१८ जून १८५८ की वह तपती दोपहर — ग्वालियर के कोटा-की-सराय में एक स्त्री-योद्धा अपनी अंतिम साँस ले रही थी, और सर ह्यू रोज़ नामक अंग्रेज़ सेनापति को दशकों बाद कहना पड़ा कि "the best and bravest of the rebel leaders" अब इस संसार में नहीं रहीं.
वे कौन थीं? मात्र तीस वर्ष की एक रानी, जिन्होंने अपने पुत्र को पीठ पर बाँधकर किले से छलांग लगाई थी. एक स्त्री, जिनके लिए उनकी छोटी-सी रियासत झांसी ही प्राण थी. एक माता, जिन्होंने अपने पहले पुत्र की मृत्यु का शोक तो सहा, परंतु अपनी प्रजा को अंग्रेज़ी राज की क्रूरता के सामने झुकने नहीं दिया. और एक योद्धा, जिनका नाम लेते ही आज भी हर भारतीय हृदय में एक अद्भुत आग प्रज्वलित हो उठती है — रानी लक्ष्मीबाई.
उनका जन्म १९ नवंबर १८२८ को वाराणसी की पवित्र भूमि पर हुआ था. माता-पिता ने उन्हें "मणिकर्णिका" नाम दिया, परंतु घर के लोग प्यार से उन्हें "मनु" कहकर पुकारते थे. पिता मोरोपंत ताम्बे पेशवा बाजीराव द्वितीय के सलाहकार थे, और जब पेशवा को अंग्रेज़ों ने बिठूर भेज दिया, तब मनु भी पिता के साथ बिठूर के विशाल वाड़े में पहुँच गईं. वहीं उन्होंने नाना साहेब, राव साहेब और तात्या टोपे जैसे बाल-साथियों के साथ अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा. वहीं उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और धनुर्विद्या में महारत पाई. और वहीं से वह बीज पड़ा, जो आगे चलकर भारत की पहली स्वातंत्र्य-ज्वाला का रूप लेने वाला था.
१८४२ में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ. विवाह के बाद मराठा परंपरा के अनुसार उनका नाम बदलकर "लक्ष्मीबाई" रखा गया. झांसी का राजमहल एक नये जीवन का साक्षी बना. कुछ ही वर्षों में पुत्र दामोदर का जन्म हुआ — परंतु यह सुख क्षणिक रहा. बालक मात्र चार महीने में ही चल बसा. हृदय-विदारक उस क्षण में भी रानी ने अपना धैर्य नहीं खोया. कुछ समय बाद उन्होंने आनंदराव नामक एक सम्बंधी के पुत्र को गोद लिया, और उसका नाम भी "दामोदर राव" रखा. परंतु यहाँ नियति ने एक और चोट दी — २१ नवंबर १८५३ को महाराजा गंगाधर राव का देहांत हो गया.
तभी अंग्रेज़ी राज की वह काली चाल सामने आई जिसे इतिहास "Doctrine of Lapse" के नाम से जानता है. लॉर्ड डलहौज़ी ने फ़रमान जारी किया — चूँकि महाराजा का अपना जन्मा पुत्र नहीं है, इसलिए झांसी की रियासत अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला ली जाएगी. जब अंग्रेज़ अधिकारी यह आदेश सुनाने राजमहल में आए, तब लक्ष्मीबाई की ज़ुबान से वे चार शब्द निकले जो आज भी इतिहास के पन्नों पर अमर हैं — "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी." यह केवल एक रानी का गर्जन नहीं था, यह एक राष्ट्र की पहली ललकार थी.
१८५७ का वह सावन आया, जब मेरठ की चिंगारी ने पूरे उत्तर भारत को जला दिया. कानपुर में नाना साहेब, बिठूर में राव साहेब, ग्वालियर में तात्या टोपे, अवध में बेगम हज़रत महल — और झांसी में रानी लक्ष्मीबाई. इन सबने मिलकर वह संग्राम छेड़ा जिसे ब्रिटिश इतिहासकार "Sepoy Mutiny" कहते हैं, परंतु जिसे भारतीय हृदय "स्वतंत्रता का प्रथम महायज्ञ" मानता है.
मार्च १८५८ में सर ह्यू रोज़ ने झांसी पर घेरा डाला. दस दिनों तक वह घेराबंदी चली. किले की प्राचीरों पर रानी स्वयं तलवार लेकर डटी रहीं. परंतु जब सेनापतियों ने देखा कि अब किला बचाना संभव नहीं, तब रानी ने वह निर्णय लिया जिसे आज भी कोई पुरुष-योद्धा सोचने का साहस नहीं कर सकता. अंधेरी रात में, अपने आठ-वर्षीय पुत्र दामोदर को पीठ पर बाँधकर, वे अपने प्रिय घोड़े पर सवार होकर किले से कूद पड़ीं — और चालीस मील की दूरी एक ही रात में तय कर डाली.
कालपी, ग्वालियर, और अंत में कोटा-की-सराय का वह निर्णायक युद्ध — जहाँ रानी ने पुरुष-वेश में लड़ते हुए अंतिम साँस ली. कहते हैं कि वीरगति के बाद उनकी देह को घास से ढककर वहीं अंतिम संस्कार कर दिया गया, ताकि अंग्रेज़ उसे अपवित्र न कर सकें. वह तीस वर्षों की एक नायिका, जिसने एक पूरे साम्राज्य की नींव हिला दी थी.
आज जब हम सुभद्राकुमारी चौहान की वह अमर कविता पढ़ते हैं — "खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी" — तब हमारे सामने केवल एक रानी का चित्र नहीं उभरता. उभरता है उस भारत का चित्र, जिसने पहली बार ब्रिटिश सत्ता को कहा था कि हम झुकेंगे नहीं, बिकेंगे नहीं, टूट जाएँगे पर चूकेंगे नहीं.
आगामी तीस अध्यायों में हम उसी मनु से लक्ष्मीबाई तक की यात्रा देखेंगे. वाराणसी की उन गलियों से ग्वालियर के कोटा-की-सराय तक, बिठूर के पेशवा-दरबार से झांसी के किले के अंतिम पलायन तक, "मेरी झांसी" की उस ललकार से सुभद्राकुमारी की उस अमर पंक्ति तक. यह कथा है उस अग्नि की, जो कभी बुझती नहीं — रानी लक्ष्मीबाई की कथा.
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