय तय कर लिया था।
उग्रश्रवा: समय बीतता गया। और वह शुभ घड़ी आई जब गंगा ने राजा शांतनु की पहली संतान, एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। पूरे हस्तिनापुर में उत्सव की तैयारी होने लगी। महाराज शांतनु दौड़ते हुए रनिवास की ओर गए।
राजा शांतनु: महामंत्री! पूरे नगर में घोषणा करवा दो। आज हस्तिनापुर को उसका उत्तराधिकारी मिल गया है। गरीबों में स्वर्ण मुद्राएँ बांट दो। आज मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है।
दासी: महाराज! बधाई हो महाराज! रानी गंगा ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया है। वह सूर्य के समान चमक रहा है।
राजा शांतनु: कहाँ है मेरा पुत्र? मैं उसे अपनी गोद में लेना चाहता हूँ। मैं उसे हस्तिनापुर का भावी नरेश घोषित करूँगा।
दासी: क्षमा करें महाराज, लेकिन... लेकिन रानी साहिबा बालक को लेकर महल से बाहर चली गई हैं। वे गंगा तट की ओर गई हैं।
राजा शांतनु: गंगा तट? नवजात शिशु को लेकर? यह कैसा हठ है? मुझे तुरंत वहां जाना होगा।
उग्रश्रवा: राजा शांतनु दौड़ते हुए नदी के किनारे पहुंचे। उन्होंने देखा कि गंगा अपने नवजात शिशु को सीने से लगाए खड़ी है। शांतनु के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने राजा के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
गंगा: मेरे पुत्र... इस संसार का कष्ट तुम्हारे लिए नहीं है। मैं तुम्हें मुक्त करती हूँ।
राजा शांतनु: गंगा! यह तुम क्या कर रही हो? रुको!
उग्रश्रवा: शांतनु की चीख भी गंगा को नहीं रोक पाई। गंगा ने उस नवजात शिशु को उफनती हुई नदी में फेंक दिया। बच्चा पानी में डूब गया।
राजा शांतनु: नहीं! यह तुमने क्या किया? तुमने मेरे पुत्र को मार डाला? तुम माँ हो या कोई डायन?
गंगा: राजन! अपनी जुबान पर लगाम लगाइये। क्या आप अपना वचन भूल गए?
राजा शांतनु: वचन? कैसा वचन? तुमने एक मासूम की हत्या की है!
गंगा: शर्त याद कीजिये राजन। जिस दिन आपने मुझसे प्रश्न पूछा, या मेरे काम में बाधा डाली, मैं आपको छोड़कर चली जाऊंगी। क्या आप चाहते हैं कि मैं अभी चली जाऊं?
राजा शांतनु: नहीं... नहीं गंगा। मुझे छोड़कर मत जाओ। मैं... मैं विवश हूँ। मैं कुछ नहीं बोलूंगा।
समय: एक पिता की ममता और एक प्रेमी का वचन... दोनों के बीच शांतनु पिसकर रह गए। वह पुत्र वियोग में तड़पते रहे, लेकिन गंगा को खोने के डर से चुप रहे। लेकिन यह अंत नहीं था। यह तो बस शुरुआत थी।
उग्रश्रवा: वर्ष बीतते गए। गंगा ने दूसरे पुत्र को जन्म दिया। शांतनु को लगा शायद इस बार गंगा का मन बदल जाए। लेकिन गंगा ने उस पुत्र को भी नदी में बहा दिया। फिर तीसरा... चौथा... पांचवां...। हस्तिनापुर की प्रजा कानाफूसी करने लगी। लोग रानी को पिशाचिनी कहने लगे।
राजा शांतनु: हे ईश्वर! यह कैसा न्याय है? सात... मेरे सात पुत्रों को उसने मेरी आँखों के सामने मार दिया। और मैं? मैं कायरों की तरह चुप खड़ा रहा। केवल उस वचन के लिए? केवल उस सुंदरता के मोह में? धिक्कार है मुझ पर! धिक्कार है मेरे पौरुष पर!
उग्रश्रवा: शांतनु अंदर से टूट चुके थे। महल की दीवारों में बच्चों की किलकारियों की जगह केवल सन्नाटा गूंजता था। और फिर... आठवें पुत्र का जन्म हुआ।
दासी: महाराज... रानी गंगा पुनः नदी तट की ओर जा रही हैं। उनकी गोद में आठवां पुत्र है।
राजा शांतनु: नहीं! अब और नहीं! सात पुत्रों की हत्या का पाप मैं अपने सिर ले चुका हूँ। लेकिन आठवें को नहीं मरने दूंगा। चाहे गंगा रहे या जाए... चाहे मेरा वचन टूटे या मेरा दिल... आज हस्तिनापुर का राजा अपने पुत्र की रक्षा करेगा!
समय: शांतनु क्रोध की ज्वाला बनकर गंगा तट पर पहुंचे। गंगा बच्चे को पानी में फेंकने ही वाली थी कि शांतनु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
राजा शांतनु: रुक जाओ गंगा! बहुत हुआ! मैं तुम्हें इस बालक की हत्या नहीं करने दूंगा!
गंगा: राजन? आपने मुझे रोका? आपने प्रश्न पूछा?
राजा शांतनु: हाँ पूछता हूँ! तुम कौन हो? तुम नागिन हो या यक्षिणी? अपने ही पुत्रों को मारकर तुम्हें क्या मिलता है? क्यों करती हो तुम यह पाप?
गंगा: पाप? राजन, आप केवल मृत्यु देख रहे हैं, मुक्ति नहीं। आपने अपना वचन तोड़ दिया है शांतनु। अब मेरे जाने का समय आ गया है। लेकिन जाने से पहले... सुनिए कि मैंने इन पुत्रों को क्यों मारा।
समय: क्या था गंगा का वह रहस्य? क्यों मार रही थी वह अपने ही पुत्रों को? और क्या होगा इस आठवें पुत्र का, जो मृत्यु के मुख से बच गया है?
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