विचार वस्तुएँ बनते हैं — यह वाक्य पढ़ने में काव्यात्मक लगता है, परन्तु यह उतना ही ठोस है जितना यह कि बीज से पेड़ बनता है।
बीज और पेड़ का सम्बन्ध हम सब जानते हैं, क्योंकि वह आँखों से दिखता है। आम की गुठली ज़मीन में डालिए, पानी दीजिए, धूप मिले, और बीस-पच्चीस वर्षों में वह विशाल वृक्ष बन जाता है जिसकी छाया में दर्जनों लोग बैठ सकते हैं। पर वह वृक्ष कहाँ था बीस वर्ष पहले? एक नन्ही गुठली में, इतना सूक्ष्म कि उसे तौलने के लिए हमारी तराज़ू पर्याप्त नहीं। फिर भी वह सम्पूर्ण वृक्ष का सम्पूर्ण नक्शा अपने भीतर लिए हुए था।
विचार भी उसी प्रकार का बीज है। फ़र्क़ केवल इतना है कि वह आँखों से नहीं दिखता, इसलिए हम उसे महत्व नहीं देते। पर सूक्ष्मता कमज़ोरी नहीं है — परमाणु आँखों से नहीं दिखता, फिर भी सूर्य की समस्त ऊर्जा उसी की क्रिया से आती है। विचार भी सूक्ष्म है, पर शक्तिशाली है। हर भौतिक वस्तु जो इस संसार में बनी, पहले किसी के मन में विचार के रूप में जन्मी।
जो कुर्सी पर आप बैठे हैं — वह पहले एक बढ़ई के मन में विचार थी। जो घर आप देख रहे हैं — वह पहले एक स्थपति के मानस में रेखा-चित्र था। जो मोबाइल आपके हाथ में है — वह पहले किसी इंजीनियर के विचार में आकार ले चुका था। यहाँ तक कि भारत का संविधान — जिसमें इस देश के एक सौ चालीस करोड़ नागरिकों के अधिकार लिखे हैं — वह भी पहले डॉ. अम्बेडकर और संविधान सभा के सदस्यों के मन में विचार के रूप में था। हर पुस्तक, हर कविता, हर मंदिर, हर पुल, हर खोज — पहले विचार थी, बाद में वस्तु।
इस सत्य का दूसरा पक्ष भी सत्य है। जो भी विचार आप अपने मन में बार-बार पालते हैं, वह अंततः आपके जीवन में किसी न किसी रूप में प्रकट होता है। यदि वर्षों तक आप अपने आप को असफल मानते रहे, तो असफलता प्रकट होती जाएगी। यदि वर्षों तक आप किसी कौशल पर ध्यान केंद्रित किए रहे, तो वह कौशल फलता-फूलता जाएगा। मन के बीज भी फसल देते हैं, बस उनकी फसल "विचार" नहीं, "परिस्थिति" होती है।
प्रक्रिया कैसे काम करती है? तीन चरणों में।
पहला चरण — मानसिक चित्र का निर्माण। आप मन में किसी वस्तु, स्थिति या अनुभव की कल्पना करते हैं। यह कल्पना जितनी स्पष्ट, जितनी सजीव, जितनी रंगीन होगी, उतनी ही उसकी ऊर्जा होगी। एक धुंधली कल्पना हल्के संकेत भेजती है; एक स्पष्ट कल्पना तीव्र संकेत।
दूसरा चरण — भावना का जुड़ाव। केवल कल्पना ईंधन नहीं है। ईंधन वह भावना है जो उस कल्पना के साथ जुड़ी होती है। यदि आप अपनी मनचाही नौकरी की कल्पना कर रहे हैं, परन्तु भीतर डर है कि "मिलेगी नहीं," तो आप दो विरोधी संकेत भेज रहे हैं। ब्रह्मांड के लिए दूसरा संकेत प्रबल है, क्योंकि भय की भावना कल्पना से अधिक तीव्र है। इसलिए परिणाम भय के अनुरूप आता है, कल्पना के नहीं।
तीसरा चरण — कार्य की अनुमति। एक प्रचलित भ्रम है कि आकर्षण का नियम बिना कार्य के काम करता है। यह सही नहीं है। नियम कहता है — विचार और भावना से एक कम्पन तैयार होता है; उसके अनुरूप अवसर आपके सामने आते हैं; पर उन अवसरों को पकड़ने का काम आपके हाथ में होता है। यदि बीज बोया है तो पानी भी देना है; यदि कल्पना की है तो उसकी दिशा में चलना भी है। आकर्षण नियम और कर्म नियम — दोनों एक साथ चलते हैं, विरोधी नहीं हैं।
यहाँ एक प्रश्न उठता है — सब कुछ सोचने मात्र से क्यों नहीं मिलता? आख़िर बच्चा सोचता है कि उसे चाँद चाहिए, पर चाँद नहीं मिलता। उत्तर सरल है। चाँद चाहने के साथ बच्चे का विश्वास नहीं जुड़ा कि यह संभव है, और न उसकी ओर कोई कार्य संभव है। आकर्षण उसी सीमा तक काम करता है जिस सीमा तक आपकी मानसिक व्यवस्था उसे ग्रहण करने को तैयार है। यदि आप एक बड़ी रकम चाहते हैं, परन्तु भीतर मानते हैं कि "मेरे जैसे साधारण व्यक्ति को इतना कभी नहीं मिलेगा," तो आपका अपना विश्वास द्वार बंद कर रहा है। नियम विफल नहीं हुआ; आपने ही उसे रोक दिया।
विचार से वस्तु तक की यह यात्रा कितनी लम्बी होती है? यह कई बातों पर निर्भर है — विचार की स्पष्टता, भावना की तीव्रता, अंतर्विरोधी विश्वासों की मात्रा, और वस्तु की प्रकृति। एक सहज वस्तु — जैसे एक पुस्तक का मिलना, किसी पुराने मित्र का फ़ोन आना — कुछ घंटों में भी प्रकट हो सकती है। एक बड़ी इच्छा — जैसे करियर का बड़ा बदलाव या किसी विशेष व्यक्ति से विवाह — महीनों या वर्षों भी ले सकती है। पर यह स्मरण रखिए — समय का माप ब्रह्मांड का काम है, आपका नहीं। आपका काम है बीज बोते रहना और विश्वास से सींचना।
एक अभ्यास इस अध्याय के अंत में लीजिए। आज से अगले सात दिनों तक, हर सुबह उठते ही पाँच मिनट के लिए मन में अपने भविष्य का एक स्पष्ट चित्र बनाइए। उसमें आप कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, किसके साथ हैं, कैसा महसूस कर रहे हैं — यह सब विस्तार से देखिए। चित्र के साथ आनंद की भावना जोड़िए, जैसे यह घटित हो ही चुका हो। फिर पाँच मिनट बाद चित्र छोड़कर दिन शुरू कीजिए। सात दिन तक यह नियमित रूप से कीजिए और देखिए — दिशा में क्या बदलता है।
विचार वस्तुएँ बनते हैं। यह केवल एक वाक्य नहीं, एक सिद्धांत है। और जब इसे श्रद्धा से अपनाया जाए, तो जीवन एक ऐसी कार्यशाला बन जाता है जिसमें आप ही शिल्पी हैं और आप ही सामग्री।
अगला अध्याय भावनाओं की भूमिका पर है — क्योंकि भावना ही वह तत्व है जो विचार को वस्तु के स्तर तक ले जाता है।
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