आपका मन कोई विचारों की उलझी हुई गठरी नहीं है — वह एक चुम्बक है, और उसकी हर धड़कन के साथ ब्रह्मांड कुछ न कुछ आपकी ओर भेज रहा है।
चुम्बक की एक विशेषता समझ लीजिए — वह केवल लोहे को खींचता है, मिट्टी को नहीं। उसकी क्षमता निरपेक्ष है; जो वस्तु उसकी प्रकृति से मेल खाती है, वही उसकी ओर खिंचती है। मन भी ठीक ऐसा ही काम करता है। आप जिस प्रकार के विचार और भावनाओं में रहते हैं, उसी प्रकार के अनुभव, परिस्थितियाँ और लोग आपके जीवन में बार-बार लौटकर आते हैं। यह संयोग नहीं है। यह नियम है।
आपने कई बार देखा होगा — एक व्यक्ति जिसकी हर दूसरी बात शिकायत होती है, उसके जीवन में शिकायत के कारण कभी समाप्त नहीं होते। कोई और जो हर परिस्थिति में संभावना ढूँढ़ लेता है, उसके पास संभावनाएँ चलकर आती हैं। पहले उदाहरण में चुम्बक नकारात्मकता को खींच रहा है; दूसरे में सकारात्मकता को। दोनों एक ही नियम से चल रहे हैं, बस ध्रुव अलग हैं।
प्रश्न यह उठता है — मन वास्तव में चुम्बक कैसे है? क्या यह केवल एक उपमा है, या कुछ ठोस है इसके पीछे? आधुनिक भौतिकी हमें बताती है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु — हर विचार, हर भावना, हर पदार्थ — एक विशेष आवृत्ति पर कम्पन कर रही है। आपका मस्तिष्क भी निरंतर तरंगें भेजता है — अल्फा, बीटा, गामा, थीटा, डेल्टा। ये तरंगें केवल वैज्ञानिक यंत्रों पर नहीं दिखतीं; इनका प्रभाव आपके चारों ओर के सूक्ष्म वातावरण पर पड़ता है। एक प्रसन्न व्यक्ति के पास बैठते ही आपको हल्का लगता है, और एक उदास व्यक्ति के पास बैठते ही भारीपन छाने लगता है — इसका कारण उसके मन की तरंगें हैं।
आकर्षण का नियम कहता है कि "समान समान को आकर्षित करता है।" यदि आपके भीतर भय की आवृत्ति है, तो आप ऐसी ही आवृत्ति वाले लोगों, घटनाओं और परिस्थितियों को आकर्षित करेंगे। यदि भीतर शांति है, तो शांत वातावरण आपकी ओर खिंचा चला आएगा। यह वैसा ही है जैसे रेडियो स्टेशन — आप जिस आवृत्ति पर डायल लगाएँगे, वही स्टेशन सुनाई देगा। दुनिया के सारे स्टेशन एक साथ हवा में बज रहे हैं, पर आपको वही मिलेगा जिस पर आपका डायल है।
यहाँ एक भ्रम होता है जिसे दूर करना ज़रूरी है। बहुत-से लोग सोचते हैं — "मैं तो धन चाहता हूँ, फिर मुझे धन क्यों नहीं मिल रहा?" वे यह नहीं देख पाते कि उनका भीतर का स्टेशन "धन की कमी" पर डायल है, "धन की उपस्थिति" पर नहीं। वे दिनभर सोचते हैं — "बिल कैसे चुकाऊँगा," "किराया कहाँ से आएगा," "महीने का अंत कैसे कटेगा।" इन सब विचारों की आवृत्ति "अभाव" है, "समृद्धि" नहीं। और चुम्बक अभाव को ही खींच रहा है, क्योंकि वही आवृत्ति उसके भीतर सक्रिय है।
मन के चुम्बक होने का दूसरा पहलू भी समझिए। चुम्बक चुनकर नहीं खींचता — वह स्वभाव से खींचता है। उसी तरह आपका मन भी आपके आदेशों की प्रतीक्षा नहीं करता; वह आपके स्वभाविक रूप से दोहराए गए विचारों के अनुरूप काम करता है। दिन में हम लगभग साठ हज़ार विचार सोचते हैं, और इनमें से अधिकांश वही होते हैं जो कल थे, परसों थे, और पिछले महीने थे। यही पुनरावृत्ति आदत बनती है, और यही आदत भाग्य का रूप ले लेती है।
भारतीय परंपरा में मन की इस शक्ति का गहरा वर्णन है। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में अर्जुन कहते हैं — "मन बहुत चंचल है, इसे वश में करना वायु को बाँधने जैसा कठिन है।" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — "हाँ, यह कठिन है, पर असंभव नहीं। अभ्यास और वैराग्य से इसे साधा जा सकता है।" यहाँ "साधना" का अर्थ है — मन को उस दिशा में ले जाना जिसमें आप जीवन को बहाना चाहते हैं। आकर्षण का नियम मन की इसी साधना पर खड़ा है।
एक सरल प्रयोग आज ही कीजिए। अगले चौबीस घंटों में, जब भी आप किसी व्यक्ति, घटना या वस्तु के बारे में मन में कुछ बोलें, थोड़ी देर रुककर देखिए — क्या मैं इस वस्तु की उपस्थिति की आवृत्ति में हूँ या इसके अभाव की? क्या मैं समाधान देख रहा हूँ या समस्या? क्या मेरी भावना उत्साह की है या निराशा की? यह सरल पर्यवेक्षण आपको यह दिखाएगा कि आप अनजाने में कितना समय "नकारात्मक स्टेशन" पर बिताते हैं।
पर्यवेक्षण ही पहला परिवर्तन है। जिस क्षण आप यह देखना शुरू करते हैं कि "मैं अभी क्या आकर्षित कर रहा हूँ," उसी क्षण आपकी पकड़ ढीली होने लगती है। मन का चुम्बक अब आपकी आदतों के नियंत्रण में नहीं रहा; वह आपकी जागरूकता के नियंत्रण में आने लगा है। और जागरूकता ही वह कुंजी है जो रहस्य के भीतरी कक्ष का द्वार खोलती है।
इस अध्याय का सार एक वाक्य में रखा जा सकता है — आप जो जीवन जी रहे हैं, वह आपके मन के स्थायी कम्पन का प्रतिबिम्ब है। यदि प्रतिबिम्ब बदलना है, तो दर्पण से लड़ना व्यर्थ है; मूल चेहरे को सुधारना होगा। मूल चेहरा आपका भीतरी कम्पन है — आपके विचार, आपकी भावनाएँ, आपकी कल्पनाएँ। उन्हें बदलिए, और जीवन का प्रतिबिम्ब बदले बिना नहीं रह सकता।
अगले अध्याय में हम देखेंगे कि विचार वस्तुओं में कैसे बदलते हैं — कौन-सी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक मानसिक चित्र भौतिक वास्तविकता का रूप ले लेता है। तब तक यह स्मरण रखिए — आपका मन इस क्षण भी आकर्षण का काम कर रहा है। प्रश्न केवल इतना है कि वह क्या आकर्षित कर रहा है, और क्या आप उसे जानते हुए चला रहे हैं या आदत के घोड़े पर बैठकर?
रहस्य की पहली सीढ़ी यही है — मन को चुम्बक मानिए। उसके बाद हर निर्णय बदल जाता है।
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