1 जन्म और कुम्भलगढ़ FREE 2 राजपूत बचपन और प्रशिक्षण FREE 3 मेवाड़ का संकट और चित्तौड़ का संघर्ष FREE 4 चित्तौड़ का तीसरा साका FREE 5 उदयपुर की स्थापना और राणा उदयसिंह जी का अंत FREE 6 राज्याभिषेक की पूर्णता और प्रथम आदेश FREE 7 जगमाल का पलायन और शक्ति सिंह का प्रसंग FREE 8 पहला दूत — जलाल ख़ान कोरची FREE 9 कुँवर मानसिंह की भेंट FREE 10 राजा भगवानदास और टोडरमल — चारों दूत असफल FREE 11 युद्ध की तैयारी — सेना, क़िले, रसद FREE 12 हल्दीघाटी से पहले की रात FREE 13 हल्दीघाटी का युद्ध — प्रथम पहर FREE 14 मानसिंह से सीधी टक्कर FREE 15 चेतक का बलिदान और शक्ति सिंह की वापसी FREE 16 झाला मन्ना का त्याग FREE 17 पहाड़ों में शरण और परिवार के दिन FREE 18 जंगल का जीवन और घास की रोटी FREE 19 भामाशाह का दान FREE 20 अकबर के निरंतर आक्रमण और गुरिल्ला रणनीति FREE 21 दीवेर का युद्ध FREE 22 चावंड — नई राजधानी का जन्म FREE 23 अमरसिंह जी का उदय FREE 24 पारिवारिक जीवन — रानियाँ और संतानें FREE 25 जनसामान्य का प्रेम FREE 26 अकबर का अंतिम प्रयास FREE 27 अंतिम वर्षों का संघर्ष FREE 28 चावंड में अंतिम शिविर FREE 29 19 जनवरी 1597 — देहावसान FREE 30 विरासत — एक नाम जो अमर रहा FREE
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मेवाड़ का संकट और चित्तौड़ का संघर्ष

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प्रताप जी जब बारह वर्ष के हुए, तब तक मेवाड़ की स्थिति और भी जटिल हो चुकी थी। उत्तर में अकबर का साम्राज्य अब एक नवजात राज्य नहीं — एक उभरती हुई शक्ति था। 1556 में पानीपत के दूसरे युद्ध में हेमचन्द्र विक्रमादित्य की पराजय के बाद अकबर का सिंहासन स्थिर हो चुका था। पंजाब, दिल्ली, आगरा, लाहौर — एक के बाद एक प्रदेश उसकी छाया में आ रहे थे। और अकबर के पास एक स्पष्ट योजना थी — पूरे उत्तर भारत को मुग़ल साम्राज्य के अंतर्गत लाना।

उसने एक नीति बनाई। हर राजपूत राजा को दो विकल्प दिए — पहला, अधीनता स्वीकार करो। मुग़ल दरबार में बैठो। अपनी पुत्री का विवाह मुग़ल राजवंश में करो। बदले में अपना राज्य भी रखो, सम्मान भी पाओ। दूसरा, मुक़ाबला करो — और मिटा दिए जाओ।

आश्चर्य की बात नहीं कि अधिकांश राजपूत राजाओं ने पहला विकल्प चुना। आमेर के राजा भारमल जी ने 1562 में अपनी पुत्री का विवाह अकबर से कर दिया। जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह जी (मारवाड़ — हमारे मेवाड़ के राणा से अलग व्यक्ति) ने भी ऐसा ही किया। मुख्य रजवाड़े धीरे-धीरे मुग़ल छत्र के नीचे आ गए।

केवल कुछ ही राज्य अब तक झुके नहीं थे। मेवाड़ — सिसोदिया वंश का यह राज्य — सबसे अग्रणी था। राणा उदयसिंह जी के पास अकबर की ओर से कई बार दूत आ चुके थे। हर बार उत्तर एक ही था — "हमारे वंश की परंपरा है — हम विदेशी सत्ता के अधीन नहीं रहते। हम अपनी पुत्री का विवाह दिल्ली नहीं भेजते।"

अकबर ने ध्यान दिया। उसने सोचा — यदि मेवाड़ झुक जाए, तो शेष भारत स्वयं ही झुकेगा। मेवाड़ — सिसोदिया का गौरव — राजपूताने का प्राण। यदि यह टूटे, तो शेष कुछ नहीं बचेगा।

1567 के अंत में संदेश आया। अकबर स्वयं अपनी विशाल सेना लेकर दिल्ली से चित्तौड़गढ़ की ओर चल पड़ा है।

उस समय प्रताप जी सत्ताईस वर्ष के थे। वे अब बालक नहीं रहे थे। वे एक युवा राजकुमार थे — कद ऊँचा, कंधे चौड़े, आँखें तीक्ष्ण। मेवाड़ के सरदारों के बीच उनका सम्मान बढ़ चुका था। वे राणा उदयसिंह जी के साथ राज्य के निर्णयों में भाग लेते थे।

जब अकबर के आक्रमण की ख़बर आई — मेवाड़ के दरबार में एक भारी सभा बैठी।

राणा उदयसिंह जी एक अनुभवी राजा थे, पर वे एक बात जानते थे। चित्तौड़गढ़ की एक सीमा है। चाहे यह कितना भी दुर्भेद्य दुर्ग क्यों न हो, यदि एक विशाल सेना घेरा डाल दे — तो भोजन और जल की कमी से एक न एक दिन यह दुर्ग गिरेगा। पहले अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1303 में चित्तौड़ घेरा था। फिर बहादुरशाह गुजरात के सुल्तान ने 1535 में। दोनों बार चित्तौड़ ने अपना तीसरा साका — सर्वोच्च बलिदान — देखा था।

राणा ने अपने सरदारों से परामर्श किया। एक भारी निर्णय लिया गया।

"मैं स्वयं चित्तौड़ नहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "यदि मैं रहा, और मुझे कुछ हुआ — तो मेवाड़ का वंश ही समाप्त हो जाएगा। मैं पहाड़ों में पीछे हटूँगा। चित्तौड़ की रक्षा हमारे श्रेष्ठ सरदार करेंगे। मेवाड़ इस दुर्ग के पत्थरों में नहीं — इसकी आत्मा में बसता है। पत्थर गिरें — आत्मा जीवित रहे।"

यह निर्णय सुनकर कुछ सरदारों को आश्चर्य हुआ। पर अनुभवी सरदार समझ गए। राणा का तर्क सही था। राजवंश का संरक्षण सर्वोपरि है।

राणा ने जयमल मेड़तिया जी और पत्ता सिसोदिया जी — दोनों श्रेष्ठ राजपूत वीरों — को चित्तौड़ की रक्षा का भार सौंपा। आठ हज़ार राजपूत सैनिक उनके साथ थे। राणा स्वयं अपने परिवार और प्रमुख सरदारों के साथ अरावली के पहाड़ों में पीछे हट गए।

यह निर्णय लेना सरल नहीं था। राजवंश के लिए चित्तौड़गढ़ केवल एक दुर्ग नहीं था — यह आत्मा का स्थान था। यहाँ रानी पद्मिनी जी का जौहर हुआ था। यहाँ राणा साँगा जी ने राज्य चलाया था। यहाँ हर एक चट्टान में सदियों के संघर्ष का इतिहास था।

प्रताप जी अपने पिता के साथ पहाड़ों में आए। उनके मन में एक तूफ़ान चल रहा था। वे चाहते थे — चित्तौड़ में रहूँ, स्वयं युद्ध करूँ। पर उनके पिता ने उन्हें समझाया।

"बेटा, तुम मेवाड़ का भविष्य हो। यदि तुम चित्तौड़ में रहे, और तुम्हें कुछ हुआ — तो मेवाड़ की पीढ़ी टूट जाएगी। तुम्हें जीवित रहना है। यह केवल अपने लिए नहीं — पूरे वंश के लिए कर्तव्य है।"

प्रताप जी ने सिर झुकाकर पिता का आदेश माना। पर मन में उन्होंने एक प्रतिज्ञा की। उन्होंने कहा — "पिताजी, आज मैं चित्तौड़ की रक्षा नहीं कर सका। पर एक दिन मेवाड़ का प्रत्येक क़िला हम वापस लेंगे। और जो दिन वह आएगा — मैं वह दिन देखकर ही सोऊँगा।"

राणा उदयसिंह जी ने अपने पुत्र की आँखों में देखा। वहाँ कोई बच्चा नहीं था। एक राजपूत खड़ा था। वे चुप रहे। पर मन में उन्हें संतोष हुआ कि मेवाड़ की प्रतिज्ञा अगली पीढ़ी के सीने में जीवित है।

उधर अकबर अपनी विशाल सेना के साथ चित्तौड़ के पास आ चुका था। उसके पास साठ हज़ार सैनिक थे। बंदूक़ें, तोपें, घुड़सवार। सबसे विशाल मुग़ल तोप — "नेहर" — को बैलगाड़ियों पर लादकर लाया गया था। अकबर के सेनापति आसफ़ ख़ान, क़ासिम ख़ान — सब अनुभवी थे। पास में जयमल जी और पत्ता जी थे — आठ हज़ार राजपूत सैनिकों के साथ।

संख्या में आठ बनाम साठ — यह अनुपात भयानक था। पर मेवाड़ के राजपूत संख्या नहीं गिनते थे। वे केवल कर्तव्य गिनते थे।

22 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ का घेरा आरंभ किया। चार महीनों तक यह घेरा चलने वाला था। और जो होने वाला था, वह मेवाड़ के इतिहास का सबसे रक्तरंजित अध्याय था। चित्तौड़ का तीसरा साका। और उस घटना ने प्रताप जी के मन में एक ऐसी आग जलाई — जो उनके अंतिम दिन तक बुझी नहीं।

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