एक रहस्य है — इतना सरल कि सदियों तक मनुष्य उसके पास से गुज़रता रहा, और इतना गहरा कि जिसने इसे जान लिया, उसका जीवन वहाँ नहीं रहा जहाँ था।
यह रहस्य कोई जादू नहीं है। न ही किसी पुराने ग्रंथ में बंद कोई गुप्त मंत्र। यह उस नियम का नाम है जो उसी तरह काम करता है जैसे गुरुत्वाकर्षण — चुपचाप, निरपेक्ष, हर क्षण। पत्थर ज़मीन पर गिरता है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण उसे खींचता है। आपके जीवन में जो आता है, वह आता है क्योंकि एक और नियम — आकर्षण का नियम — उसे आपकी ओर खींचता है। यह नियम उन लोगों पर भी लागू होता है जो इसे जानते हैं, और उन पर भी जो नहीं जानते। फ़र्क़ केवल यह है कि जानने वाला इसे चुनकर इस्तेमाल करता है, जबकि न जानने वाला इसके सामने आँखें मूँदकर खड़ा रहता है और शिकायत करता है कि जीवन उसके साथ अन्याय कर रहा है।
बीसवीं सदी के आरम्भ में, जब बिजली अभी नई थी और रेडियो की कल्पना भी विरल थी, अमेरिका के एक लेखक वॉलेस वॉटल्स ने एक छोटी-सी पुस्तक लिखी — "द साइंस ऑफ़ गेटिंग रिच।" उसने उसमें यह बात कही कि समृद्धि कोई संयोग नहीं, कोई विज्ञान है — और उसके निश्चित नियम हैं। उसी समय एक और लेखक चार्ल्स हानेल ने "द मास्टर की सिस्टम" में मन की तरंगों और उसकी रचनात्मक शक्ति पर लिखा। जेम्स एलन ने कहा, "एक मनुष्य वही बनता है जो वह सोचता है।" इन सब लेखकों ने अलग-अलग शब्दों में एक ही बात कही — आपका भीतर जैसा होगा, आपका बाहर वैसा ही बन जाएगा।
पर यह कोई पश्चिमी खोज नहीं थी। हज़ारों साल पहले उपनिषदों ने यही कहा था — "यथा दृष्टि तथा सृष्टि।" जैसी आपकी दृष्टि होगी, वैसी ही आपकी सृष्टि होगी। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा, "मनुष्य जिस भाव से जिस वस्तु का चिंतन करता है, अंत में वही प्राप्त करता है।" पतंजलि के योगसूत्रों में भी मन की एकाग्रता और संकल्प की शक्ति का बार-बार उल्लेख आता है। कह सकते हैं कि भारत यह रहस्य पहले से जानता था, बस उसे "रहस्य" नहीं कहता था — उसे जीवन का सहज सिद्धांत मानता था।
तो फिर यह "रहस्य" कैसे बना? रहस्य इसलिए कि अधिकांश लोगों को यह सिखाया ही नहीं गया। बच्चों को विद्यालय में गणित, इतिहास, विज्ञान सिखाया जाता है, पर यह कभी नहीं सिखाया जाता कि उनके विचार किस तरह उनकी परिस्थितियाँ बना रहे हैं। कोई शिक्षक यह नहीं बताता कि भीतर का असंतोष बाहर की कमी को बुला रहा है, या भीतर की कृतज्ञता बाहर की समृद्धि को आमंत्रित कर रही है। इसीलिए जब कोई व्यक्ति इस नियम से पहली बार परिचित होता है, उसे लगता है मानो उसके हाथ में कोई गुप्त चाबी आ गई हो।
रहस्य का आधार बहुत सरल है — आप जिस आवृत्ति पर अपने भीतर हैं, उसी आवृत्ति की चीज़ें, लोग, अवसर और परिस्थितियाँ आपकी ओर खिंचकर आती हैं। यदि भीतर भय है, तो जीवन में ऐसी घटनाएँ घटित होंगी जो भय को सही ठहराएँगी। यदि भीतर आत्मविश्वास है, तो जीवन ऐसे अवसर लाएगा जो उस आत्मविश्वास को और मज़बूत करेंगे। यह कोई दार्शनिक कल्पना नहीं — हर व्यक्ति अपने जीवन में इसे देख सकता है, बशर्ते वह ईमानदारी से देखे।
लेकिन एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है — यदि यह नियम इतना सरल है, तो लोग इससे लाभ क्यों नहीं उठा पाते? उत्तर भी उतना ही सरल है। पहला कारण — अधिकांश लोग सोचते हैं कि वे जो चाहते हैं उसके बारे में सोच रहे हैं, परन्तु वास्तव में वे उसके अभाव के बारे में सोच रहे हैं। "मुझे धन चाहिए" और "मेरे पास धन नहीं है" — दोनों वाक्य अलग-अलग आवृत्तियाँ हैं। पहला आपको धन की ओर ले जाता है, दूसरा अभाव को और गहरा करता है। दूसरा कारण — लोग यह नहीं समझते कि भावना ही असली ईंधन है। केवल विचार से कुछ नहीं होता; जब तक उसके साथ अनुरूप भावना न जुड़े, ब्रह्मांड को आपका संकेत स्पष्ट ही नहीं होता।
इस पुस्तक की यात्रा तीस अध्यायों में फैली है। पहले अध्यायों में हम नियम को समझेंगे — मन कैसे एक चुम्बक की तरह काम करता है, विचार कैसे वस्तुओं में बदलते हैं, भावनाओं की तरंगें क्यों इतनी निर्णायक हैं। फिर तीन व्यावहारिक चरणों पर आएँगे — माँगना, विश्वास करना, ग्रहण करना। आगे कृतज्ञता, दृश्यांकन, और पुष्टिवचनों की भूमिका देखेंगे। बीच के अध्यायों में जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों — स्वास्थ्य, धन, संबंध, करियर — पर इसका अनुप्रयोग समझेंगे। अंत के अध्याय भारतीय दर्शन की दृष्टि, सामान्य गलतियों, दैनिक अभ्यास, और परिवर्तन की कथाओं के लिए समर्पित हैं।
एक चेतावनी आरम्भ में ही दे देना उचित है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं है जो शॉर्टकट ढूँढ़ रहे हैं। आकर्षण का नियम आलस्य को सम्पन्नता में नहीं बदलता। यह उस अनुशासन का साथी है जो भीतर से शुरू होता है — स्वयं के विचारों को देखने का अनुशासन, अपनी भावनाओं को चुनने का अनुशासन, और कार्य करते समय भीतर की उस उत्साही ध्वनि को बनाए रखने का अनुशासन जो ब्रह्मांड को संकेत देती है — "मैं तैयार हूँ, अब आप मुझे वह दीजिए जो मैंने माँगा है।"
जो पाठक यह अनुशासन साधने को तैयार है, उसके लिए यह पुस्तक एक मानचित्र है। मानचित्र चलकर मंज़िल तक नहीं ले जाता; वह तो केवल दिशा बताता है। चलना तो आपको ही पड़ेगा। पर एक भरोसा रखिए — हर कदम पर वह नियम आपके साथ चल रहा है जो कभी विश्राम नहीं लेता, कभी पक्षपात नहीं करता, और कभी विफल नहीं होता। उस नियम का नाम है — आकर्षण का सनातन नियम। और उसकी पहली शर्त यही है कि आप सोचना शुरू करें — जान-बूझकर, होशपूर्वक, और निडर होकर।
रहस्य का द्वार खुल चुका है। भीतर आइए।
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