1 प्रस्तावना — झांसी की वीरांगना का परिचय FREE 2 वाराणसी की मणिकर्णिका — १९ नवंबर १८२८ FREE 3 बिठूर का बचपन — पेशवा के दरबार में "छबीली" FREE 4 नाना साहेब, तात्या टोपे के साथ अस्त्र-शिक्षा FREE 5 महाराजा गंगाधर राव से विवाह — मनु से लक्ष्मीबाई FREE 6 झांसी का राजमहल — नया जीवन FREE 7 राजमाता के कर्तव्य और शासन का अध्ययन FREE 8 पुत्र दामोदर का जन्म और दुःखद विछोह FREE 9 आनंदराव की गोद — नये दामोदर राव FREE 10 महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु FREE 11 लॉर्ड डलहौज़ी की चाल — गोद-स्वीकृति निरस्त FREE 12 "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी" FREE 13 झांसी का अधिग्रहण और किले से विदाई FREE 14 वार्षिक पेंशन का अपमान FREE 15 भीतर ही भीतर पनपती ज्वाला — गुप्त संगठन FREE 16 मेरठ की चिंगारी — १० मई १८५७ FREE 17 झांसी का स्टार फ़ोर्ट हत्याकांड FREE 18 लक्ष्मीबाई का शासन-संचालन — अगस्त १८५७ FREE 19 सेना का गठन — पुरुष-महिला सैनिक, दुर्गा दल FREE 20 ओरछा-दतिया के आक्रमण और लक्ष्मीबाई की विजय FREE 21 सर ह्यू रोज़ का आगमन — मार्च १८५८ FREE 22 किले की रक्षा — दस दिनों का अद्भुत संग्राम FREE 23 झलकारी बाई का बलिदान FREE 24 किले से पलायन — पुत्र पीठ पर बंधे, चालीस मील एक रात में FREE 25 कालपी की ओर — तात्या टोपे, राव साहेब से मिलन FREE 26 कालपी का युद्ध — २२ मई १८५८ FREE 27 ग्वालियर पर अधिकार — १ जून १८५८ FREE 28 कोटा-की-सराय का अंतिम संग्राम — १७–१८ जून १८५८ FREE 29 वीरगति और उसके बाद — ह्यू रोज़ का स्वीकार FREE 30 अमर रानी — सुभद्राकुमारी चौहान की कविता और राष्ट्रीय स्मृति FREE
Font Size
17px
Font
Background
Line Spacing
Episode 3 5 min read 0 0 FREE

बिठूर का बचपन — पेशवा के दरबार में "छबीली"

F
Funtel
9 ghante pehle

कानपुर से थोड़ी ही दूरी पर, गंगा के दूसरे तट पर बसा बिठूर — एक निर्वासित पेशवा का अंतिम आश्रय, और एक छोटी बालिका के लिए वह अद्भुत पाठशाला, जहाँ खेल-खेल में युद्ध-कौशल सीखा जाता था.

१८३३ के आसपास का वर्ष था. पिता मोरोपंत ताम्बे अपनी पाँच-वर्षीय पुत्री मनु को लेकर वाराणसी से बिठूर पहुँच गए. बिठूर कोई साधारण गाँव नहीं था. यह वह स्थान था जहाँ अंग्रेज़ों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को १८१८ की संधि के बाद एक विशाल पेंशन के साथ स्थापित किया था. बाजीराव द्वितीय अंग्रेज़ों की दृष्टि में अब "नाममात्र के पेशवा" थे — परंतु उनके दरबार में आज भी मराठा संस्कृति की मधुर सुगंध बहती थी. यहाँ संस्कृत के पंडित आते, ज्योतिषी आते, संगीतकार आते, गायक-गायिकाएँ आतीं. यहाँ धार्मिक उत्सव होते. यहाँ शस्त्र-विद्या के अभ्यास भी चलते — हालाँकि अब वह केवल परंपरा-निर्वाह तक सीमित रह गया था.

पेशवा बाजीराव द्वितीय निःसंतान थे. उन्होंने तीन पुत्रों को गोद ले रखा था — नाना साहेब (वास्तविक नाम धोंडू पंत), जो ज्येष्ठ थे; राव साहेब, जो मध्यम थे; और एक छोटे पुत्र, जिनका नाम बाला साहेब था. इनके अतिरिक्त एक प्रिय पात्र थे तात्या टोपे — पेशवा के दरबारी पंडित पांडुरंग राव टोपे के पुत्र. ये सभी लड़के एक प्रकार से एक बड़े संयुक्त परिवार के रूप में रहते थे. पेशवा ने अपने आश्रय में आए सभी बच्चों को अपना पुत्र-पुत्री ही माना.

जब छोटी मनु बिठूर पहुँचीं, तब वे केवल पाँच वर्ष की थीं. नाना साहेब उस समय लगभग पंद्रह वर्ष के, राव साहेब लगभग बारह, और तात्या टोपे लगभग तेरह वर्ष के थे. एक छोटी बालिका इन बड़े लड़कों के साथ खेलने आती है — पहले-पहल तो उन सबने इसे एक मनोरंजन-सा समझा. परंतु जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि यह बालिका कुछ और ही मिट्टी की बनी है.

एक दिन की बात है. नाना साहेब और तात्या टोपे आँगन में लकड़ी की तलवारें लेकर अभ्यास कर रहे थे. मनु पास खड़ी सब देख रही थीं. नाना साहेब ने मज़ाक में कहा, "मनु, क्या तू भी सीखेगी?" मनु ने तुरंत हाथ बढ़ाकर एक तलवार उठा ली. नाना साहेब हँसने ही वाले थे कि मनु ने पूरी ताकत से तात्या पर एक प्रहार किया. तात्या टोपे ने हँसते हुए वार बचाया, परंतु अगले ही क्षण उनकी मुस्कान फीकी पड़ गई. यह बच्ची साधारण नहीं है. इसकी पकड़ में जो दृढ़ता है, इसकी आँखों में जो एकाग्रता है — वह किसी अनुभवी योद्धा की है.

उसी दिन से एक नई परंपरा चल पड़ी. प्रतिदिन सुबह-शाम मनु इन तीनों भाइयों के साथ अस्त्र-अभ्यास में सम्मिलित होने लगीं. पेशवा बाजीराव द्वितीय ने जब यह देखा, तो उन्होंने आश्चर्य से अपने दरबार के एक वृद्ध शिक्षक से कहा, "इस बालिका में कुछ अलौकिक है. इसे रोकना नहीं, बढ़ावा देना है." उस दिन से पेशवा ने स्वयं ध्यान रखा कि मनु को जो भी विद्या के लिए चाहिए — वह उपलब्ध हो.

घुड़सवारी सिखाने के लिए विशेष शिक्षक नियुक्त किया गया. पहले तो छोटी-सी मनु एक टट्टू पर ही अभ्यास करतीं. परंतु धीरे-धीरे वे बड़े घोड़ों पर भी निडर होकर बैठने लगीं. कहते हैं कि एक बार वे अपने घोड़े पर सवार होकर एक छोटी-सी जल-धारा को कूदकर पार कर गईं — यह देखकर पेशवा ने कहा, "यह बच्ची नहीं, यह कोई वीरांगना है जो हमारे आँगन में जन्मी है."

तलवारबाज़ी में मनु की प्रगति इतनी तेज़ थी कि कुछ ही महीनों में वे अपने से बड़े लड़कों के साथ सहजता से लड़ने लगीं. विशेष रूप से तात्या टोपे के साथ उनका द्वंद्व-अभ्यास प्रसिद्ध हो गया था. तात्या स्वयं एक कुशल योद्धा थे — आगे चलकर वे १८५७ के सबसे बड़े सेनापतियों में गिने जाने वाले थे. परंतु छोटी मनु के सामने वे कभी-कभी हतप्रभ रह जाते थे. मनु कहीं से भी आक्रमण कर देतीं — बायीं ओर से, दायीं ओर से, ऊपर से. उनके पैर इतनी फुर्ती से चलते कि सामने वाला धोखा खा जाता.

धनुर्विद्या भी मनु ने सीखी. पेशवा के दरबार में एक वृद्ध धनुर्धर थे, जिन्होंने अपनी आयु के अंतिम वर्षों में मनु को धनुष की पकड़ से लेकर लक्ष्य-वेधन तक की हर बारीकी सिखाई. कहते हैं कि एक दिन उन्होंने पेशवा के सामने एक प्रदर्शन किया — मनु ने पच्चीस गज़ की दूरी पर रखे एक छोटे-से आम पर एक के बाद एक तीन तीर मारे, और तीनों लक्ष्य पर बैठे. पेशवा ने उसी क्षण कहा, "इसको शिक्षा देने वालों को कुछ अधिक सम्मान दो — यह बच्ची मेरे दरबार का गौरव है."

परंतु यह केवल अस्त्र-अभ्यास नहीं था. पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में मनु को मराठी, संस्कृत, और कुछ-कुछ फ़ारसी का भी पाठ मिलता. वे रामायण और महाभारत के साथ-साथ शिवाजी महाराज की बखर भी पढ़तीं. पेशवाई इतिहास, बाजीराव प्रथम के पराक्रम, ताराबाई का संघर्ष, अहिल्याबाई का धर्मराज्य — ये सब कथाएँ उनके मन में बसती जा रही थीं.

नाना साहेब, राव साहेब और तात्या टोपे के साथ मनु का स्नेह-सम्बंध भी अद्भुत था. नाना साहेब उन्हें अपनी छोटी बहन की भाँति मानते. तात्या टोपे जब-जब किसी अंग्रेज़ अधिकारी के अहंकार की बात करते, मनु ध्यान से सुनतीं और उनकी छोटी-सी मुट्ठी कस जाती. एक बार उन्होंने तात्या से पूछा, "ये अंग्रेज़ हमेशा यहाँ रहेंगे क्या?" तात्या ने हँसते हुए कहा, "नहीं छबीली, एक दिन इन्हें यहाँ से जाना ही पड़ेगा." छोटी मनु ने गंभीरता से उत्तर दिया, "तब हमें भी कुछ करना होगा, है ना?"

बिठूर के वे आठ-नौ वर्ष — पाँच से तेरह की उम्र तक — मनु के जीवन की वह नींव बने जिस पर आगे चलकर "रानी लक्ष्मीबाई" की भव्य इमारत खड़ी हुई. पेशवा का वह दरबार उनकी पहली पाठशाला था. नाना साहेब, राव साहेब और तात्या टोपे — उनके पहले मित्र, पहले गुरु, और जीवन-भर के साथी. यह बंधन ऐसा था कि १८५७ के संग्राम में जब अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती देने का समय आया, तब ये चारों एक ही लक्ष्य की ओर एक साथ चल पड़े. और झांसी की रानी ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा.

Aage kya hoga? 👇
Agla Episode
Continue Reading
Pichla 📋 Sab Episodes Agla

💬 Comments (0)

टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें

लॉगिन करें
पहली टिप्पणी करें! 🎉

बिठूर का बचपन — पेशवा के दरबार में "छबीली"

How would you like to enjoy this episode?

📖 0 sec