शिशु प्रताप जी का बचपन कुम्भलगढ़ की चट्टानों के बीच बीता। यह कोई साधारण महल नहीं था। यह एक दुर्ग था — ऊँचा, अभेद्य, और हर ओर सैन्य व्यवस्था से घिरा हुआ। जिस आँगन में वे खेलते थे, उसके पीछे पहरेदारों की बंदूक़ें खड़ी रहती थीं। जो दीवारें उन्हें घेरती थीं, उनके पीछे सदियों के युद्धों के निशान थे। ऐसे वातावरण में पले हुए बालक के मन में बचपन से ही एक बात बैठ गई — जीवन सहज नहीं है। राजपूत बालक होने का अर्थ है — हर साँस के साथ एक प्रतिज्ञा।
जयवंता बाई जी अपने पुत्र को अधिकतर समय स्वयं संभालती थीं। वे चाहती थीं कि प्रताप किसी अन्य के हाथों में पलकर न बढ़ें। माँ की गोद ही पहली पाठशाला थी। वे उन्हें अपने पीहर पाली की कथाएँ सुनाती थीं — सोंगारा चौहान कुल की वीरता, अपने पिता रावत अखैराज जी की युद्धकलाएँ। वे कहतीं — "बेटा, जब बाहर शत्रु खड़ा हो, तब घर में रोना नहीं चाहिए। बाहर लड़ना चाहिए।"
जब प्रताप जी पाँच वर्ष के हुए, तब उनकी विधिवत शिक्षा आरंभ हुई। राजपूत परंपरा के अनुसार पहली कला होती है — घुड़सवारी। उन्हें एक छोटे टट्टू पर बिठाया गया। पहले-पहल वे गिर पड़ते थे। पर वे रोते नहीं थे। उठते थे, धूल झाड़ते थे, और फिर से चढ़ जाते थे। उनके प्रशिक्षक एक बूढ़े सरदार थे, जिन्होंने राणा साँगा जी की सेना में भी सेवा की थी। वे प्रताप जी की हिम्मत देखकर मुस्कुराते। एक दिन उन्होंने जयवंता बाई जी से कहा — "माँ साहिबा, यह बालक टट्टू पर नहीं — साँगा जी की सेना में बैठा हुआ है।"
घुड़सवारी के साथ-साथ तलवारबाज़ी आरंभ हुई। पहले लकड़ी की तलवारें। फिर हल्की लोहे की। अंत में पूर्ण लंबाई की तलवार जो कमर तक आती थी। प्रताप जी की कलाई इतनी मज़बूत होती गई कि सात-आठ वर्ष की आयु में ही वे एक वयस्क की तरह तलवार चला सकते थे।
धनुर्विद्या में उनकी विशेष रुचि थी। अरावली के पहाड़ों पर वे अपने प्रशिक्षकों के साथ निकल जाते। दूर एक पेड़ पर निशाना बाँधा जाता। पहले बीस गज़, फिर चालीस, फिर साठ। प्रताप जी हर बार निशाने पर पहुँच जाते। उनकी आँखें बहुत स्थिर थीं। निशाना साधते समय वे साँस तक नहीं लेते थे।
एक दिन — वे लगभग दस वर्ष के थे — एक तेंदुआ पास के एक गाँव की भेड़ें मार रहा था। ग्रामीण मदद माँगने राणा उदयसिंह जी के पास आए। राणा ने पुछा — "प्रताप, क्या तुम चलोगे?" प्रताप जी ने तुरंत हाँ कही। पिता ने उन्हें अपने साथ लिया। पाँच घुड़सवार साथ चले। तेंदुआ एक चट्टान के पीछे छुपा था। प्रताप जी ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया। पिता एक ओर खड़े हुए, तीन सरदार दूसरी ओर। तेंदुआ बाहर निकला। प्रताप जी की एकमात्र बाण ने उसे रोक दिया।
उस दिन गाँव वाले कह रहे थे — "मेवाड़ को अपना नया राणा मिल गया।"
राणा उदयसिंह जी ने अपने पुत्र की ओर देखा। उनकी आँखों में गर्व था, पर साथ ही एक भारी चिंता भी थी। वे जानते थे कि जिस मेवाड़ का बोझ इस बालक के कंधों पर आने वाला है, वह सरल नहीं। चित्तौड़गढ़ के चारों ओर शत्रुओं का घेरा बढ़ रहा था। दिल्ली में बैठा अकबर तेज़ी से अपना साम्राज्य फैला रहा था। एक-एक करके राजपूताने के राजा अकबर की अधीनता स्वीकार कर रहे थे — कोई वैवाहिक संबंध जोड़कर, कोई कर देकर, कोई दरबार में बैठकर। केवल कुछ ही गिने-चुने राज्य थे जो अब तक झुके नहीं थे। मेवाड़ उन्हीं में से एक था।
संध्या के समय जब राजमहल के दीप जलते — और परिवार एक साथ भोजन के लिए बैठता — तब राणा उदयसिंह जी अक्सर अपने पुत्र को पास बिठाते थे। वे राजपूत परंपरा की बातें करते। बप्पा रावल जी से लेकर साँगा जी तक की कथाएँ। पर सबसे अधिक वे एक बात पर बल देते।
"प्रताप, सिसोदिया वंश का एक नियम है। हम किसी के सामने सिर नहीं झुकाते — सिवाय अपने इष्टदेव और अपनी माँ के। यह नियम बप्पा रावल जी ने बनाया था। साँगा जी ने इसे निभाया। हमीर जी ने इसे जीवित रखा। और तुम — एक दिन यह नियम तुम्हारे हाथ में आएगा। उस दिन तुम्हें एक चुनाव करना पड़ेगा। आसान या कठिन। मार्ग जो तुम्हें ले चले, चुनाव तुम्हारा होगा। पर एक बात याद रखना — सिसोदिया कभी झुका नहीं है। इस वंश में जो झुक गया, वह सिसोदिया रहा ही नहीं।"
बालक प्रताप जी सुनते रहते। वे कुछ कहते नहीं थे। पर उनकी आँखों की चमक से पिता समझ जाते थे — संदेश पहुँच गया है।
उन्हीं दिनों उनके भाई-बहनों का जन्म होने लगा। बालक शक्ति सिंह, जगमाल, सागर सिंह — और पुत्रियाँ। राजमहल में बच्चों की हँसी गूँजने लगी। पर सब बच्चों में प्रताप जी सबसे बड़े थे। और सबसे शांत भी। वे शक्ति सिंह जी से दो वर्ष बड़े थे। दोनों भाइयों में एक अजीब-सा संबंध था — कभी मित्र, कभी प्रतिद्वंद्वी। यह संबंध आगे चलकर एक कथा बनने वाला था। पर बचपन में अधिकतर वे एक-दूसरे के साथ ही रहते।
शिक्षा में संस्कृत भी थी। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत के अंश। राम और कृष्ण की कथाएँ। पर साथ-साथ चाणक्य का अर्थशास्त्र भी। एक राजपूत राजकुमार को केवल तलवार ही नहीं — कूटनीति भी आनी चाहिए। प्रताप जी कूटनीति की बातें ध्यान से सुनते। चाणक्य के सूत्र — मित्र-शत्रु का विश्लेषण, राज्य की चार नीतियाँ — साम, दाम, दंड, भेद। कब किसका प्रयोग हो।
एक दिन गुरु ने पूछा — "कुमार, यदि शत्रु अति बलवान हो, तो क्या करना चाहिए?"
प्रताप जी ने उत्तर दिया — "गुरुदेव, चाणक्य कहते हैं — समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। पर मेरे मन से एक बात कहूँ — शत्रु यदि अति बलवान भी हो, और हमारे सिद्धांतों पर आक्रमण कर रहा हो, तो प्रतीक्षा नहीं — मुक़ाबला करना चाहिए। चाहे परिणाम कुछ भी हो।"
गुरु एक क्षण रुक गए। फिर बोले — "कुमार, यह उत्तर चाणक्य का नहीं है। यह आपका है। और एक दिन मेवाड़ इसी उत्तर पर खड़ा होगा।"
दूर खिड़की के बाहर — कुम्भलगढ़ की चट्टानों पर — सूरज ढल रहा था। और बालक प्रताप जी अपने भविष्य की ओर — एक-एक क़दम — बढ़ रहे थे।
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