राजस्थान के अरावली पर्वतों के बीच, जहाँ चट्टानें आसमान को छूती हैं और नीचे की घाटियों में बादल अक्सर ठहर जाते हैं — वहाँ एक प्राचीन दुर्ग खड़ा है। उसका नाम है कुम्भलगढ़। मेवाड़ के राणा कुम्भा ने पंद्रहवीं शताब्दी में इस दुर्ग को बनवाया था। इसकी प्राचीर इतनी लंबी है कि कहते हैं — दुनिया में चीन की दीवार के बाद यह दूसरी सबसे लंबी प्राचीर है। पैंतीस किलोमीटर से अधिक लंबी, बारह फ़ीट से अधिक चौड़ी।
9 मई 1540 के दिन इसी कुम्भलगढ़ के एक भीतरी कक्ष में एक नवजात शिशु ने पहली साँस ली। बाहर अरावली पर ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर थी। पर भीतर — दीपों की मंद रोशनी में — एक माँ की गोद में एक बच्चा रो रहा था। माँ का नाम था जयवंता बाई जी। पिता थे मेवाड़ के राणा उदयसिंह जी।
उस समय मेवाड़ की स्थिति ठीक नहीं थी। चित्तौड़गढ़ — जो सदियों से सिसोदिया वंश की राजधानी रहा था — अनेक संकटों से गुज़र चुका था। राणा साँगा जी की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के झगड़े हुए थे। राणा उदयसिंह जी का बचपन स्वयं एक भयावह कथा था। उनके चाचा बनवीर ने सिंहासन पाने के लिए साँगा जी के एक पुत्र की हत्या कर दी थी, और बालक उदयसिंह जी को भी मारने आ रहे थे। उस रात पन्नाधाय जी ने अपने ही पुत्र चन्दन को राजकुमार के पालने में लिटाकर — और उदयसिंह जी को एक टोकरी में छुपाकर — बाहर निकाला था। पन्नाधाय जी ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ की वंशरेखा बचाई थी।
वह बच्चा बड़ा होकर आज मेवाड़ का राणा था। और आज उन्हीं के पहले पुत्र का जन्म हुआ था।
जयवंता बाई जी पाली नगर के रावत अखैराज सोंगारा जी की पुत्री थीं। सोंगारा चौहान कुल — राजपूताने के सबसे प्रतिष्ठित कुलों में से एक। पाली से जब वे ब्याहकर मेवाड़ आई थीं, तब अपने साथ एक बात ले आई थीं — सादगी, साहस, और मातृभूमि के प्रति निष्ठा। यही तीन गुण उन्होंने अपने पुत्र को सबसे पहले दिए।
नवजात के जन्म के समाचार से पूरा कुम्भलगढ़ हर्षित हो उठा। राणा उदयसिंह जी ने अपने सेवकों को बुलाकर भोज की व्यवस्था करवाई। महल के द्वार पर ढोल बजे। मंदिरों में आरती हुई। ब्राह्मणों ने नवजात के लिए मंगल-स्तोत्र पढ़े।
कुछ दिनों बाद नामकरण की सभा बैठी। कुलगुरु ने जन्म-पत्रिका पर विचार किया। उन्होंने राणा से कहा — "यह बालक साधारण नहीं। इनके ग्रहों में मेवाड़ के भविष्य की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा लिखी है। पर इनके सूर्य में वह तेज है जो बादलों के बीच भी लुप्त नहीं होता।"
राणा उदयसिंह जी ने एक क्षण रुककर सोचा। फिर कहा — "इनका नाम होगा प्रताप। प्रताप सिंह।"
उपस्थित सभी सरदारों ने सिर झुकाकर सहमति दी। प्रताप — जिसका अर्थ है तेज, गरिमा, ऐसी शक्ति जो दूसरों के मन में आदर और भय दोनों जगाए। एक ऐसा शब्द जो भविष्य में मेवाड़ की पहचान बन जाने वाला था।
शिशु प्रताप जी पालने में सोते थे, और जयवंता बाई जी उन्हें अपने हाथों से लोरियाँ गाती थीं। पर ये लोरियाँ केवल लोरियाँ नहीं थीं। इनमें मेवाड़ की कथाएँ थीं। बप्पा रावल जी ने आठवीं शताब्दी में जिस सूर्यवंशी राज्य की नींव रखी थी, उसकी कथा। राणा हमीर जी ने जिस दृढ़ता से चित्तौड़ को मुसलमान सेनाओं से वापस लिया था, उसकी कथा। राणा कुम्भा जी ने इन्हीं अरावली पर्वतों पर बत्तीस से अधिक दुर्ग बनवाए थे — उनकी कथा। और राणा साँगा जी, जिनके शरीर पर अस्सी से अधिक घाव थे — एक आँख खो चुकी थी, एक हाथ कट चुका था, एक पैर टूट चुका था — फिर भी जो जीवन भर युद्ध करते रहे — उनकी कथा।
"बेटा प्रताप," जयवंता बाई जी अपने नवजात के कान में धीरे-धीरे कहती थीं, "तुम इन सबके वंशज हो। तुम्हारी रगों में बप्पा रावल जी का रक्त है। तुम्हारे माथे पर साँगा जी का तेज है। यह मेवाड़ — यह एक राज्य नहीं है, बेटा। यह एक प्रतिज्ञा है। और एक दिन यह प्रतिज्ञा तुम्हारे कंधों पर आएगी।"
शिशु कुछ नहीं समझता था। पर उसकी आँखें खुली होती थीं। और जो शब्द माँ के होंठों से निकलते थे, वे सुनाई पड़ते थे।
दिल्ली से लगभग सात सौ कोस दूर — उन्हीं दिनों — एक और बालक बढ़ रहा था। उसका नाम था जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर। आयु में प्रताप जी से लगभग दो वर्ष छोटा। हुमायूँ का पुत्र, बाबर का पौत्र। उसके सामने एक बिखरा हुआ साम्राज्य था, और उसकी आँखों में उसे फिर से एकजुट करने का सपना। आगे चलकर इन दो बालकों के मार्ग एक-दूसरे से ऐसे टकराने वाले थे, जैसे अरावली की दो चट्टानें टकराती हैं — एक ज़ोरदार स्फुलिंग के साथ। पर उस दिन कुम्भलगढ़ में किसी को इस बात का अनुमान नहीं था।
शिशु प्रताप जी सोते रहे। माता जयवंता बाई जी उनके माथे पर हाथ फेरती रहीं। बाहर अरावली की चट्टानों पर सूरज ढल रहा था। और दूर — चित्तौड़गढ़ की बुर्जों पर — मेवाड़ का ध्वज शाम की हवा में हल्के-से लहरा रहा था। एक नई पीढ़ी आ चुकी थी।
उस ध्वज को आने वाले वर्षों में कितने तूफ़ान झेलने थे — यह उस दिन कोई नहीं जानता था। पर एक बात तय थी — मेवाड़ के पास अब अपना नया राणा आ गया था। और इस राणा का नाम था — महाराणा प्रताप।
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